खुशबू आ नहीं सकती कभी कागज के फूलों से
दस अक्टूबर को कॉकरोच जनता पार्टी की रैली थी और केंद्र सरकार ने उसे रोकने के लिए उसके खिलाफ पचास हजार पुलिस तैनात करने, पचास से ज्यादा मेट्रो स्टेशन बंद करने, अनेक गाड़ियों को बंद करने और नेट पर भी सीमित रोक का प्रयास किया तो सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी थी कि आप मक्खी मारने के लिए हथौड़ा चला रहे है

जेन जी की नाराजगी कम होने के प्रमाण नहीं हैं और उन्हें पटाने का मोदीजी का संघ प्रमुख का शुरुआती प्रयास इस बार जाने कहां गया पता नहीं है। इस पूरे दौर में भाजपाई नेता और मीडिया से यह शब्द गायब ही रहा है। विपक्ष पर तो आप षड्यंत्रकारी और अराजक होने का आरोप लगा सकते हैं लेकिन युवाओं की तरफ से तो अभी प्रधान और ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे के अलावा कोई मांग नहीं आई है और दोनों के पीछे ठोस वजह है।
दस अक्टूबर को कॉकरोच जनता पार्टी की रैली थी और केंद्र सरकार ने उसे रोकने के लिए उसके खिलाफ पचास हजार पुलिस तैनात करने, पचास से ज्यादा मेट्रो स्टेशन बंद करने, अनेक गाड़ियों को बंद करने और नेट पर भी सीमित रोक का प्रयास किया तो सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी थी कि आप मक्खी मारने के लिए हथौड़ा चला रहे है। इस रैली के बीतने और उससे दो दिन पहले से विपक्ष के नेता राहुल गांधी तथा इंडिया गठबंधन की ज्ञानेश कुमार विरोधी मुहिम के जोर पकड़ने के बाद अब सरकार और भाजपा की तरफ से जो काम किया जा रहा है उसे हथौड़ा उठाने की मक्खी की कोशिश मान सकते हैं।
तेरह करोड़ से ज्यादा मतदाताओं का नाम काटने के बाद चुनाव आयोग के अंदर के मतभेद, ज्ञानेश कुमार को मिली देश की सबसे बड़ी इम्युनिटी और नियुक्ति की प्रक्रिया में बदलाव का फैसला जहां सरकार को ज्यादा सवालों से घेर रहा है वहीं वह कभी देश में अराजकता फैलाने तो कभी विदेशी षड्यंत्र, कभी एक कांग्रेसी सांसद पर लगे सेक्सुअल हैरासमेंट के विवादास्पद आरोप तो कभी किसी आंदोलनकारी के मुंह से निकले 'रीजीम चेंज' जैसे पद को लेकर विपक्ष की घेराबंदी करना चाहती है और कोई बात जोर नहीं पा रही है।
भाजपा और उसके रणनीतिकारों ने हवा का रुख तो भांपा है, वे कुछ डरे भी लगते हैं और वे अपनी क्षमता भर प्रयास भी करने लगे हैं लेकिन उन्होंने न तो ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग द्वारा की गई गलतियों को सुधारने (मतदाता सूची में सुधार का दिखावा करने वाले कुछ हल्के फैसले हुए हैं) की कोशिश की है और न ही अपने खिलाफ लगातार ताकतवर दिखते राजनैतिक जमावड़े में दरार लाने या उसको कमजोर करने की किसी रणनीति पर काम किया है। ले-देकर रोज जो नई चाल दिखती है और शाम को टीवी चैनलों की चर्चा और खबरों में दिखती है। इससे मतदाता सूची में हुआ इतना भारी बदलाव और नागरिकता, मतदान के अधिकार ही नहीं नौकरी और सरकारी सुविधाओं से वंचित किये जाने जैसे अभियान से पैदा नाराजगी को थामना मुश्किल लग रहा है। यह बात पहले ज्ञात थी कि चुनाव आयुक्त की नियुक्ति प्रक्रिया में बदलाव हुआ है लेकिन उनको इतने विशेषाधिकार दे दिए गए हैं कि सुप्रीम कोर्ट के जज और राष्ट्रपति तक के अधिकार पीछे रह गए हैं। इंडियन एक्सप्रेस की खबर के बाद से मजबूत होती ज्ञानेश कुमार विरोधी हवा में यह भी सामने आ रहा है कि जिनका नाम कटा है उनको नौकरी पाने और राशन वगैरह जैसी सुविधाओं से भी वंचित किया जा रहा है। और गलती सुधार के नाम पर जो प्रयास हुआ है उसमें तरीका अभी भी मुश्किल है। अब यह जानकारी भी सामने आई है कि बंगाल की सूची में रिवीजन के समय इंट्री करने या कारेक्शन के लिए बीएलओ जैसे लोग तकनीकी रूप से सक्षम ही नहीं थे।
इसके साथ ही यह भी हुआ है कि लगभग बिखर चुका इंडिया गठबंधन फिर से जीवंत बन गया है और ममता बनर्जी उस मोर्चे पर दिखने लगी हैं। यह भी खबर है कि जगनमोहन रेड्डी अपने दल के साथ वहां वापसी चाहते हैं जबकि उन्होंने चुनाव आयुक्त की नियुक्ति के सवाल पर भाजपा का साथ देने की गलती सार्वजनिक रूप से स्वीकार ली है। उधर बीजू जनता दल भी इस सवाल पर इंडिया गठबंधन के साथ आने में नहीं हिचका जबकि द्रमुक लाख कोशिश के बावजूद एनडीए के साथ नहीं गया है।
दूसरी ओर चिराग पासवान ने नौजवानों के आंदोलन के साथ हुए व्यवहार पर नाराजगी दिखाई है और एनडीए के कई घटक दम साधे तमाशा देख रहे हैं। कई राज्यों के स्थानीय निकाय चुनाव में भी हवा बदलने के संकेत दिखने लगे हैं जबकि भाजपा के कई लोग सपा और उन दलों का रुख करते दिखा रहे हैं जिनके अगले चुनाव में बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद दिखती है। ऐसा खास तौर से उत्तर प्रदेश में दिखता है जहां सरकार में शामिल ओम प्रकाश राजभर का व्यवहार बदला है।
आंदोलन पर विदेशी षड्यंत्र और अराजकता का आरोप लगाने का अभी तक कोई ठोस आधार या प्रमाण पेश नहीं किया गया है। और आज के ग्लोबल जहां में किसकी दिलचस्पी कहां नहीं है, खासकर भारतीय मूल के लोगों की दिलचस्पी को आप दखल बताएं या षड्यंत्र करार दें तो इससे इतना भारी आरोप नहीं कटता। भारतीय मूल के विदेशी नागरिकों का समर्थन हाल तक मोदीजी के प्रति ही दिखता था। सो कायदे से यह मंथन होना चाहिए कि यह पढ़ा-लिखा और जानकार समूह क्यों दूर हुआ है।
जेन जी की नाराजगी कम होने के प्रमाण नहीं हैं और उन्हें पटाने का मोदीजी का संघ प्रमुख का शुरुआती प्रयास इस बार जाने कहां गया पता नहीं है। इस पूरे दौर में भाजपाई नेता और मीडिया से यह शब्द गायब ही रहा है। विपक्ष पर तो आप षड्यंत्रकारी और अराजक होने का आरोप लगा सकते हैं लेकिन युवाओं की तरफ से तो अभी प्रधान और ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे के अलावा कोई मांग नहीं आई है और दोनों के पीछे ठोस वजह है। जो युवा कल तक कांग्रेसी प्लेटफार्म से अलग थे और खुलकर राहुल के साथ दिखते हंै, और उस तरफ से उनको गले लगाया जा रहा है। अकीमोल विमल पर आरोप और एक्शन भी विवादास्पद है लेकिन उसमें भी इतना दम नहीं है कि इतने बड़े मुद्दे को काट डाले।
अब सरकार और भाजपा क्या करे या कांग्रेस क्या करे इस सवाल पर विचार तो उन दलों के लोगों को करना है लेकिन साफ दिख रहा है कि जहां कांग्रेस और इंडिया गठबंधन में नई जान आई है और वह तथा उनका आंदोलन वाला मुद्दा एनडीए खेमे के करीब पहुंचे अनेक दलों के मन में संशय उत्पन्न करने में कामयाब हुआ है वहीं भाजपा विपक्ष के बिखराव को बढ़ाने और वहां के राहुल और कांग्रेस-विरोधी जमात को अपने पक्ष में करने में विफल हुआ है।
ममता तो अब इंडिया गठबंधन का हिस्सा बनकर बोल रही हैं लेकिन अरविन्द केजरीवाल और आप ज्यादा राहुल विरोध नहीं चला पा रहे हैं। उनके लोगों ने नए जिस कॉकरोच जनता पार्टी का सबसे मजबूती से साथ दिया उसके नेता राहुल के पास जाकर प्रसन्न हो रहे हैं। सारे वामपंथी युवा भी कांग्रेस के साथ जाने में किसी तरह की हिचक नहीं दिखा रहे हैं। साफ लग रहा है कि जब तक भाजपा मतदाता सूची के गहन पुनरीक्षण के सवाल पर ज्ञानेश कुमार के फैसलों से दूरी नहीं बनाती और विपक्षी जमावड़े में किसी तरह की सेंध नहीं लगाती तब तक बनावटी मसले टीवी चर्चा में भले आ जाएं लोगों के मन पर नहीं चढ़ेंगे।
आखिर कौन सा आंदोलन सरकार बदलने की बात नहीं करता कि आप 'रीजीम चेंज' को बिना कोई प्रमाण दिए षड्यंत्र साबित करने में लगे हैं। और जिन्हें तख्तापलट करना होगा वे इस तरह घोषणा नहीं करते। लगता यही है कि इन लोगों ने यह यह गाना तो सुना नहीं होगा कि 'खुशबू आ नहीं सकती कभी कागज के फूलों से।'


