चुनावी तानाशाही से खालिस तानाशाही की ओर!
इन रहस्योद्ïघाटनों में यह जानकारी खास थी कि पिछले दस महीनों में ही कम से कम 14 मौकों पर, मुख्य चुनाव आयुक्त के इतर, अन्य चुनाव आयुक्तों ने आयोग के अलग-अलग निर्णयों पर अपनी आपत्तियां/ असहमतियां दर्ज करायी थीं।

चुनाव आयोग में भी मुख्य चुनाव आयुक्त के हाथों में शक्तियों के इस केंद्रीयकरण को, हाल के रहस्योद्घाटन से एक बड़ा धक्का लगा है। इन रहस्योद्घाटन में यह जानकारी खास थी कि पिछले दस महीनों में ही कम से कम 14 मौकों पर, मुख्य चुनाव आयुक्त के इतर, अन्य चुनाव आयुक्तों ने आयोग के अलग-अलग निर्णयों पर अपनी आपत्तियां/ असहमतियां दर्ज करायी थीं। कुछ मामलों में दो चुनाव आयुक्तों ने एक ही मुद्दे पर अलग-अलग अपनी आपत्तियां दर्ज करायी थीं, जो वास्तव में चुनाव आयोग का बहुमत होता था।
स्वीडन के गोथेनबर्ग विश्वविद्यालय के वी-डेम इंस्टीट्यूट की डेमोके्रसी रिपोर्टों में 2018 से यानी मोदीशाही के पहले कार्यकाल के आखिरी वर्ष से ही भारत को 'इलेक्टोरल ऑटोक्रेसी' या चुनावी तानाशाही की श्रेणी में रखा जाता रहा है। इस श्रेणी में ऐसे निजाम आते हैं जहां बहुदलीय चुनावी व्यवस्था तो बनी हुई है, फिर भी अभिव्यक्ति की आजादी, मीडिया की स्वतंत्रता, स्वतंत्र/ निष्पक्ष चुनाव और संगठन बनाने की स्वतंत्रता जैसी जनतंत्र की बुनियादी शर्तों के मामले में, किसी हद तक कमी रहती है। याद रहे कि वी-डेम इंस्टीट्यूट ने वैसे तो 2018 से ही मोदीशाही के भारत की पहचान चुनावी तानाशाही के रूप में करनी शुरू कर दी थी। फिर भी उसकी 2021 की उसकी डेमोक्रेसी रिपोर्ट में और ज्यादा पुख्ता तरीके से अपने इस चरित्रांकन को दोहराया गया।
उसका यह चरित्रांकन इसलिए और पुख्ता हुआ था क्योंकि 2019 के बाद से जनतंत्र के तकाजों के हिसाब से गिरावट और बहुत आगे चली गयी थी। रिपोर्ट में इस गिरावट को मुख्यत: मोदी राज में सामने आए रुझानों और खासतौर पर लिबरल डेमोक्रेसी इंडेक्स पर भारत के 2013 के 0.57 से अधिक अंक के ऊंचे स्तर से गिरकर 2020 के आखिर तक 0.34 अंक पर आ जाने के साथ जोड़ा गया था। यह गिरावट अभिव्यक्ति/ मीडिया की स्वतंत्रता के सिकुड़ने, सिविल सोसाइटी पर बढ़ते दबावों और राजद्रोह/डिफेमेशन/आतंकवाद-विरोध से संबंधित कानूनों का बढ़ते पैमाने पर उपयोग किए जाने को दिखाती थी।
जाहिर है कि वी-डेम की बाद की रिपोर्टें यही दिखाती आयी हैं कि भारत 2018 तक चुनावी तानाशाही केगड्ढे में गिरने के बाद से, उसीगड्ढे में पड़ा हुआ है। बहरहाल, वी-डेम के हुकूमतों के वर्गीकरण में, चुनावी तानाशाही से भी नीचे खिसक कर कोई देश, क्लोज्ड ऑटोक्रेसी या मुकम्मल तानाशाही के रसातल में भी जा सकता है। चुनाव आयोग पर मुकम्मल कब्जे के जरिए, पिछले कुछ वर्षों में और खासतौर पर 2024 के आम चुनाव में मोदीशाही को तगड़ा धक्का लगने के बाद से, चुनावों को जिस तरह ज्यादा से ज्यादा झुठलाने के प्रबंध किए गए हैं, उनसे चुनावी तानाशाही की 'चुनावी' की शर्त का कमजोर होना और तानाशाही का और मजबूत होना तो पहले ही सब को दिखाई दे रहा था। लेकिन, मोदीशाही के नियंत्रण में भारतीय चुनाव आयोग पिछले साल भर से ज्यादा से जिस तरह से काम कर रहा था, उसके हाल में मीडिया में और खासतौर पर इंडियन एक्सप्रेस में हुए भंडाफोड़ के बाद, ऐसा लगता है कि चुनाव को पूरी तरह से निरर्थक ही बना देने का पूरा बंदोबस्त किया जा चुका है।
चुनाव आयोग के काम-काज के संबंध में पिछले हफ्ते-दस दिन में हुए रहस्योद्घाटन से और इन रहस्योद्घाटन पर देश भर में हुई व्यापक प्रतिक्रिया के सामने, समूची चुनाव प्रक्रिया को भीतर से ध्वस्त करने के अपने खेल को बचाने की कोशिश में, सत्ताधारियों के दबाव में चुनाव आयोग द्वारा बैठक कर जारी की गयी 'सर्वसम्मत विज्ञप्ति' में नीति-परोक्ष रूप से कबूल की गयी गड़बड़ियों से, एक केंद्रीय सच्चाई निकल कर आती है। यह सच्चाई है, 140 करोड़ आबादी और करीब 100 करोड़ मतदाताओं के इस विशाल देश में, चुनाव व्यवस्था के बुनियादी कामों/ निर्णय प्रक्रियाओं का पूरी तरह से केंद्रीयकरण। यह केंद्रीयकरण, सारी चुनाव व्यवस्था राजधानी में बैठे केंद्रीय चुनाव आयोग के हाथों में केंद्रीयकरण तक ही सीमित नहीं रहता है। यह तीन सदस्यीय चुनाव आयोग में भी वास्तविक शक्ति, एकलौते मुख्य चुनाव आयुक्त और उसके आदेश से बंधे अधीनस्थों के गुट के हाथों में सिमट जाने पर जाकर मुकम्मल होता है। और इस गुट की डोरियां सत्ता के शीर्ष पर बैठी जोड़ी के हाथ में है, जो नये कानून के अंतर्गत चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति भी है।
बेशक, चुनाव आयोग में भी मुख्य चुनाव आयुक्त के हाथों में शक्तियों के इस केंद्रीयकरण को, हाल के रहस्योद्घाटन से एक बड़ा धक्का लगा है। इन रहस्योद्घाटन में यह जानकारी खास थी कि पिछले दस महीनों में ही कम से कम 14 मौकों पर, मुख्य चुनाव आयुक्त के इतर, अन्य चुनाव आयुक्तों ने आयोग के अलग-अलग निर्णयों पर अपनी आपत्तियां/ असहमतियां दर्ज करायी थीं। कुछ मामलों में दो चुनाव आयुक्तों ने एक ही मुद्दे पर अलग-अलग अपनी आपत्तियां दर्ज करायी थीं, जो वास्तव में चुनाव आयोग का बहुमत होता था। चुनाव आयोग संबंधी कानूनों के अनुसार, आयोग के निर्णय सर्वसम्मति से और सर्वसम्मति से संभव न हो तो, बहुमत के आधार पर लिए जाने चाहिए। किंतु अल्पमत में होते हुए भी, निर्णय की प्रक्रिया को तोड़-मरोड़कर मुख्य चुनाव आयुक्त के निर्णय को, कई मामलों में चुनाव आयोग का निर्णय बनाकर लागू कर दिया गया।
यह खासतौर पर मतदाता सूचियों में नाम जोड़ने/हटाने के सारे अधिकार ईसीआईनेट नाम के पूरी तरह से केंद्रीयकृत कंप्यूटर तंत्र के हवाले किए जाने की महाविकृति के रूप में सामने आया। और इसी प्रकार नये मतदाताओं से भरवाए जाने वाले फार्म-6 में अवैध संशोधन की एक और बड़ी विकृति के रूप में भी सामने आया। यह अवैध संशोधन, जिसे जोड़ने का चुनाव आयोग को कोई अधिकार ही नहीं है, 2026 से बनने वाले नये मतदाताओं के लिए, उनके माता-पिता या उनके भी माता-पिता की 2002 की मतदाता सूचियों में मौजूदगी की शर्त लगाता है, जोकि मताधिकार देने लिए पीढ़ी दर पीढ़ी निवास की निरंतरता साबित करने मांग करना है। हैरानी की बात नहीं है कि चुनाव आयोग द्वारा बिहार के विधानसभा चुनाव से पहले, पिछले साल मध्य से शुरू किए गए मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण या एसआईआर को शुरू से ही पिछले दरवाजे एनआरसी यानी राष्टï्रीय नागरिक रजिस्टर तैयार करने की प्रक्रिया कहा जा रहा था, जो संघ परिवार का प्रिय प्रोजेक्ट है।
ईसीआईनेट के माध्यम से मतदाता सूचियों में बदलावों के पूरी तरह से केंद्रीयकरण के संदर्भ में यह याद रखना जरूरी है कि भारत के चुनावी कानूनों के हिसाब से विधानसभाई क्षेत्र स्तर के अधिकारी, ईआरओ को ही मतदाता सूचियों में नाम जोड़ने/हटाने का वैध अधिकार है। उससे नीचे की शृंखला बूथ लेवल आफिसर या बीएलओ तक जाती है और यही मतदाता सूचियों में बदलाव का तंत्र है। यह व्यवस्था ढांचागत रूप से यह सुनिश्चित करती है कि मतदाता सूचियों में स्थानीय रूप से गड़बड़ियां तो रह सकती हैं, लेकिन बड़े पैमाने पर गड़बड़ी संभव ही नहीं है। बहरहाल, जैसा कि गोवा का चर्चित हुआ सौ से कुछ कम मतदाताओं के नाम जोड़े जाने के लिए, राज्य के मुख्य चुनाव अधिकारी के नाकाम संघर्ष का प्रकरण बताता है, ईसीआईनेट के जरिए मतदाता सूचियों में बदलाव की प्रक्रियाओं समेत इन सूचियों का इस हद तक केंद्रीयकरण कर दिया गया है कि, राज्य का मुख्य चुनाव अधिकारी तक उन तक पहुंच नहीं सकता है, फिर ईआरओ को पहुंच हासिल होने का तो सवाल ही कहां उठता है? यह दूसरी बात है कि यह इस पूरी व्यवस्था को ही अवैधानिक बना देता है।
ईसीआईनेट का और उसके नियंत्रकों का अचानक इतना ताकतवर हो जाना, कोई संयोग ही नहीं है। यह तानाशाही के प्रोजेक्ट का नया हथियार है, जो उन्नत प्रौद्योगिकी ने मुहैया कराया है। तानाशाहों और तानाशाहियों को हथियार के रूप में उच्च-प्रौद्योगिकी हमेशा पसंद आती है। और यह इसलिए तो होता ही है कि इस तरह तानाशाहियों की लोगों को नियंत्रित करने की शक्ति बहुत बढ़ जाती है। ऐसा इसलिए भी होता है कि तानाशाहियां ऐसी प्रौद्योगिकियों की मानवीय कीमत की ओर से पूरी तरह से आंखें बंद किए रख सकती हैं। अक्सर तानाशाह कम पढ़े तथा सांस्कृतिक रूप से दरिद्र होते हैं, क्योंकि यह उनके लिए अपने किए की मानवीय कीमत की ओर से आंखें मंूदें रखकर, अपने प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाते रहना आसान बनाता है— जैसे मोदीशाही के लिए हिंदू राष्ट्र की परियोजना को आगे बढ़ाना।
यहां हम एसआईआर पर आ जाते हैं, जो उच्च-प्रौद्योगिकी और हिंदू-राष्ट्र के इसी गठबंधन को सामने लाता है। सभी जानते हैं कि एसआईआर की जरूरत, जो कि वास्तव में नये सिरे से और भारतीय मूल की छन्नी में छानकर, अपात्रों को बाहर करते हुए मतदाता सूचियां तैयार करने की और इसीलिए इस देश की आबादी के विशाल हिस्से के लिए बहुत ही तकलीफदेह तथा करोड़ों लोगों को बाहर करने वाली प्रक्रिया है, सत्ताधारी संघ-भाजपा परिवार के एक अंधाधुंध प्रचार से बनी धारणा पर टिकी हुई थी। यह धारणा यह है कि बहुत बड़ी संख्या में विदेशी घुसपैठिए चोरी-छिपे आकर यहां बस गए हैं। इस पूरी कसरत का एक ही मतसद था—मतदाता सूचियों को इन 'घुसपैठियों' से 'स्वच्छ' करना! चूंकि घुसपैठियों की विशाल संख्या एक मिथक है, इसलिए इस छन्नी से वास्तविक घुसपैठियों की कोई उल्लेखनीय संख्या निकलने के तो अब तक कोई साक्ष्य नहीं हैं, जबकि देश के बड़े हिस्से में एसआईआर की प्रक्रिया लगभग पूरी हो चुकी है, जबकि करोड़ों ऐसे कमजोर हैसियत के भारतीयों को इस छन्नी से छानकर बाहर किया जा चुका है, जिनके पास अपने वास्तव में भारतीय होने के दस्तावेजी साक्ष्य नहीं हैं। और चूंकि यह हिंदुत्व द्वारा उच्च प्रौद्योगिकी को हथियार बनाने का मामला है, जाहिर है कि इस छन्नी ने बाकी गरीबों के साथ, मुसलमानों की खासतौर पर ज्यादा से ज्यादा संख्या को बाहर करने की कोशिश की है।
जाहिर है कि यह पूरी कसरत, इस तरह के केंद्रीयकृत औजार के बिना संभव ही नहीं थी। और जो चीज बिल्कुल ही संभव नहीं थी, वह थी मतदाताओं की लक्षित छंटनी। बिहार में चूंकि दस्तावेजों के रास्ते से अल्पसंख्यकों की टारगेटेड छंटनी में ज्यादा कामयाबी नहीं मिली थी, अगले चरण में बंगाल में दस्तावेजी जांच के बाद, कंप्यूटर के एल्गोरिद्ïम के सहारे एक और छन्नी जोड़ दी गयी—लॉजिकल डिस्क्रीपेंसी। इस छन्नी से बाहर हुए लोगों में से जिन्हें न्यायिक प्रक्रिया ने मतदाताओं की सूची में बहाल कर दिया, उनमें से भी 15 लाख से ज्यादा लोगों के मतदाता सूची से बाहर किए जाने अर्जी, खुद चुनाव आयोग की ओर से लगायी गयी! और यह भी, जैसा कि अब हमें पता चल चुका है, चुनाव आयोग के बहुमत को अंधेरे में रखकर किया जा रहा था। ईसीआईनेट के रूप में उच्च प्रौद्योगिकी के जरिए जबर्दस्त केंद्रीकरण और उसके उतने ही केंद्रीकृत नियंत्रण के बिना, यह कभी संभव ही नहीं था।
यहां से चुनाव का ही निरर्थक बनाया जाना एक कदम दूर भी नहीं रह जाता है। मोदीशाही ने अपने मंसूबे साफ कर दिए हैं। क्या जनतंत्र की ताकतें इन मंसूबों को विफल करने के लिए तैयार हैं?


