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तमसो मा ज्योतिर्गमय

अभी आंदोलन से उभरी आग यह ठंडी पड़े उससे पहले रांची के बच्चों ने अपने प्रदेश की प्रतियोगिता परीक्षाओं की बदहाली के सवाल को उठाया।

तमसो मा ज्योतिर्गमय
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  • अरविन्द मोहन

आज शिक्षा का महत्व पहले के किसी समय से ज्यादा हो चुका है। यह भी हो गया है जिनके पास पैसा और पहुंच है वे ऊंची डिग्रियां और नौकरी पा सकते हैं और लाख छात्रवृत्ति मिले या बैंक कर्ज दें लेकिन समाज के ज्यादातर लोगों के लिए अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देना और अच्छा रोजगार दिलाने वाली शिक्षा दिलाना असंभव होता गया है।

25 फरवरी को केन्द्रीय मानव संसाधन उर्फ शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे के बाद जब संसद में प्रतियोगिता परीक्षाओं का सवाल लीक होना रोकने के लिए बहुत सख्त कानून बनाने के विधेयक पर चर्चा हो रही थी तो उसमें पक्ष और विपक्ष दोनों तरफ के सदस्यों द्वारा दिए भाषणों को पढ़कर कोई भी व्यक्ति शिक्षा नीति के मामले में ज्ञानी बन सकता है। मौजूदा प्रतियोगिता प्रणाली संचालित करने वाली व्यवस्था की खामियों समेत शिक्षा, अभी की शिक्षा नीति, उसमें बदलाव, समाज के हित बनाम बाजार के हित जैसे हर विषय पर सदस्यों ने बहुत गंभीरता के साथ चर्चा की। हालांकि इस चर्चा के आखिर में राजनीति रंग दिखाने लगी लेकिन किसी भी पक्ष ने बिल के खिलाफ या इसके सख्त प्रावधानों के खिलाफ जाने की हिम्मत नहीं की। तब तक जंतर मंतर में जमा बच्चे घर लौट गए थे और मोदी को झुकाने वाली महाबली अभिजीत दिपके हों या सोनम वांगचुक अपने मूल कद की तरफ लौटने लगे थे।

वामपंथी छात्र जरूर आंदोलन फैलाने की रणनीति पर काम करते दिखे परन्तु विपक्ष ने उसी समय प्रधान के इस्तीफे के बाद गृह मंत्री अमित शाह और प्रधानमंत्री के इस्तीफे या बयान या माफी की बात जोर-शोर से उठाई तो सत्ता पक्ष के लोग धर्मेन्द्र प्रधान का स्वागत ऐसे अंदाज में करने लग गए मानो कोई जंग जीतकर लौटे हों। अब तो प्रधान भी शिक्षा नीति और बच्चों के आंदोलन पर बोलना शुरू कर चुके हैं।

अभी आंदोलन से उभरी आग यह ठंडी पड़े उससे पहले रांची के बच्चों ने अपने प्रदेश की प्रतियोगिता परीक्षाओं की बदहाली के सवाल को उठाया। शायद देश के किसी भी प्रदेश की तुलना में झारखंड इस मामले में सबसे खराब रिकार्ड रखता है और वहां धर-पकड़ नामक चीज भी दिखाई नहीं देती थी। इस बार के आंदोलन से चीजें सुधार की दिशा में बढ़ी हैं और कितना बढ़ती हैं इस पर नजर रखनी चाहिए। रांची का मुद्दा और टाइमिंग बच्चों के हिसाब से एकदम ठीक था पर इसमें तुरंत भाजपा को वापसी का अवसर दिखा और उसने हर स्तर पर दखल देना शुरू किया और जंतर मंतर पर उसके साथ ही धुनी गई मीडिया को भी यहां अवसर लगा और उसके लोग भी छात्रों के हितरक्षक बनकर रांची पहुंचे या उसका कवरेज काफी ढंग से शुरू किया।

राहुल गांधी तो जांच और सजा की बात करके किनारे रहे लेकिन झारखंड सरकार जरूर घिरती गई-हालांकि दिल्ली की तुलना में पुलिस जुर्म बहुत कम हुआ और कई स्तर पर जरूरी कदम भी उठाए। एकाध मसले में सीबीआई और ईडी से जांच कराने पर सवाल अटका क्योंकि राज्य सीआईडी का मतलब अगर राज्य सरकार का पिठ्ठू एजेंसी है तो सीबीआई का मतलब केंद्र का।

इस लड़ाई का हिसाब बढ़ाने का कोई मतलब नहीं है क्योंकि भाजपा के नेताओं को सिर्फ गैर-एनडीए राज वाले पेपर लीक याद आते हैं तो कांग्रेस और विपक्षी नेताओं को भाजपा शासन वाले। नब्बे और सौ लीक के प्रसंग सामने हैं आपको जो मन हो उठाइए और अपने राजनैतिक विरोधी को घेरिए। आपको फिर यह भी याद नहीं आएगा कि आज तक सीबीआई लीक वाली जांच के एक भी मामले को सुलझा नहीं पाई है। आपको यह भी याद नहीं रहेगा कि इसी मोदी सरकार ने 2024 के नीट पेपर लीक के बाद जो कानून बनाया था वह कहां गया? और क्या कर रहा है? आपको यह भी याद नहीं आएगा कि परचा लीक मामले में दोषियों को सजा देने का मामला एक डेढ़ फीसदी ही क्यों है और लगभग सभी प्रमुख आरोपी किस तरह जमानत पर छूटकर अपने धंधे में लग जाते हैं। रांची का एक मुख्य अभियुक्त 35 में से 34 प्रतियोगिताओं में पास हो गया है और उसके सारे रिश्तेदार भी पास हुए हैं। कई तो विधायक तक बने हैं- मंत्री और संतरी के साथ उनका फ़ोटो होना तो शान की चीज मानी जा सकती है।

सो जब तक हम इन चीजों से मुक्त नहीं होंगे शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी चीजों के बिगड़ाव को नहीं समझ पाएंगे और न कोई उपाय कर पाएंगे। यही मोदी सरकार जाने क्या-क्या बोलकर सत्ता में आई है लेकिन इसके राज में लगातार शिक्षा का बजट गिरते हुए दो-ढाई फीसदी पर आ गया है। जहां सरकार सारे देश के पाठ्यक्रम और प्रतियोगिता परीक्षाओं के सूत्र अपने हाथ में रखने में जुटी हैं वहीं मौका आने पर जवाबदेही टालने और शिक्षा को समवर्ती सूची का विषय बताने में उसे कोई दिक्कत नहीं होती। अकेले उत्तर प्रदेश में सत्तर हजार से ज्यादा प्राइमरी स्कूल बंद हो गए हैं लेकिन सरकार की नजर मदरसों और मिशन स्कूल को बंद कराने और विदेशी विश्वविद्यालयों को बुलाने पर लगी है। निजी विश्वविद्यालय या मेडिकल/ इंजीनियरिंग/ मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट खुलवा कर उसे अपनी उपलब्धि बताना आम है। कांग्रेस भी जिम्मेदारियों से नहीं बच सकती क्योंकि जिस दिन उसकी सरकार ने शिक्षा मंत्रालय का नाम मानव संसाधन विकास मंत्रालय किया उसी दिन शिक्षा को सरकारी हाथों से हटाकर बाजार के हवाले करने का अभियान शुरू हुआ।

पहले थोड़ा बहुत प्राइवेट ट्यूशन चलता था लेकिन कोचिंग का कारोबार उसके बाद से ही आसमान में पहुंचा है। पचास हजार करोड़ से ज्यादा का कोचिंग बिजनेस हो और दो-तीन हजार में बनाया जाने वाला प्रश्नपत्र लीक न हो यह तो घोर कलयुग में सतयुगी आचरण की उम्मीद करना जैसा है। ऐसा ही क्रम और बदलाव स्वास्थ्य के मामले में भी गिनवाया जा सकता है लेकिन वह विषय को मजबूती देने के साथ भटका भी सकता है। आज दिल्ली, रांची और लगभग हर बड़े शहर में पेपर लीक, कोचिंग व्यवसाय, शिक्षा संस्थाओं में भगवाकरण (कभी यह अभियान कम्युनिस्ट विचारधारा के लोगों को भरने का भी चलता था)।

पाठ्यक्रम को संघ या बाजार के एजेंडे पर ले जाना, शिक्षा का उद्देश्य ज्ञानवृद्धि या बौद्धिक विकास की जगह नौकरी पाना और परीक्षा पास करने तथा शिक्षा का बजट कम से कम करते जाने वाली मौजूदा व्यवस्था के खिलाफ बच्चों से लेकर बड़ों के बीच जो बेचैनी दिख रही है वह नई शुरुआत कराने का अवसर भी पैदा करती है। आज शिक्षा का महत्व पहले के किसी समय से ज्यादा हो चुका है। यह भी हो गया है जिनके पास पैसा और पहुंच है वे ऊंची डिग्रियां और नौकरी पा सकते हैं और लाख छात्रवृत्ति मिले या बैंक कर्ज दें लेकिन समाज के ज्यादातर लोगों के लिए अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देना और अच्छा रोजगार दिलाने वाली शिक्षा दिलाना असंभव होता गया है।

सरकारी शिक्षण संस्थानों की गिरावट, उनकी भी फीस के आसमान पर पहुंचने से ऊपर आने का दूसरा और समांतर रास्ता भी बंद सा हो गया है। इस हंगामे की ऊर्जा का प्रयोग करते हुए हमको-आपको तो हल्ला बोलना चाहिए और राजनेताओं को भी अपना इतिहास भूलकर नई शुरुआत करनी चाहिए वरना बरसों से रच बसाकर जो इमेज बनाई गई थी उसे जंतर मंतर ने जैसे ध्वस्त किया वैसे सबका बुरा हाल होने में ज्यादा वक्त नहीं है।


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