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विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम: सुरक्षा बनाम स्वतंत्रता

यह विधेयक सकारात्मक कदम है जो किसी भी धार्मिक समुदाय के खिलाफ नहीं है और केवल गैर-कार्यशील संस्थाओं की परिसंपत्तियों के प्रबंधन पर लागू होगा।

विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम: सुरक्षा बनाम स्वतंत्रता
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— अरूण डनायक

यह विधेयक सकारात्मक कदम है जो किसी भी धार्मिक समुदाय के खिलाफ नहीं है और केवल गैर-कार्यशील संस्थाओं की परिसंपत्तियों के प्रबंधन पर लागू होगा। सक्रिय संस्थाओं के अधिग्रहण को सरकार ने अफवाह बताया। मंत्रियों ने यह भी दावा किया कि नए प्रावधानों के तहत अपील का अधिकार मिलने से एफसीआरए लाइसेंस एक कानूनी अधिकार बन जाएगा।

विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (एफसीआरए) की शुरुआत 1976 में उस समय हुई थी जब भारत सरकार ने पहली बार यह महसूस किया कि विदेशी धन का उपयोग देश की राजनीति, सामाजिक ढांचे और नीतिगत प्रक्रियाओं को प्रभावित कर सकता है। बाद में 2010 में इसे एक नए और व्यापक स्वरूप में लागू किया गया, जिसमें पंजीकरण, निगरानी और उपयोग से जुड़े नियम स्पष्ट किए गए। इसके बाद कई संशोधन किए गए ताकि नियंत्रण सख्त हो, पारदर्शिता बढ़े और विदेशी धन के दुरुपयोग को रोका जा सके। इस कानून का मूल उद्देश्य विदेशी स्रोतों से आने वाले धन को नियंत्रित करना था ताकि राष्ट्रीय हित और संप्रभुता सुरक्षित रहें, मनी लॉन्ड्रिंग और अवैध गतिविधियों को रोका जा सके, गैर सरकारी संगठनों में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़े, और संवेदनशील वर्गों जैसे चुनाव उम्मीदवार, पत्रकार और आन्दोलनकारियों को विदेशी फंडिंग से दूर रखा जा सके। वर्तमान में लगभग 16,000 संगठन इस अधिनियम के अंतर्गत पंजीकृत हैं और उन्हें प्रतिवर्ष लगभग 22,000 करोड़ रुपये का विदेशी अंशदान प्राप्त होता है। यही कारण है कि सरकार इसे संवेदनशील और रणनीतिक क्षेत्र मानती है।

कई महत्वपूर्ण प्रावधानों के साथ 25 मार्च 2026 को लोकसभा में प्रस्तुत संशोधन का सबसे प्रमुख तत्व 'नामित प्राधिकरण' की स्थापना है, जो पंजीकरण रद्द या नवीनीकरण न होने वाली संस्थाओं की विदेशी निधियों और परिसंपत्तियों का प्रबंधन करेगा। यदि कोई संस्था समय पर नवीनीकरण नहीं कराती या आवेदन अस्वीकृत हो जाता है, तो उसका पंजीकरण स्वत: समाप्त हो जाएगा और परिसंपत्तियां अस्थायी रूप से प्राधिकरण के नियंत्रण में चली जाएगी। ऐसे हालात में ये परिसंपत्तियां स्थायी रूप से सरकार के नियंत्रण में आ सकती हैं, जिन्हें बेचा जा सकता है और राशि भारत की संचित निधि में जमा की जा सकती है।

इसके अतिरिक्त, विदेशी धन के उपयोग के लिए निश्चित समय-सीमा तय करने का प्रावधान है, ताकि धन का अनिश्चितकाल तक संचय न हो सके। निलंबन की स्थिति में कोई भी संस्था अपनी परिसंपत्तियों को बिना अनुमति बेच या स्थानांतरित नहीं कर सकेगी। जांच प्रक्रिया को केंद्रीकृत किया जाएगा, जिसके तहत किसी भी एजेंसी को जांच शुरू करने से पहले केंद्र सरकार की अनुमति लेनी होगी। 'मुख्य पदाधिकारी' की परिभाषा विस्तारित कर निदेशक, ट्रस्टी और अन्य जिम्मेदार व्यक्तियों को व्यक्तिगत रूप से जवाबदेह बनाया गया है। दंड को नरम करते हुए अधिकतम सजा पांच वर्ष से घटाकर एक वर्ष कर दी गई है और अपील का प्रावधान जोड़ा गया है, जिससे संस्थाओं को न्यायिक राहत मिल सके।

इस विधेयक को प्रस्तुत करते ही व्यापक विवाद सामने आया। कांग्रेस और केरल में सत्तारूढ़ लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट ने इसका मुखर विरोध किया है। कांग्रेस ने इसे असंवैधानिक बताते हुए आरोप लगाया कि यह अल्पसंख्यक समुदायों, विशेषकर ईसाई संस्थाओं को निशाना बनाने का प्रयास है, जबकि विपक्षी नेताओं का दावा है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से जुड़े संगठन इससे प्रभावित नहीं होंगे। केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने भी प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर अपना विरोध दर्ज कराया। विपक्ष का आरोप है कि इससे गैर-सरकारी संगठनों की स्वतंत्रता सीमित होगी और सरकार को अत्यधिक नियंत्रण मिल जाएगा।

कैथोलिक बिशप्स कॉन्फ्रेंस ऑफ इंडिया ने इस विधेयक पर और भी गहरी चिंताएं व्यक्त की हैं। उनका मानना है कि यह कानून नागरिक समाज की स्वतंत्रता को प्रभावित कर सकता है और गैर सरकारी संगठनों द्वारा संचालित शिक्षा, स्वास्थ्य और गरीब वर्गों के लिए चल रही सामाजिक सेवाओं पर प्रतिकूल असर डाल सकता है। उन्होंने विशेष रूप से इस बात पर आपत्ति जताई कि नवीनीकरण प्रक्रिया में पारदर्शिता का अभाव है और संस्थाओं को अपना पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर नहीं मिलता। परिसंपत्तियों के सरकारी नियंत्रण को उन्होंने अत्यधिक कठोर बताया और इसे संपत्ति के अधिकार तथा धार्मिक स्वतंत्रता के विरुद्ध माना।

सरकार की ओर से केंद्रीय मंत्री जॉर्ज कुरियन किरण रिजिजू ने विपक्ष के आरोपों को पूरी तरह खारिज करते हुए कहा कि यह विधेयक सकारात्मक कदम है जो किसी भी धार्मिक समुदाय के खिलाफ नहीं है और केवल गैर-कार्यशील संस्थाओं की परिसंपत्तियों के प्रबंधन पर लागू होगा। सक्रिय संस्थाओं के अधिग्रहण को सरकार ने अफवाह बताया। मंत्रियों ने यह भी दावा किया कि नए प्रावधानों के तहत अपील का अधिकार मिलने से एफसीआरए लाइसेंस एक कानूनी अधिकार बन जाएगा। उनके अनुसार, अवैध विदेशी फंडिंग का उपयोग देश विरोधी गतिविधियों में किया जा सकता है, इसलिए इसे नियंत्रित करना आवश्यक है।

विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 को 1 अप्रैल को चर्चा और पारित करने के लिए सूचीबद्ध किया गया था। विपक्ष ने संसद के मकर द्वार पर धरना दिया और सदन के अन्दर व्यापक शोर शराबा किया जिससे विधेयक पर चर्चा नहीं हो सकी और विपक्ष के तीव्र विरोध व राजनीतिक दबाव के चलते सरकार ने इसे फिलहाल स्थगित कर दिया।

इसके साथ ही, केरल में 9 अप्रैल को होने वाले विधानसभा चुनावों ने इस मुद्दे को और संवेदनशील बना दिया। केरल में ईसाई समुदाय का प्रभाव, चर्च संगठनों तथा भाजपा की केरल इकाई की आपत्तियों को देखते हुए यह विधेयक एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गया। रिपोर्ट्स के अनुसार, इस विरोध और संभावित चुनावी प्रभाव को ध्यान में रखते हुए सरकार ने रणनीतिक रूप से इस विधेयक को फिलहाल स्थगित करने का निर्णय लिया।

हमेशा की तरह सरकार की ओर से आधिकारिक तौर पर यह कहा गया कि विपक्ष ने गलतफहमियां फैलाईं, जिसके कारण विधेयक पर चर्चा नहीं हो सकी, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इसे टालना एक व्यावहारिक और चुनावी दृष्टि से लिया गया निर्णय है ।

अंतत: यह कहा जा सकता है कि यह विधेयक केवल एक कानूनी सुधार नहीं बल्कि राजनीतिक और वैचारिक संघर्ष का केंद्र बन गया है। एक ओर सरकार इसे राष्ट्रीय सुरक्षा और पारदर्शिता के लिए आवश्यक बता रही है, वहीं विपक्ष इसे नियंत्रण और दमन का उपकरण मान रहा है। एफसीआरए बैंक खातों के संचालन में पहले से ही कई चुनौतियां रही हैं; नए प्रावधान निश्चित रूप से सामाजिक सेवा से जुड़े संगठनों के निधि जुटाने के प्रयासों को और जटिल बना सकते हैं। यह भी देखा गया है कि सरकार कई बार ऐसे कड़े निर्णयों पर पीछे हटती रही है, जिससे यह धारणा बनती है कि वह सख्त फैसले लेने में हिचकिचाती है। दूसरी ओर, विपक्ष पर भी यह आरोप लगता है कि वह अल्पसंख्यक समुदायों को साधने के लिए इस तरह के मुद्दों पर अधिक आक्रामक रुख अपनाता है, जबकि अन्य मामलों में उसका विरोध उतना प्रभावी नहीं दिखता। इस पूरे विवाद में संतुलन, पारदर्शिता और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा ही आगे की राह तय करेगी।

(लेखक भारतीय स्टेट बैंक के सेवानिवृत्त सहायक महाप्रबंधक हैं )


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