ललित सुरजन की कलम से-उसमें प्राण जगाओ साथी- ''हमारे राजनैतिक संवाददाता''
कांग्रेस के टिकटार्थी यह आशा लेकर उनके पास आते थे कि वे अपने संपर्कों का उपयोग कर उन्हें टिकट दिलवा सकेंगे।

मप्र की राजनीति की जैसी समझ बाबूजी को थी वैसी उनके समकालीन किसी भी पत्रकार को नहीं थी। उनके संपर्कों का दायरा विशाल था तथा वे रायपुर, भोपाल, जबलपुर जहां भी हों, राजनेताओं के साथ उनकी भेंट मुलाकातों का सिलसिला लगातार चलता रहता था। आम चुनाव के पहले गहमागहमी कुछ और बढ़ जाती थी। कांग्रेस के टिकटार्थी यह आशा लेकर उनके पास आते थे कि वे अपने संपर्कों का उपयोग कर उन्हें टिकट दिलवा सकेंगे। बाबूजी ने इसमें कभी खास दिलचस्पी नहीं ली लेकिन एक काम वे अवश्य करते थे। इन भेंट मुलाकातों से उन्हें चुनाव पूर्व की स्थिति का काफी कुछ सही अनुमान हो जाता था। इसके आधार पर वे टिकट वितरण के पहले दस-पन्द्रह लेखों की एक श्रृंखला 'हमारे राजनीतिक संवाददाता' अथवा 'विशेष संवाददाता' के नाम से लिखा करते थे। इसमें वे मप्र की तीन सौ बीस (पहले 294) विधानसभा सीटों का विश्लेषण कर बतलाते थे कि कांग्रेस का कौन सा उम्मीदवार जीतने की स्थिति में है। वे हर सीट के लिए अपनी ओर से दो या तीन नामों का प्रस्ताव करते थे और हमने देखा कि कांग्रेस की चयन समिति अधिकांशत: इन्हीं नामों में से उम्मीदवार चुनती थी। यह पंचवर्षीय आकलन वे उस समय तक करते रहते जब तक कांग्रेस पार्टी में ऊपर से उम्मीदवार थोपने की प्रथा शुरू नहीं हो गई। जब उन्हें लगा कि पार्टी में आंतरिक जनतंत्र कमजोर हो गया है तब उन्होंने अपनी राय देना बंद कर दिया।
https://lalitsurjan.blogspot.com/2012/04/18.हटम्ल


