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ललित सुरजन की कलम से, अडवानी या मोदी :फर्क क्या है?

'1952 के पहले आम चुनाव से लेकर 2009 के चुनावों तक संघ के इस राजनीतिक मंच ने बहुत से उतार-चढ़ाव देखे हैं।

ललित सुरजन की कलम से, अडवानी या मोदी :फर्क क्या है?
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'1952 के पहले आम चुनाव से लेकर 2009 के चुनावों तक संघ के इस राजनीतिक मंच ने बहुत से उतार-चढ़ाव देखे हैं। एक राजनीतिक दल के रूप में जब कभी भी उसे सत्ता में आने का अवसर मिला, उसने एक तरफ तो संघ के एजेंडा को लागू करने के लिए जो भी प्रयत्न किए जाना चाहिए थे किए, लेकिन दूसरी तरफ सत्ता में बैठे उसके नेता उन आकर्षणों और प्रलोभनों से नहीं बच सके जो सत्ताधीशों को सहज ही उपलब्ध हो जाते हैं। भारतीय जनता पार्टी का चुनाव चिन्ह भले ही कमल हो, लेकिन दुर्भाग्य से उसके नेता और कार्यकर्ता सत्ता के कीचड़ से उठकर स्वयं कमल नहीं बन सके। कल-परसों टीवी की एक बहस में भाजपा के किसी प्रवक्ता ने बेहद हास्यास्पद तरीके से पहले तो लालकृष्ण अडवानी की तुलना महात्मा गांधी से की कि उनके घोषित उम्मीदवार पट्टाभि सीतारम्मैया त्रिपुरी कांग्रेस (1939) में सुभाषचंद्र बोस से हार गए थे। इसके बाद उन्होंने अडवानीजी की तुलना ज्योति बसु से की जो पार्टी के आदेश को मानकर प्रधानमंत्री नहीं बन पाए।'

'जाहिर है कि इन दोनों तुलनाओं का कोई औचित्य नहीं था। महात्मा गांधी स्वयं अपने लिए चुनाव नहीं लड़ रहे थे। उनका नेताजी से मतभेद सैध्दांतिक स्तर पर था। इसी तरह ज्योति बाबू ने पार्टी के आदेश के खिलाफ विद्रोह नहीं किया था।'

(देशबन्धु में 13 जून 2013 को प्रकाशित)

https://lalitsurjan.blogspot.com/2013/06/blog-post_12.html


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