किफायत तो छोड़िए नाटक भी नहीं चलेगा
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खाड़ी युद्ध से पैदा आर्थिक हालात का जिक्र करते हुए लोगों को चेताया और कुछ कड़े कदम उठाने का संकेत दिया तब तक युद्ध ढलान पर आ गया था और सुलह की बात काफी आगे बढ़ गई थी।

इससे बड़ा गुनाह तेल की जगह वैकल्पिक ऊर्जा का खयाल न करने से हो रहा है। इधर सोलर और बिजली आधारित वाहनों का जोर दिखाता है लेकिन वह कु छेक कंपनियों और अमेरिका-चीन को खुश रखने के लिए हो रहा है या सचमुच का विकल्प देने के लिए यह निर्णय कठिन है। लेकिन अचानक कोयला और थर्मल पावर का उपयोग थाम देने रहस्य समझना मुश्किल है।
बंगाल समेत चार राज्यों के चुनाव बीत जाने के बाद एक दिन जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खाड़ी युद्ध से पैदा आर्थिक हालात का जिक्र करते हुए लोगों को चेताया और कुछ कड़े कदम उठाने का संकेत दिया तब तक युद्ध ढलान पर आ गया था और सुलह की बात काफी आगे बढ़ गई थी। सौभाग्य से कई उतार-चढ़ाव देखने के बाद सुलह हो भी गई है। सरकार को भी तेल और गैस की कीमतें की किस्तों में बढ़ानी पड़ीं लेकिन उतनी नहीं जितने की आशंका हो गई थी। उसकी एक वजह तो यह थी कि लंबे समय से सरकार ने तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों की गिरावट पर अपने यहां कीमत कम करने की जगह कर बढ़ाकर लोगों से 'देश के विकास' में सहयोग की अच्छी खासी वसूली कर ली थी। और उसका एक हिस्सा गंवा कर चुनाव जीतना अच्छा सौदा था। हमारी लोकल कीमतों में इतना मार्जिन रहा कि सरकार उसे बर्दाश्त करके अपने चुनावी भविष्य को बिगड़ने से रोक ले। राष्ट्र के नाम देर से जारी अपने इस संबोधन में प्रधानमंत्री ने किफायत बरतने की सलाह भी दी और खुद के काफिले में सिर्फ चार गाड़ियां रहने दी। अब प्रधानमंत्री ऐसी पहले करें और देश स्तर पर यह प्रयास चले न चले कम से कम भाजपाई मंत्रियों और नेताओं को तो अपना स्कोर बढ़ाना था। दनादन किसी के साइकिल से दफ्तर जाने, किसी के बैलगाड़ी से जाने तो किसी के अपना काफिला कम करने की खबरें आने लगी। खबर क्या आई, वीडियो आए।
मई महीने में, जिसके एक हफ्ते का समय तो चुनाव नतीजों की घोषणा वगैरह में बीत चुका था, पूरे इकत्तीस दिन भी नहीं बीते और पेट्रोल की खपत में 6.5 फीसदी की कमी का आंकड़ा सामने आ गया। एलपीजी की खपत में छह फीसदी और डीजल की खपत में 3.6 फीसदी की गिरावट देखने को मिली। और अगर तीन हफ्ते की दिखावटी किफायत का यह असर रहा तो यही कामना करनी चाहिए की यह नौटंकी जारी रहे। दुखद यह है कि महीना नहीं बीता कि प्रधानमंत्री समेत सभी इस अभियान को भूल से गए हैं। कायदे से होना यह चाहिए थी कि इस पोजिटिव खबर के बाद इस अभियान को ज्यादा व्यवस्थित किया जाता और जोर-शोर से चलाया जाता- अगर स्वच्छता मिशन जैसा नहीं भी तो 'मैं भी चौकीदार' और 'मेक इन इंडिया' टाइप ही सही। कहना न होगा कि ऊर्जा की बचत का मसला हमारे लिए कितना बड़ा और जरूरी है, यह इस बार के खाड़ी संकट ने दिखा दिया। ऐसा हर बार खाड़ी में विवाद के समय होता था लेकिन इस बार तो हम युद्ध में किसी भी पक्ष की तरफ झुके भी न थे और ऊर्जा संकट की मार हर किसी को भोगनी पड़ी।
इस संकट में एक रास्ता वह है जो प्रधानमंत्री जी ने दिखाया और कायदे से उनको अब भी इसे जोर-शोर से चलाना चाहिए। हमारे यहां गैस की खपत में कमी की गुंजाइश तो नहीं है क्योंकि गैस को शौकिया या दिखावे के लिए खर्च करने का अनुभव हमें नहीं है। लेकिन पेट्रोल और डीजल की खपत में तो काफी बड़ा हिस्सा दिखावा और नकली प्रतिष्ठा के लिए होता है। जाहिर तौर पर इस काम में सरकार के सबसे बड़े लोग सबसे आगे होते हैं और प्रधानमंत्री ने अपने काफिले में कटौती करके यह जता दिया कि उनको मर्ज की सही जानकारी है। मुल्क का नेता होने के चलते उनकी यह जवाबदेही भी है कि वे इस अभियान को आगे बढ़ाएं, अपने मंत्रियों, सांसदों, विधायकों, अधिकारियों, पार्टी पदाधिकारियों में किफायत की आदत विकसित कराएं और जो कोई फिजूलखर्ची करता मिलता है उसे दंडित करें। तेल की खपत कम करने के लिए निजी वाहनों की जगह सार्वजनिक परिवहन पर जोर दें और उस व्यवस्था की मौजूदा उपेक्षा का दौर खत्म करें। देश में जो शानदार रेल और सड़कों का जाल बिछा है उसका इस्तेमाल सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था को सुचारु करने के लिए करें। यह लोगों को सुविधा और रोजगार देने के साथ देश की बाहरी तेल पर निर्भरता को कम करेगा।
इतना ही जरूरी ऊर्जा के साधनों का देसी विकास भी है। अभी बहुत दिन नहीं हुए जब देश अपनी जरूरत का लगभग चालीस फीसदी तेल अपने यहां से निकाल लेता था। आज यह दस फीसदी के नीचे चला गया है। जब तेल निकालने में देसी निजी कंपनियों को उतारा गया तो उनसे महंगे करार हुए लेकिन अब उन महंगे करारों से भी उनको मुक्ति देकर लूट को बढ़ावा दिया गया है। गैस का हमारा भंडार आज भी उपयोग में लाने की जगह यूं ही जलाया जाता है। और जिस तरह सरकार को तेल निर्यात का धंधा कमाई का रास्ता दिख रहा है वही हाल हमारी सरकारी और निजी तेल कंपनियों और रिफायनरियों का है। यह सर्वविदित है कि हमारी रिफायनिंग की क्षमता उत्पादन से कई गुना ज्यादा है। हम तेल मंगाते हैं, साफ करते हैं और उसका निर्यात कर मुनाफा कमाते हैं। सरकारी पेट्रोलियम कंपनियां तेल मंगाती हैं और अपने ही देश वालों को बेचकर मोटा मुनाफा वसूलती हैं और जब आप इस पूरे खेल को गौर से देखेंगे तभी समझ आएगा कि सरकार पेट्रोलियम पदार्थों को जीएसटी के दायरे में क्यों नहीं लाना चाहती। अगर वह और राज्य सरकारें कर से मोटा कमाई करती हैं तो उसकी तेल कंपनियां और रिफायनरीज भी कमाई में होड़ लगाए हुई है। सिर्फ यह खेल खत्म हो जाए तो लोगों के लाखों करोड़ रुपये बचेंगे।
लेकिन इससे बड़ा गुनाह तेल की जगह वैकल्पिक ऊर्जा का खयाल न करने से हो रहा है। इधर सोलर और बिजली आधारित वाहनों का जोर दिखाता है लेकिन वह कु छेक कंपनियों और अमेरिका-चीन को खुश रखने के लिए हो रहा है या सचमुच का विकल्प देने के लिए यह निर्णय कठिन है। लेकिन अचानक कोयला और थर्मल पावर का उपयोग थाम देने रहस्य समझना मुश्किल है। एक घोषित कारण तो कार्बन उत्सर्जन संधि पर दस्तखत करना और कार्बन क्रेडिट बेचने का खेल समझ आता है। जिस देश के पास अगले चार-पांच सौ साल तक की जरूरत लायक कोयला हो वह उसका उपयोग इन कारणों से कम कर दे यह समझ नहीं आता। कोयले से गैस बनाकर उसका इस्तेमाल करने वाला उपकरण भी विकसित हुआ था लेकिन वह कहां गायब हो गया इसे कोई नहीं पूछता। जब उसकी जगह आने वाले तेल में लाखों करोड़ का खुला खेल हो, सोलर पैनल और इलेक्ट्रिक वाहनों की खरीद में बड़े खेल हों तो कोयले का कालिख मनमोहन सरकार ही अपने मुंह पर लगा सकती थी, मोदी सरकार नहीं। इसलिए यह उम्मीद भी छोड़ ही दीजिए कि किफायत का मौजूदा अभियान आगे बढ़ेगा-भले ही उसके लाभ पहले ही महीने में इतने साफ दिखे हैं।


