बाह्य ऋण, विकास और वैश्विक जिम्मेदारी: भारत की आर्थिक रणनीति
आधुनिक वैश्विक अर्थव्यवस्था में बाह्य ऋण किसी भी राष्ट्र के लिए एक अपरिहार्य यथार्थ बन चुका है और भारत भी इससे अछूता नहीं है

- अरुण डनायक
हाल के समय में प्रत्यक्ष विदेशी निवेशकों के भारतीय शेयर बाज़ार से दूरी बनाए रखने की प्रवृत्ति के चलते बाह्य ऋण पर निर्भरता बढ़ने की संभावना बनी है, जिससे कंपनियों के लिए विनिमय-दर जोखिम का प्रबंधन और अधिक जटिल तथा चुनौतीपूर्ण हो सकता है। भारत का बाह्य ऋ ण संरचनात्मक रूप से सुरक्षित है।
आधुनिक वैश्विक अर्थव्यवस्था में बाह्य ऋण किसी भी राष्ट्र के लिए एक अपरिहार्य यथार्थ बन चुका है और भारत भी इससे अछूता नहीं है। मध्य-आय जाल की स्थिति में विकास की गति बनाए रखने, अवसंरचना, उद्योग और सामाजिक क्षेत्र में निवेश तथा विशाल जनसंख्या की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए बाह्य पूंजी की आवश्यकता बनी रहती है। स्वतंत्रता के बाद से भारत ने बाह्य उधारी को अंधानुकरण नहीं, बल्कि एक सुविचारित नीति-उपकरण के रूप में अपनाया है। इसका उपयोग मुख्यत: अवसंरचना, ऊर्जा, परिवहन, औद्योगिक विस्तार और वित्तीय स्थिरता के लिए किया गया है। विशेष रूप से, बाह्य वाणिज्यिक उधारी और आवश्यकता पड़ने पर आईएमएफ से प्राप्त ऋ णों ने निजी क्षेत्र को भुगतान-संतुलन बनाए रखने में सहायता दी, जिससे निवेश, उत्पादन क्षमता और रोजगार सृजन को बल मिला। संविधान के अनुच्छेद 293 के तहत राज्यों के लिए प्रत्यक्ष विदेशी ऋ ण लेने की सीमित संभावना होती है, और अधिकांश बाह्य उधारी केंद्र सरकार के माध्यम से होती है , जिससे ऋ ण प्रबंधन और वित्तीय स्थिरता को संस्थागत रूप से नियंत्रित रखा जाता है।
भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) के अनुसार, जून 2025 के अंत तक केंद्र और राज्यों का कुल बाह्य ऋ ण 747.2 अरब अमेरिकी डॉलर था, जो सितंबर 2025 में हल्का घटकर लगभग 746 अरब डॉलर रह गया—अर्थात समग्र स्तर पर स्थिरता बनी रही। यह जून 2024 के 681.5 अरब डॉलर की तुलना में वार्षिक आधार पर 9.6 प्रतिशत अधिक है। दिसंबर 2025 को समाप्त तिमाही में बाह्य वाणिज्यिक उधारी (ईसीबी) के माध्यम से उधारी प्रवाह में वृद्धि के संकेत मिले; दिसंबर माह में अकेले 4.43 अरब डॉलर की नई ईसीबी जुटाई गई, जिससे अप्रैल-दिसंबर 2025 के दौरान कुल जुटाई गई राशि लगभग 27.5 अरब डॉलर तक पहुंच गई। यह आंकड़े प्रवाह को दर्शाते हैं, न कि कुल बकाया स्टॉक को। इससे संकेत मिलता है कि वैश्विक अनिश्चितताओं के बावजूद भारतीय कंपनियां अंतरराष्ट्रीय पूंजी बाज़ारों तक अपनी पहुंच बनाए हुए हैं।
ऋण राशि बढ़ने के बावजूद बाह्य ऋण-से-जीडीपी अनुपात मार्च 2025 के 19.1 प्रतिशत से घटकर 18.9 प्रतिशत रह गया है, जो दर्शाता है कि आर्थिक वृद्धि ऋ ण वृद्धि से तेज़ रही। यद्यपि केंद्रीय सरकार की सकल राजस्व प्राप्तियों (रुपए 34.96 लाख करोड़) की तुलना में बाह्य ऋण का स्तर ऊंचा प्रतीत होता है, फिर भी यह अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार अभी जोखिम की सीमा के भीतर है।
हाल के समय में प्रत्यक्ष विदेशी निवेशकों के भारतीय शेयर बाज़ार से दूरी बनाए रखने की प्रवृत्ति के चलते बाह्य ऋण पर निर्भरता बढ़ने की संभावना बनी है, जिससे कंपनियों के लिए विनिमय-दर जोखिम का प्रबंधन और अधिक जटिल तथा चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
भारत का बाह्य ऋ ण संरचनात्मक रूप से सुरक्षित है। 82 प्रतिशत दीर्घकालिक, अल्पकालिक मात्र 18.1प्रतिशत, विदेशी मुद्रा भंडार से 93प्रतिशत से अधिक आच्छादन, ऋण-सेवा अनुपात केवल 6.6प्रतिशत तथा परिसंपत्ति-दायित्व अनुपात 79.25प्रतिशत होने के कारण तात्कालिक जोखिम न्यूनतम है। यद्यपि डॉलर पर अपेक्षाकृत अधिक निर्भरता से विनिमय-दर जोखिम उत्पन्न होता है, लेकिन लगभग 700 अरब डॉलर के विदेशी मुद्रा भंडार द्वारा 93 प्रतिशत से अधिक बाह्य ऋ ण का आच्छादन इस जोखिम को प्रभावी रूप से संतुलित करता है। रुपये की डॉलर के मुकाबले हाल की कमजोरी का असर सीधे कुल बाह्य ऋण की राशि पर नहीं पड़ता। इसका मुख्य प्रभाव ऋण-सेवा लागत, ब्याज भुगतान और भविष्य में ऋण के पुनर्भुगतान पर पड़ता है, जिससे कंपनियों और सरकार की वित्तीय योजना पर अतिरिक्त दबाव बन सकता है।
आम धारणा के विपरीत, भारत का बाह्य ऋण किसी एक देश या संस्था पर केंद्रित नहीं है। इसका स्वरूप विविध और संतुलित है— 40 प्रतिशत वाणिज्यिक उधारी (अंतरराष्ट्रीय बांड और विदेशी बैंक), 22 प्रतिशत एनआरआई जमाएं, 11 प्रतिशत विश्व बैंक और एशियाई विकास बैंक जैसी बहुपक्षीय संस्थाएं, 5 प्रतिशत जापान जैसे द्विपक्षीय ऋणदाताओं, तथा आईएमएफ की 21.6 अरब डॉलर की सीमित देनदारियां (मुख्यत: 1991 के संकट से जुड़ी)। भारत ने वर्षों से आईएमएफ से कोई नया कार्यक्रम ऋण नहीं लिया, जिससे नीति-स्वायत्तता बनी रही।
भारत की ऋण-चुकाने की क्षमता लगातार मज़बूत बनी हुई है। मूलधन और ब्याज सहित ऋण-सेवा भुगतान चालू प्राप्तियों का केवल 6.6 प्रतिशत है। अंतरराष्ट्रीय परिसंपत्तियां-दायित्व अनुपात 79.25 प्रतिशत तक पहुंच चुका है, अर्थात भारत की अंतरराष्ट्रीय परिसंपत्तियां उसकी कुल विदेशी देनदारियों के लगभग 80प्रतिशत को आच्छादित करती हैं। यह भारत की बाह्य भुगतान क्षमता की मजबूती और तात्कालिक बाह्य संकट से सुरक्षा को स्पष्ट करता है। भू-राजनीतिक तनाव, वैश्विक ब्याज दरों में उतार-चढ़ाव और संरक्षणवादी प्रवृत्तियां बाह्य ऋण प्रबंधन की जटिलता बढ़ा सकती हैं, विशेषकर वाणिज्यिक उधारी में, जहां सतत निगरानी और विवेकपूर्ण नीति आवश्यक है।
फरवरी 2026 में आरबीआई ने ईसीबी ढांचे में उदारीकरण करते हुए पात्र उधारकर्ताओं की श्रेणी का विस्तार, स्वचालित मार्ग के अंतर्गत कुछ सीमाओं में शिथिलता, औसत परिपक्वता अवधि संबंधी शर्तों में लचीलापन तथा अनुमोदन प्रक्रियाओं को सरल बनाया। इससे भारतीय कंपनियों—विशेषकर अवसंरचना और विनिर्माण क्षेत्र—के लिए विदेशी पूंजी जुटाना अधिक सुगम होगा।
बाह्य ऋ ण प्रबंधन के साथ-साथ भारत आज 65 से अधिक देशों को आर्थिक सहायता प्रदान करने वाला एक प्रमुख राष्ट्र है। भूटान, नेपाल, मालदीव, मॉरीशस, म्यांमार, श्रीलंका, अफगानिस्तान तथा अनेक अफ्रीकी देश प्रमुख सहयोग प्राप्त देश हैं। केंद्रीय बजट 2025-26 में विदेश मंत्रालय के अंतर्गत लगभग रुपए 6,750 करोड़ विदेशी सहायता के लिए निर्धारित किए गए हैं।
भारत न तो ग्रीस और अर्जेंटीना जैसी गंभीर ऋण-जाल वाली अर्थव्यवस्थाओं की स्थिति में है, जहां वित्तीय अनुशासन की कमी, उच्च सार्वजनिक ऋण और संरचनात्मक कमजोरियां संकट का कारण बनी थीं और न ही 1997 के एशियाई वित्तीय संकट से प्रभावित देशों जैसी स्थिति का सामना कर रहा है। थाईलैंड में संकट अल्पकालिक ऋण और भुगतान असंतुलन से, इंडोनेशिया में विदेशी ऋण और अवमूल्यन से, तथा दक्षिण कोरिया में अत्यधिक देनदारियां और बैंकिंग संकट से उत्पन्न हुआ था। इसके विपरीत, भारत ने दीर्घकालिक ऋण संरचना, संतुलित मुद्रा संयोजन, मजबूत बैंकिंग प्रणाली, आरबीआई के कठोर पर्यवेक्षण तथा ऋण चुकाने की प्रतिबद्धता के माध्यम से वित्तीय स्थिरता बनाए रखी है।
भारत अवसंरचना, उद्योग और रोजगार सृजन के लिए विवेकपूर्ण उधारी करता है और विगत सरकारों द्वारा अपनाई नीतियां आज भी बाह्य ऋण प्रबंधन को मजबूत रखती हैं और दीर्घकालिक निवेश, सतत विकास तथा पड़ोसी सहायता में नीतिगत निरंतरता सुनिश्चित करती हैं। उधार और उदारता की रणनीति भारत की आर्थिक परिपक्वता, वित्तीय अनुशासन और अंतरराष्ट्रीय उत्तरदायित्व को दर्शाती है, जबकि वैश्विक ब्याज दरों, भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं और संरक्षणवाद के मद्देनज़र सतत निगरानी की आवश्यकता बनी हुई है।
(लेखक , भारतीय स्टेट बैंक के सेवानिवृत सहायक महाप्रबंधक हैं )


