ललित सुरजन की कलम से - अर्जुनसिंह की आत्मकथा
'भारतीय राजनीति में इन दिनों जैसे बड़बोलेपन का दौर चला हुआ है, उसमें यह देखकर आश्चर्य हो सकता है कि अभी एक-सवा साल पहले तक इस परिदृश्य में अर्जुनसिंह जैसे राजनेता मौजूद थे जो बात कम और काम ज़्यादा के सिध्दांत में भरोसा रखते थे

'भारतीय राजनीति में इन दिनों जैसे बड़बोलेपन का दौर चला हुआ है, उसमें यह देखकर आश्चर्य हो सकता है कि अभी एक-सवा साल पहले तक इस परिदृश्य में अर्जुनसिंह जैसे राजनेता मौजूद थे जो बात कम और काम ज़्यादा के सिध्दांत में भरोसा रखते थे। उनसे मिलने वालों को अक्सर इस बात से असुविधा होती थी कि उनके साथ कैसे संवाद स्थापित किया जाए, लेकिन जिन्होंने अर्जुन सिंह को कुछ निकट से देखा है वे बता सकते हैं कि वे जितना भी बोलते थे उसमें वजन होता था। इधर कुछ समय से उनकी प्रकाशनाधीन आत्मकथा को लेकर चर्चाएं हो रही थीं। अपने आपको राजनीति का पंडित समझने वाले बहुत से लोगों का मानना था कि उनकी आत्मकथा में प्रचुर मात्रा में विस्फोटक सामग्री होगी और उसके चलते कांग्रेस के प्रथम परिवार को असुविधा का सामना करना पड़ेगा। लेकिन पुस्तक बाजार में आ चुकी है और ऐसे लोगों को निराशा ही हाथ लगी है।'
अर्जुन सिंह की आत्मकथा का शीर्षक भारी-भरकम है- ''अ ग्रेन ऑफ सेंड इन द अवरग्लास ऑफ टाइम'' इसका हिन्दी अनुवाद शायद कुछ इस तरह होगा- ''महाकाल के घट में रेत का एक कण''। यह शीर्षक ही प्रकट करता है कि श्री सिंह ने भले ही भारतीय राजनीति में एक लंबे समय तक बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाई हो, वे अपने आपको ऐसे अभिनेता के रूप में याद किया जाना पसंद करते हैं जिसने निर्धारित समय पर अपना रोल अदा किया और उसके बाद वापिस नेपथ्य में चला गया।
(देशबन्धु में 19 जुलाई 2012 को प्रकाशित)
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