ललित सुरजन की कलम से चलो, लंगर में चलते हैं
रोज शाम को टीवी पर अपना चेहरा देखकर और अपनी बातें सुनकर मुग्ध होते रहते हैं।

'भिनभिनाते मच्छरों और मक्खियों के बीच सड़क किनारे चल रहे शानदार लंगर और नई-पुरानी राजधानियों के नए पुराने सरकारी दफ्तरों में दस-दस दरवाजों के पीछे, सौ-सौ पहरेदारों के घेरे में सुरक्षित बैठकर 'लंच अवर' और 'टी टाइम' का आनंद उठाने वाले नीति निर्माताओं के बीच क्या किसी तरह का संबंध है और क्या उसे जानने की कोशिश उन विद्वानों ने कभी की है जो रोज शाम को टीवी पर अपना चेहरा देखकर और अपनी बातें सुनकर मुग्ध होते रहते हैं। वे ही क्यों, अखबार के दफ्तर में बैठकर अपनी कलम का जौहर दिखाने वाले पत्रकार भी अपने बारे में कितना सोचते हैं? अखबार की ऐसी हैडलाइन्स पर जरा गौर कीजिए- फलाने कार्य के लिए दस करोड़ की राशि स्वीकृत, अमुक स्थान के लिए बीस करोड़ की योजनाओं की मंजूरी, पचास करोड़ के विकास कार्यों की सौगात, शिक्षा अभियान के लिए दस अरब का प्रावधान, जिला अस्पताल को मिलेंगे पांच करोड़ आदि-आदि। ऐसी तमाम घोषणाएं संसद व विधानसभा के भीतर होती हैं और बाहर भी। इनके लिए सालाना बजट में भी प्रावधान होता है, लेकिन फिर क्या होता है? आज खबर छापी, कल भूल गए! कितना पैसा सचमुच आया, कितनी राशि सचमुच खर्च हुई, कितनी कमीशन में बंट गई, कितनी कालातीत हो गई इन सबकी कड़ियां कैसे जोड़ी जाएं- इन सब पर ध्यान नहीं जाता।
(देशबन्धु में 23 मई 2013 को प्रकाशित)
https://lalitsurjan.blogspot.com/2013/05/blog-post_22.html


