ललित सुरजन की कलम से चलो, लंगर में चलते हैं
'बहुत बात होती है कि आजादी के पैंसठ साल बाद भी यह नहीं हो सका या वह नहीं हो सका।

'बहुत बात होती है कि आजादी के पैंसठ साल बाद भी यह नहीं हो सका या वह नहीं हो सका। बड़े-बड़े दावे होते हैं कि हम अगर सत्ता में आ गए तो सब कुछ बदल डालेंगे। जैसे किसी बल्ब के विज्ञापन में हास्य अभिनेता असरानी कहता था-'सबके सब बदल डालूंगा', लेकिन सचमुच में क्या हो रहा है। केन्द्र हो या राज्य, सैकड़ों बल्कि हजारों योजनाएं वक्त-वक्त पर चलाई गई होंगी- बच्चों के लिए, औरतों के लिए, विकलांगों के लिए, मजदूरों के लिए, बाबूओं के लिए, अध्यापकों के लिए किन्तु कुल मिलाकर इनका क्या हश्र है। इस बीच एक दौर यह भी आया, जब कहा गया कि नागरिकों के अधिकार सुनिश्चित किए जाएंगे- सूचना का अधिकार, शिक्षा का अधिकार, स्वास्थ्य का अधिकार, भोजन का अधिकार वगैरह-वगैरह। अधिकार अपनी जगह पर दुरुस्त हैं, योजनाएं भी लागू हैं, फिर भी कितने सारे लोग क्यों उस लंगर की ओर दौड़े चले जा रहे हैं, जो शायद अपने पापों को छिपाने के लिए किसी हत्यारे, तस्कर, मिलावटखोर या कालाबाजारी ने खुलवाया होगा!'
(देशबन्धु में 23 मई 2013 को प्रकाशित)
https://lalitsurjan.blogspot.com/2013/05/blog-post_22.html


