ललित सुरजन की कलम से - आशीष अवस्थी की आत्महत्या
'पिछले कुछ बरसों में हमने किसानों द्वारा आत्महत्या करने की खबरें बारंबार पढ़ी हैं। इस हद तक कि नागर समाज ने तो उनकी तरफ ध्यान देना, उस बारे में बात करना तक बंद कर दिया है। लेकिन किसान मर रहे हैं

'पिछले कुछ बरसों में हमने किसानों द्वारा आत्महत्या करने की खबरें बारंबार पढ़ी हैं। इस हद तक कि नागर समाज ने तो उनकी तरफ ध्यान देना, उस बारे में बात करना तक बंद कर दिया है। लेकिन किसान मर रहे हैं, यह सच्चाई अपनी जगह कायम है।
अब एक मध्यमवर्गीय युवा सेल्समैन द्वारा हताशा में खुदकुशी कर लेना देश के युवा वर्ग में बढ़ रही बेचैनी, हताशा, असुरक्षा, अनिश्चित भविष्य इत्यादि की प्रवृत्ति की ओर इशारा कर रहा है। उस युवा वर्ग में जिसे भारत अपनी सबसे बड़ी पूंजी याने असैट मानकर चल रहा है।
बारंबार कहा जा रहा है कि आने वाले दशकों में भारत की युवा आबादी विश्व में सर्वाधिक होगी इत्यादि। इन युवजनों को लुभाने के लिए तरह-तरह के सरंजाम कारपोरेट जगत कर रहा है- मॉल और मल्टीप्लैक्स से लेकर लाखों की बाईक, फ्यूज़न फूड, फ्यूज़न म्यूज़िक, स्मार्टफोन, मोबाइल एप्प आदि तक।
लेकिन इन युवाओं को पढ़ाई पूरी करने के बाद भविष्य क्या होगा, ये जब कौशल विकास का प्रशिक्षण पा लेंगे, उसके बाद इन्हें रोजगार कैसे मिलेगा जैसे बुनियादी मुद्दों पर क्या गंभीरता से सोचा गया है?'
(देशबन्धु में 18 अगस्त 2016 को प्रकाशित)
https://lalitsurjan.blogspot.com/2016/08/blog-post_17.html


