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आंबेडकर के लिए राष्ट्र का भाग्य सर्वोपरि था

आंबेडकर को संविधान निर्माता के तौर पर पहचान मिली है, लेकिन वह प्लानर और अर्थशास्त्री भी थे।

आंबेडकर के लिए राष्ट्र का भाग्य सर्वोपरि था
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नीतीश कुमार सिंह

आंबेडकर को संविधान निर्माता के तौर पर पहचान मिली है, लेकिन वह प्लानर और अर्थशास्त्री भी थे। बहुमुखी प्रतिभा वालों के साथ अन्याय होता है। जिन परिस्थितियों में आंबेडकर ने काम किया और अपने अनुयायियों का पथ प्रदर्शन दिया, उस दिशा में उनका राष्ट्रवादी अभिमत अभिव्यक्त होता रहा। उनकी खास बात यह भी थी कि मत परिवर्तन किया तो भारतीय जड़ों से आबद्ध बौद्ध धर्म में किया।

संविधान निर्माता और सामाजिक न्याय के पुरोधा डॉ. भीमराव आंबेडकर की अभिव्यक्ति राष्ट्रवादी आंदोलन से लेकर आजीवन एक प्रखर दलित लड़ाके के तौर पर बेधड़क रही, परंतु भारत और भारतीयता को सर्वोपरि मानकर राष्ट्र की एकता, अखंडता और सद्भाव को अपने मन, वाणी और कर्म में उन्होंने संजोए रखा।

मध्यप्रदेश के महू में 14 अप्रैल, 1891 को जन्मे आंबेडकर के जीवन को समझना बहुत कठिन है इसलिए आज की सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितयों के बीच आंबेडकर को लेकर अर्द्ध सत्य की धारणा ने जोर पकड़ा है, जिसमें सामाजिक, धार्मिक वैमनस्यता और देश के भाग्य-विधाताओं को खांचों में बांटकर सिर्फ वोट की राजनीति का कुत्सित क्रियाकलाप चलना भर रह गया है।

उनके भाषणों से ही नीर-क्षीर किया जा सकता है। 17 दिसंबर, 1946 को संविधान सभा में लक्ष्य संबंधी प्रस्ताव पर 10 मिनट के भाषण में उन्होंने कहा, 'जहां राष्ट्र के भाग्य का फैसला करने का प्रश्न हो, वहां नेताओं, दलों और संप्रदायों की शान का कोई मूल्य नहीं होना चाहिए। वहां तो राष्ट्र के भाग्य को ही सर्वोपरि रखना चाहिए।' आंबेडकर को मानने वालों के लिए यह बहुत बड़ी सीख है।

आंबेडकर को संविधान निर्माता के तौर पर पहचान मिली है, लेकिन वह प्लानर और अर्थशास्त्री भी थे। बहुमुखी प्रतिभा वालों के साथ अन्याय होता है। जिन परिस्थितियों में आंबेडकर ने काम किया और अपने अनुयायियों का पथ प्रदर्शन दिया, उस दिशा में उनका राष्ट्रवादी अभिमत अभिव्यक्त होता रहा। उनकी खास बात यह भी थी कि मत परिवर्तन किया तो भारतीय जड़ों से आबद्ध बौद्ध धर्म में किया, किसी बाहरी धर्म या संप्रदाय में नहीं। सामर्थ्यपूर्ण पद्धति से चलने वाले धर्म में किया। यह उनके मूल चरित्र को अभिव्यक्त करता है। यह उनकी एक और विशेषता समझ में आती है।

संविधान-सभा में आंबेडकर कहते हैं- 'मैं जानता हूं कि आज हम राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक सभी दृष्टियों से विभक्त है। आज हमारा देश कई लड़ाकू दलों में बंट गया है, और मैं तो यहां तक मंजूर करूंगा कि ऐसे ही एक लड़ाकू दल के नेताओं में शायद मैं भी एक हूं, परंतु सभापति महोदय इन सब बातों के बावजूद मुझे इस बात का पक्का विश्वास है कि समय और परिस्थितियां अनुकूल होने पर दुनिया की कोई भी ताकत इस मुल्क को एक होने से रोक नहीं सकती। जाति और धर्म की भिन्नता के बावजूद भी हम किसी न किसी रूप में एक होंगे।'

वे आगे कहते हैं- 'इसमें मुझे जरा भी शक नहीं है और यह कहने में मुझे रंच मात्र का संकोच भी नहीं है कि यद्यपि मुस्लिम लीग आज भारत के विभाजन के लिए भयानक आंदोलन कर रही है पर एक न एक दिन स्वयं मुसलमान में बुद्धि आएगी और वह समझने लगेंगे कि उनके लिए भी संयुक्त भारत ही सर्वाधिक कल्याणकर है।'

आंबेडकर ने राष्ट्र व समाज के साथ नागरिक के अधिकारों के संरक्षण पर काफ़ी जोर दिया। इससे अंतिम पायदान के व्यक्ति को संवैधानिक तौर पर समाज और सरकार से सुरक्षा मिल सके।

देश के पहले प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू के लक्ष्य संबंधी प्रस्ताव पर ही आंबेडकर ने कहा कि इसमें अधिकारों की चर्चा की गई है पर उनकी सुरक्षा का कोई उपाय नहीं किया गया है। हम सभी इस बात को जानते हैं कि अधिकारों का कोई महत्व नहीं है यदि उनकी रक्षा की व्यवस्था न हो ताकि अधिकारों पर जब कभी कुठाराघात हो तो लोग उनका बचाव कर सकें। ऐसे उपचारों पर इस प्रस्ताव में बिल्कुल अभाव है।

इस सामान्य सिद्धांत का भी इसमें उल्लेख नहीं है कि किसी नागरिक के जीवन और संपत्ति का तब तक अपहरण नहीं किया जाएगा जब तक कि कानून खूब जांच-पड़ताल कर इसकी आज्ञा न दे दे। प्रस्ताव में उल्लेखित मौलिक अधिकारों को भी कानून और सदाचार के अधीन रख दिया गया है। निश्चित ही कानून और सदाचार क्या है- इसका निर्धारण उस दौर का शासन प्रबंध करेगा। किसी प्रबंध का एक फैसला हो सकता है और दूसरे का दूसरा। हम निश्चय रूप से यह नहीं जानते हैं कि इन मौलिक अधिकारों की स्थिति क्या होगी, अगर यह शासन प्रबंध की मज़ीर् पर छोड़ दिए जाते हैं।

बहरहाल, देश में राम राज्य की बात होती है। अगर आज आंबेडकर होते तो अपने भाषणों में कहते कि वह तभी पूरी होगी जिसमें 'सब नर करहूं परस्पर प्रीति' होने के साथ सत्ता, संपत्ति और सम्मान में सबकी समुचित भागीदारी हो।'

देश ने सोमवार को बाबा साहेब की 135वीं जयंती मनाई। यह अवसर उनके सपनों का भारत बनाने का निश्चय दोहराने का है।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार व राजनीति शास्त्र के शिक्षक हैं)


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