ललित सुरजन की कलम से राजनीति विहीन समाज असंभव कल्पना
'आज हम जिस समय में जी रहे हैं वह पूर्व की अपेक्षा कहीं अधिक जटिल है।

'आज हम जिस समय में जी रहे हैं वह पूर्व की अपेक्षा कहीं अधिक जटिल है। इसके ताने-बाने को समझ पाना अत्यन्त दुष्कर है। विगत कुछ सदियों में खासकर यूरोप में पुनर्जागरण के बाद की अवधि में जो वैज्ञानिक आविष्कार और तकनीकी विकास हुआ है उसने विज्ञान को पूंजीवाद का गुलाम बना दिया है। इस प्रगति के कारण मनुष्य के उपभोग के लिए जो नए-नए साधन जुटे हैं उसने सामान्य व्यक्ति के मन में उपभोग और संग्रह के लिए ऐसी भूख जगा दी है जिसका कोई अंत नहीं। इस तरह पूंजीवाद दो तरह से फायदे में है। इसकी काट एक सच्चे जनतंत्र में ही संभव है याने ऐसा जनतंत्र जिसमें राजनीति में पूंजीतंत्र की दासी बनने से इंकार करने का साहस हो। ऐसे अनेक राजनेता हुए हैं जिन्हें साहस की कीमत अपने बलिदान से चुकाना पड़ी है। लेकिन इसका कोई विकल्प नहीं है। मैं फिर कहता हूं कि राजनीतिविहीन समाज एक असंभव कल्पना है।'
'आप ध्यान करके सोचिए कि महात्मा गांधी ने एक ओर जहां पूरी ताकत के साथ राजनीति की, वहीं उसके समानांतर उन्होंने रचनात्मक कार्यक्रम के सूत्र दिए। और जब देश स्वाधीन होने का अवसर आया तो उन्होंने किसी अन्य को नहीं, बल्कि जवाहर लाल नेहरू को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया।मेरा मानना है कि देश को जे.सी. कुमारप्पा, धीरेन्द्र मजूमदार, ठाकुरदास बंग आदि से लेकर बाबा आमटे जैसे आदर्शवादी रचनात्मक कार्यकर्ताओं की जितनी आवश्यकता है उतनी ही नेहरू सरीखे राजनेताओं की, जो राजनीति और सत्ता को साध्य नहीं, साधन मानते हैं।'
(देशबन्धु में 16 जून 2016 को प्रकाशित)
https://lalitsurjan.blogspot.com/2016/06/blog-post_19.html


