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रंग दे बसंती से नीट तक : बदलते दौर का लोकतांत्रिक शिष्टाचार

इन छात्रों का कसूर सिर्फ इतना है कि इन्होंने एक ऐसी व्यवस्था पर भरोसा किया, जिसने इनके सपनों की बोली लगा दी।

रंग दे बसंती से नीट तक : बदलते दौर का लोकतांत्रिक शिष्टाचार
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  • अशांशु संचेती

इन छात्रों का कसूर सिर्फ इतना है कि इन्होंने एक ऐसी व्यवस्था पर भरोसा किया, जिसने इनके सपनों की बोली लगा दी। जब ये बच्चे फटे और सूखे होठों के साथ, अपनी टूटती सांसों को थामकर शिक्षा मंत्री के इस्तीफे और परीक्षा प्रणाली में आमूलचूल सुधार की मांग करते हैं, तो सत्ता के गलियारों से एक ऐसी बर्फीली और डरावनी खामोशी आती है जो सर्दियों की रातों से भी ज़्यादा ठंडी है। यह महज़ एक परीक्षा का पर्चा लीक होने का मामला नहीं है।

वोज़बां जिसे सरगोशियां भी गवारा न थीं,

अब चीख़ती है तो ज़माने को गिला होता है।

सिनेमाघर के उस घने अंधेरे में प्रोजेक्टर की रोशनी जब सफेद पर्दे पर तैरती थी, तो वो सिर्फ एक कहानी नहीं बेच रही थी। साल 2006 की बात है, जब थिएटर की सीटों पर बैठे युवाओं की रीढ़ में एक अजीब सी सिहरन दौड़ जाती थी, जब फिल्म 'रंग दे बसंतीÓ के नायक भ्रष्ट व्यवस्था के खिलाफ इंडिया गेट की मुंडेर पर मोमबत्तियां जलाकर बैठ जाते थे। तब उस सिनेमाई प्रतिवाद को देखकर किसी ने थियेटर के बाहर पुलिस का पहरा नहीं लगाया, न ही उन फिल्मकारों के दफ्तरों पर ताले जड़े गए। व्यवस्था पर तीखे से तीखा प्रहार भी लोकतंत्र के विशाल कैनवास पर एक स्वीकृत रंग की तरह स्वीकार कर लिया जाता था। वह एक ऐसा दौर था जहां सत्ता कितनी भी निरंकुश होने की कोशिश करे, पर समाज की सामूहिक चेतना की आवाज़ को सुनने के लिए उसके कान खुले रहते थे।

इस सिनेमाई किस्से के ठीक पांच साल बाद, इतिहास ने एक और करवट ली। साल 2011 की उस तपती गर्मियों में दिल्ली का रामलीला मैदान एक अभूतपूर्व जन-आंदोलन का मंच बना। एक नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की रिपोर्ट आई, जिसमें भ्रष्टाचार के इतने शून्य लगे थे कि आम आदमी गिनते-गिनते थक जाए। हालांकि बाद में अदालत की चौखटों पर वे आरोप कानूनी रूप से उस तरह टिक नहीं पाए और तकनीकी रूप से धराशायी हो गए। लेकिन उस दौर की सरकार का जो रवैया था, वह आज एक लोककथा जैसा प्रतीत होता है। देश के वरिष्ठतम मंत्री आधी रात को प्रदर्शनकारियों से बात करने हवाई अड्डों पर दौड़ रहे थे, बंद कमरों में मसौदे तैयार हो रहे थे, इस्तीफे दिए जा रहे थे और संसद के भीतर असहमति के स्वरों को पूरी जगह मिल रही थी। वह सत्ता का डर नहीं था, वह लोकतंत्र का वह बुनियादी शिष्टाचार था जिसे 'संवाद' कहते हैं।

समय का पहिया घूमा, सत्ता की भाषा बदली और उसके साथ ही बदल गई हमारे देखने और सुनने की आदतें। आज जब हम वर्तमान समय की पटरियों पर नज़र डालते हैं, तो अतीत का वह लचीलापन किसी दूसरे ग्रह की कहानी लगने लगता है। आज देश की राजधानी दिल्ली की तंग सड़कों पर एक बिल्कुल अलग और रूह को कंपा देने वाला दृश्य है। जो युवा कल तक बंद कमरों में, टेबल लैंप की मद्धम रोशनी में चौदह-चौदह घंटे चिकित्सा विज्ञान की भारी-भरकम किताबें रट रहे थे, वे आज चौदह-पंद्रह दिनों से दिल्ली की सड़कों पर आमरण अनशन पर बैठे हैं। मुद्दा है-नीट परीक्षा की शुचिता और उसकी परतों के पीछे छिपा एक कथित संगठित भ्रष्टाचार।

इन छात्रों का कसूर सिर्फ इतना है कि इन्होंने एक ऐसी व्यवस्था पर भरोसा किया, जिसने इनके सपनों की बोली लगा दी। जब ये बच्चे फटे और सूखे होठों के साथ, अपनी टूटती सांसों को थामकर शिक्षा मंत्री के इस्तीफे और परीक्षा प्रणाली में आमूलचूल सुधार की मांग करते हैं, तो सत्ता के गलियारों से एक ऐसी बर्फीली और डरावनी खामोशी आती है जो सर्दियों की रातों से भी ज़्यादा ठंडी है। यह महज़ एक परीक्षा का पर्चा लीक होने का मामला नहीं है; यह इस देश के करोड़ों मध्यमवर्गीय और गरीब माता-पिता की उस समूची जीवन-पूंजी की डकैती है, जो वे अपने बच्चों को एक अदद डॉक्टर बनाने के सपने में होम कर देते हैं।

इस पूरे परिदृश्य में हमारे लोकतंत्र का तथाकथित 'चौथा स्तंभ' जिस भूमिका में नज़र आ रहा है, वह इतिहास के सबसे काले अध्यायों में गिना जाएगा। वह मुख्यधारा की मीडिया, जो कभी अन्ना आंदोलन के समय हर एक घंटे पर देश का पारा नापती थी, आज इन अनशनकारी बच्चों के फफोले पड़े पैरों और गिरते हुए ग्लूकोज लेवल से मुंह चुराए बैठी है। विडंबना की पराकाष्ठा देखिए कि जो मीडिया कभी जनता के तीखे सवालों की मशाल लेकर सत्ता की दहलीज पर खड़ा होता था, आज वह सत्ता की ढाल बनकर अपने ही देश के बच्चों के खिलाफ खड़ा है। जब प्राइम-टाइम के स्टूडियो में इन भूखे बैठे छात्रों के दर्द पर चर्चा करने के बजाय सांप्रदायिक ध्रुवीकरण या राजनीतिक जोड़-तोड़ का तमाशा परोसा जा रहा हो, तो समझ जाना चाहिए कि व्यवस्था ने विमर्श की रीढ़ ही तोड़ दी है।

लेकिन बात सिर्फ मीडिया की खामोशी तक नहीं रुकती, बात इससे आगे बढ़कर एक बेहद खतरनाक प्रवृत्ति की ओर जाती है। आज के दौर में यदि कोई छात्र, कोई बुद्धिजीवी या कोई पीड़ित नागरिक व्यवस्था की खामियों पर उंगली उठा दे, तो तर्कों से उसकी बात काटने के बजाय सीधे उसके चरित्र पर प्रहार किया जाता है। एक झटके में इन आंदोलनकारी छात्रों को 'टूलकिट का हिस्सा', 'साजिशकर्ता' या 'देशद्रोही' घोषित कर दिया जाता है। यह कैसी राष्ट्रभक्ति है जो अपने ही देश के मेधावी युवाओं को दुश्मन की तरह देखने लगती है? असहमति के हर स्वर को कुचलने और उसे राष्ट्र-विरोधी करार देने का यह खेल दरअसल सत्ता के भीतर के गहरे डर और अहंकार का मिला-जुला रूप है।

नीट परीक्षा का यह संकट कोई एक अकेली घटना नहीं है, यह उस व्यापक बीमारी का एक छोटा सा लक्षण है जिससे हमारा समाज गुज़र रहा है। आज युवा रोज़गार के एक अंतहीन और धुंधले कुहासे में भटक रहे हैं। हाथों में डिग्रियां हैं, आंखों में उम्मीदें, लेकिन जब वे रोज़गार मांगते हैं तो उन्हें लाठियां मिलती हैं या फिर आश्वासन के खोखले पुलिंदे! हमारी संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता पर रोज़ एक नया सवालिया निशान लगता है। जहां कभी तर्कों, तथ्यों और दर्शन के आधार पर विमर्श की स्वस्थ परंपरा थी, आज वहां केवल अंधसमर्थन का शोर और विरोधियों के प्रति नफ़रत की भाषा बची है।

एक लोकतंत्र में सरकारें बदलती हैं, चेहरे बदलते हैं, और यह इस व्यवस्था की सबसे सुंदर नियति है। लेकिन जब शासन बदलने के साथ-साथ 'लोकतंत्र की आत्मा' यानी उसकी संवेदनशीलता, उसकी आलोचना सहने की क्षमता और 'संवाद की तत्परता' ही गायब हो जाए, तो वह समाज भीतर से खोखला होने लगता है। कोई भी राष्ट्र केवल कांक्रीट के जंगलों, एक्सप्रेस-वे या आर्थिक आंकड़ों की चमक से महान नहीं बनता। किसी राष्ट्र की महानता इस बात से मापी जाती है कि वह संकट के समय अपने सबसे लाचार और पीड़ित नागरिक की आवाज़ को कितनी शिद्दत और सम्मान के साथ सुनता है।

समय आ गया है कि सत्ता अपनी इस हठधर्मिता के अभेद्य किले से बाहर आए। दिल्ली की सड़कों पर भूख से तड़पते ये युवा किसी दुश्मन देश से नहीं आए हैं, वे इसी मिट्टी के बच्चे हैं और इसी देश का भविष्य हैं। अगर आज उनके आंसुओं को एक 'साजिश' मानकर अनसुना कर दिया गया, तो इतिहास इस दौर को एक ऐसे स्याह समय के रूप में दर्ज करेगा जब देश की मेधा सड़कों पर दम तोड़ रही थी और हुक्मरान अपने बंद कमरों में तख्त-ओ-ताज की सलामती का जश्न मना रहे थे।

सबक़ पढ़ फिर सदाक़त का, अदालत का, शहादत का,

लिया जाएगा तुझ से काम दुनिया की इमामत का।।

- मंदसौर


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