भारत में श्रमिक आंदोलन से गिग वर्कर्स तक : हड़ताल, शक्ति और जनसमर्थन का क्षय
भारतीय रेल में 1974 की ऐतिहासिक हड़ताल जॉर्ज फर्नांडिस के नेतृत्व में हुई

- अरुण कुमार डनायक
भारतीय रेल में 1974 की ऐतिहासिक हड़ताल जॉर्ज फर्नांडिस के नेतृत्व में हुई। लगभग 17 लाख कर्मचारियों ने वेतन वृद्धि, बोनस, आठ घंटे की ड्यूटी और बेहतर कार्य स्थितियों की मांग की। सरकार की कड़ी दमनात्मक कार्रवाई के बावजूद यह हड़ताल भारतीय राजनीति और श्रमिक इतिहास की एक युगांतकारी घटना बनी और आगे चलकर आपातकाल की पृष्ठभूमि भी तैयार की।
हाल के दिनों में गिग वर्कर्स की दो दिवसीय हड़ताल चर्चा में रही। ऐप आधारित डिलीवरी और कैब सेवाओं में लगे ये युवा कठिन परिस्थितियों में असंभव को संभव बनाते हुए शहरी जीवन की गति को थामे रखते हैं। औपचारिक रूप से उन्हें 'स्वतंत्र ठेकेदार' कहा जाता है, किंतु व्यवहार में वे कंपनियों के एल्गोरिद्मिक नियंत्रण और ग्राहकों के निरंतर दबाव के बीच जीवनयापन करने को विवश हैं। इसके बावजूद आधुनिक डिजिटल अर्थव्यवस्था में श्रमिकों की वास्तविक स्थिति, उनके संघर्ष के मौलिक अधिकार और हड़ताल की लगातार कमजोर होती क्षमता पर प्रिंट और डिजिटल मीडिया का अपेक्षित ध्यान नहीं गया। हमेशा की तरह इस हड़ताल को भी शीघ्र 'असफल' घोषित कर दिया गया, जबकि ऐसे आंदोलनों का महत्व केवल तात्कालिक परिणामों में नहीं, बल्कि उस सामाजिक चेतावनी में निहित होता है जिसे वे समय-समय पर समाज और राज्य के सामने रखते हैं। भारत में श्रमिक आंदोलन का इतिहास समृद्ध और निर्णायक रहा है। स्वतंत्र भारत के शुरुआती दशकों में सार्वजनिक क्षेत्र, बैंक, रेलवे और बड़े निजी उद्योगों में संगठित आंदोलन न केवल वेतन और सेवा शर्तों में सुधार लाए, बल्कि औद्योगिक संबंधों की दिशा भी निर्धारित की।
23 सितंबर 1954 को ऑल इंडिया बैंक एम्प्लॉइज एसोसिएशन के आह्वान पर भारत में पहली अखिल भारतीय बैंक हड़ताल हुई। इसका मुख्य कारण केंद्र सरकार का लेबर अपीलीय न्यायाधिकरण (शास्त्री अवार्ड) के वेतन निर्णय में हस्तक्षेप करने का प्रयास था, जिससे कर्मचारियों को लगा कि सामूहिक सौदेबाजी और संस्थागत न्याय कमजोर किया जा रहा है। इस असहमति के चलते तत्कालीन श्रम मंत्री वी. वी. गिरी ने इस्तीफा दे दिया। यह घटना न्यायिक निर्णयों और श्रमिक हितों के बीच संतुलन की आवश्यकता और भारतीय श्रमिक आंदोलन में संस्थागत स्वतंत्रता और सामूहिक संघर्ष की महत्वता को दर्शाती है। इसके बाद 1960 में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया हड़ताल ने वेतन, पदोन्नति और सेवाशर्तों में सुधार कर बैंकिंग यूनियनों को निर्णायक शक्ति दी और देसाई अवार्ड को प्रेरित किया।
भारतीय रेल में 1974 की ऐतिहासिक हड़ताल जॉर्ज फर्नांडिस के नेतृत्व में हुई। लगभग 17 लाख कर्मचारियों ने वेतन वृद्धि, बोनस, आठ घंटे की ड्यूटी और बेहतर कार्य स्थितियों की मांग की। सरकार की कड़ी दमनात्मक कार्रवाई के बावजूद यह हड़ताल भारतीय राजनीति और श्रमिक इतिहास की एक युगांतकारी घटना बनी और आगे चलकर आपातकाल की पृष्ठभूमि भी तैयार की।
मोरारजी देसाई के प्रधानमंत्रित्व के समय कोयल मजदूरों की हड़ताल सरकारी दमन और राजनीतिक समर्थन के अभाव का शिकार हुई।
निजी क्षेत्र में श्रमिक संघर्ष अपेक्षाकृत असुरक्षित रहे हैं। 2012 में मारुति सुजुकी, मानेसर में यूनियन मान्यता और अनुबंध प्रथा को लेकर संघर्ष हिंसक हो गया, जिसके बाद बर्खास्तगी और कठोर न्यायिक कार्रवाइयों ने निजी उद्योगों में संगठित आंदोलन को हतोत्साहित किया।
दत्ता सामंत के नेतृत्व में 1982 की मुंबई और 1977-78 की कानपुर मिल हड़ताल ने दिखाया कि लंबा संघर्ष पूरे उद्योग के पतन और बेरोजगारी का कारण बन सकता है।
उदारीकरण के बाद भारत में श्रमिक आंदोलन फीका पड़ गया। 1991 के बाद अर्थव्यवस्था में अस्थायी रोजगार बढ़े, जिससे हड़ताल की सामूहिक शक्ति कमजोर हुई। महंगी शिक्षा और छात्रों का कर्ज भी युवाओं को अस्थायी, जोखिमपूर्ण रोजगार स्वीकार करने पर मजबूर करता है। सरकारी श्रम कानूनों और नीतिगत बदलावों ने निवेश और लचीलेपन को प्राथमिकता दी, जिससे श्रमिक संरक्षण की मूल भावना कमजोर हुई और हड़तालें अप्रभावी होती गईं।
श्रम कानूनों में नए बदलावों के बाद श्रमिक आंदोलन पर तीन प्रमुख प्रभाव पड़े। सबसे पहले, ठेका प्रथा, आउटसोर्सिंग और अस्थायी नियुक्तियों से नौकरी की स्थायित्व कम हुई, जिससे यूनियनों की सामूहिक शक्ति कमजोर पड़ी और आंदोलन में भाग लेना जोखिमपूर्ण हुआ। दूसरा, एसमा का व्यापक उपयोग, लंबी नोटिस अवधि और हड़तालों को अवैध ठहराने की प्रवृत्ति ने आन्दोलन के मौलिक अधिकार को सीमित किया। तीसरा, 2020 की चार श्रम संहिताओं और 2025 के शीतकालीन सत्र में पारित नए कानूनों ने नियोक्ताओं को 'हायर एंड फायर' में अधिक लचीलापन दिया, जबकि ट्रेड यूनियनों की मान्यता और सामूहिक सौदेबाजी प्रक्रिया जटिल बना दी। इन बदलावों ने संगठित विरोध की संभावना और पारंपरिक हड़तालों की शक्ति दोनों को कमजोर किया।
बैंकिंग क्षेत्र में श्रमिक आंदोलन के क्षीण होने में केवल परिस्थितियां ही नहीं, बल्कि जानबूझ कर अपनाई गई प्रबंधकीय रणनीतियां भी निर्णायक रही हैं। प्रबंधन ने 'पेशेवर' रुख के नाम पर श्रमिक प्रश्न को मानवीय विमर्श से हटाकर मात्र प्रदर्शन, लक्ष्य और उत्पादकता की भाषा में सीमित कर दिया। यूनियन में सक्रिय कर्मचारियों की दूरस्थ तैनाती और पदोन्नति ने उन्हें श्रमिक समुदाय से वैचारिक रूप से अलग किया, जबकि चतुर्थ श्रेणी की भर्तियां बंद कर यूनियनों की संगठनात्मक रीढ़ कमजोर कर दी गई। तकनीकी हस्तक्षेप और स्वचालन ने मानवीय भूमिका सिकोड़ी, जिससे सामूहिकता और सौदेबाजी—दोनों की शक्ति घटती चली गई।
साथ ही, बेहतर वेतन और व्यक्तिगत करियर अवसरों ने कर्मचारियों के एक हिस्से को सामूहिक संघर्ष से विमुख किया, जबकि स्थायी नियुक्तियों में गिरावट से यूनियन सदस्यता निरंतर घटती गई। अनुशासनात्मक कार्रवाइयों और भय के माहौल ने हड़ताल में भागीदारी की हिम्मत भी कम कर दी। परिणामस्वरूप बैंकिंग क्षेत्र का श्रमिक आंदोलन प्रतिरोध से हटकर समायोजन, मौन और सीमित असहमति की राजनीति में सिमटता चला गया, और बार-बार की हड़तालें उपभोक्ताओं की असुविधा तक सीमित होकर सामाजिक समर्थन खोती गईं।
संसद में वामपंथी दलों का प्रतिनिधित्व घटने से श्रमिक हितों पर बहसें भी सीमित होती चली गईं। हड़तालों और आंदोलन को राजनीतिक संरक्षण और वैचारिक समर्थन मिलना कम हो गया। राजनीतिक दलों ने श्रमिक नेताओं को चुनावी राजनीति से दूर रखा, जिससे ट्रेड यूनियन नेतृत्व और संसदीय प्रक्रिया के बीच कड़ी टूट गई। निवेश-अनुकूलता के नाम पर श्रम सुधारों की बहस औपचारिकता बन गई, और हड़ताल जैसा अहिंसक साधन प्राय: निष्प्रभावी प्रतिरोध रह गया।
स्वतंत्र भारत के संगठित श्रमिक आंदोलन से गिग अर्थव्यवस्था तक की यह यात्रा केवल आर्थिक बदलाव की नहीं, बल्कि श्रमिक शक्ति, न्याय और संरक्षण के सिमटते दायरे की कहानी है। कर्मचारी संघों और नेताओं के उत्पीड़न तथा सरकारी दमन के बावजूद ऐतिहासिक हड़तालों ने वेतन, सेवा शर्तों और सामाजिक सुरक्षा को मजबूती दी, किंतु उदारीकरण, डिजिटल प्लेटफॉर्म और नई श्रम संहिताओं ने सामूहिक प्रतिरोध को कमजोर किया। आज गिग वर्कर्स और असंगठित श्रमिकों की असुरक्षा बताती है कि नीतिगत प्राथमिकताएं श्रम से अधिक बाज़ार के पक्ष में रहीं। जनसमर्थन और राजनीतिक हस्तक्षेप के अभाव में गिग अर्थव्यवस्था की हड़तालें प्राय: निष्प्रभावी हो जाती हैं, क्योंकि बिखरा श्रम और प्लेटफॉर्म आधारित नियंत्रण सामूहिक दबाव को क्षीण करते हैं। ऐसे में गांधीजी द्वारा फरवरी 1920 में प्रतिपादित न्यूनतम मानवीय मानक—उचित कार्य घंटे, शिक्षा, स्वच्छ आवास और बुढ़ापे की सुरक्षा—आज भी स्मरण कराते हैं कि श्रम केवल उत्पादन का साधन नहीं, बल्कि मानवीय गरिमा का मूल प्रश्न है।
(लेखक भारतीय स्टेट बैंक के सेवानिवृत सहायक महाप्रबंधक हैं)


