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पौष्टिक अनाजों की प्रदर्शनी

मध्यप्रदेश में आदिवासियों के बीच पौष्टिक भोजन की वापसी की पहल की जा रही है। इस पहल से विशेष तौर पर महिलाओं और बच्चों को जोड़ा जा रहा है।

पौष्टिक अनाजों की प्रदर्शनी
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— बाबा मायाराम

निर्माण संस्था के नरेश विश्वास बताते हैं कि कुछ दशक पहले तक पौष्टिक अनाज की खेती को आदिवासी भूल चुके थे। उनके पास देशी बीज भी बहुत कम बचे थे, या नहीं थे। शुरूआत में वे गांव-गांव गए, देशी बीजों की तलाश की, और बीज एकत्र किए। आदिवासियों को इन बीजों को बोने के लिए तैयार किया। बीजों का आदान-प्रदान किया, जिससे फिर से इनकी वापसी हो रही है। इसी के मद्देनजर संस्था ने बीजों की रिश्तेदारी नामक मुहिम चलाई, जिसमें बीजों की पहचान, उसके गुणधर्म जानना और उनका आदान-प्रदान करना।

मध्यप्रदेश में आदिवासियों के बीच पौष्टिक भोजन की वापसी की पहल की जा रही है। इस पहल से विशेष तौर पर महिलाओं और बच्चों को जोड़ा जा रहा है। महिलाओं को पारंपरिक भोजन व व्यंजन बनाने का प्रशिक्षण और स्कूली बच्चों के लिए बाल मेला आयोजित किए जाते हैं साथ ही जगह-जगह देशी बीजों व जैव विविधता की प्रदर्शनी लगाई जाती है। आज इस कॉलम में इसी पहल पर बात करना चाहूंगा, जिससे पौष्टिक अनाजों के महत्व के बारे में समझा जा सके।

इस पहल की अगुआई निर्माण संस्था ने की है। इस संस्था का काम मुख्य रूप से मैकल पर्वत श्रृंखला के कई बैगा गांवों में है, जहां से नर्मदा व सोन नदी निकलती है। यह संस्था मंडला-डिंडौरी जिले के आदिवासियों के बीच बेंवर खेती को बढ़ावा देने के लिए कार्यरत है। इसके साथ मध्यप्रदेश के पातालकोट, छत्तीसगढ़ के पहाड़ी कोरवा व अनूपपुर के आदिवासियों में भी इस संस्था ने पौष्टिक अनाजों की खेती को प्रोत्साहित किया है।

निर्माण संस्था के नरेश विश्वास बताते हैं कि कुछ दशक पहले तक पौष्टिक अनाज की खेती को आदिवासी भूल चुके थे। उनके पास देशी बीज भी बहुत कम बचे थे, या नहीं थे। शुरूआत में वे गांव-गांव गए, देशी बीजों की तलाश की, और बीज एकत्र किए। आदिवासियों को इन बीजों को बोने के लिए तैयार किया। बीजों का आदान-प्रदान किया, जिससे फिर से इनकी वापसी हो रही है।

इसी के मद्देनजर संस्था ने बीजों की रिश्तेदारी नामक मुहिम चलाई, जिसमें बीजों की पहचान, उसके गुणधर्म जानना और उनका आदान-प्रदान करना। इस तरह मध्यप्रदेश के बीज देश के कई इलाकों में पहुंचाने की कोशिश की जा रही है। देशी बीजों की पौष्टिक अनाजों की खेती को बढ़ावा मिल रहा है।

नरेश विश्वास बताते हैं कि पौष्टिक भोजन को रूचिकर व स्वादिष्ट बनाने के लिए विशेष प्रयास किए जा रहे हैं। लड्डू, खिचड़ी, पुलाव, बिस्कुट, खीर बनाने का प्रशिक्षण दिया जाता है। जैव विविधता प्रदर्शनी के माध्यम से इनकी पहचान कराई जाती है, और तौर-तरीके बताए जाते हैं। पौष्टिक अनाजों के पोस्टर छपाए गए हैं, जिन्हें प्रदर्शनी में लगाया जाता है। इन पोस्टरों में कांग, मड़िया, कोदो, कुटकी इत्यादि के पोषक तत्वों के बारे में बताया गया है।

संस्था की कार्यकर्ता मुनिया मस्कोले ने कई स्थानों पर जैव विविधता प्रदर्शनी लगाई है। लड्डू, खीर, पुलाव, खिचड़ी बनाने का प्रशिक्षण दिया है। मध्यप्रदेश डिंडौरी, मंडला, छत्तीसगढ़ के अनूपपुर, बिलासपुर, जशपुर में प्रशिक्षण दिया है। हाल ही में छत्तीसगढ़ में जन स्वास्थ्य सहयोग की महिला कार्यकर्ताओं के साथ व्यंजन बनाने की कार्यशाला भी की है।

इसके अलावा संस्था ने सरकार द्वारा आयोजित कार्यक्रमों में भागीदारी की है। हाल ही में भोपाल के मानव संग्रहालय और कटनी में प्रदर्शनी लगाई थी। मुझे स्वयं कई बार उनकी जैव विविधता प्रदर्शनी को देखने का मौका मिला है। गांव से लेकर देश के कई कोनों में यह प्रदर्शनी लगाई गई है।

महाराष्ट्र के वर्धा में मैंने यह प्रदर्शनी देखी थी। यहां कई किसान व महिलाओं ने न केवल प्रदर्शनी को देखा, बल्कि बीजों की जानकारी ली, बीज लिए, और व्यंजन बनाने के तौर-तरीके भी सीखे। इसी प्रकार, पातालकोट में एक जैव प्रदर्शनी में मुझे शामिल होने का मौका मिला था। जहां पर मुनिया मस्कोले जी ने महिला समूहों के साथ मिलकर कोदो-कुटकी की खिचड़ी, महुआ के लड्डू, खीर और बिस्कुट बनाए थे।

नरेश विश्वास कहते हैं कि हम स्कूली बच्चों के साथ भी बाल मेला, और जंगल यात्राएं करते हैं। जिससे उन्हें पौष्टिक अनाजों, गैर कृषि खाद्य (अनकल्टीवेटेड फूड) से जोड़ा जा सके। उनकी पहचान कराई जा सके, उनके गुणधर्मों से अवगत कराया जा सके। उन्होंने बताया कि देशी मक्के के खेत में कई तरह की कुदरती हरी पत्तीदार भाजियां मिलती हैं।

पिछले साल मुझे स्कूली बच्चों के साथ जंगल में पेड़ पौधे, खाद्य पदार्थ जानने, पहचानने और वन खाद्य चखने का मौका मिला मिला। कोदो का भात, और जंगली हरी पत्तीदार भाजियां भोजन में शामिल थीं। हम बच्चों के साथ जंगल में घूमे थे। इस कार्यक्रम को वन कलेवा नाम दिया गया था। यानी जंगल से मिलने वाला भोजन, जो कुदरती तौर पर उपलब्ध है। जंगल से मिलने वाली भोजन की थाली भी इसे कह सकते हैं।

स्कूली बच्चों की जंगल के दौरे में उनके शिक्षक, गांव के बुजुर्ग और चरवाहे शामिल थे। गांव के बुजुर्गों ने कई तरह की जड़ी-बूटियों से बच्चों की पहचान कराई। कई तरह की हरी पत्तीदार भाजियां दिखाईं और एकत्र कीं। बाद में जंगल में स्थित देव के पास कुटकी का भात पकाया गया और जंगल से एकत्र की गईं हरी पत्तीदार भाजियों की सब्जी बनाई। सामूहिक रूप से मिलकर इसे पकाया और स्वादिष्ट खाना खाया। यह अनोखा कार्यक्रम था। इससे बच्चों को उनके आसपास के जंगल और जैव विविधता को जानने का मौका मिल रहा था। निर्माण संस्था के नरेश विश्वास ने बहुत मेहनत से वन खाद्यों के बारे में कुछ पुस्तिकाएं भी प्रकाशित की हैं।

इसी प्रकार, मुझे यहां एक जैव-विविधता प्रदर्शनी में शामिल होने का मौका मिला था। यह निर्माण संस्था द्वारा आयोजित थी, जो इस इलाके में देशी बीजों की जैविक खेती को प्रोत्साहित कर रही है। इसके अलावा, बल्लर, बरबटी, लौकी, गिलकी, लाल सेमी इत्यादि के बीज शामिल थे। इन अनाजों से कई तरह के व्यंजन बनाकर भी टेबल पर सजाए गए थे। जैसे कुटकी पापड़, सावां चटली, कोदो पापड़ी, मड़िया पापड़ी, मड़िया सेव, कोदो चाटला, बाजरा के बड़े, महुआ हलवा, सावां के लड्डू, कोदो के लड्डू, ज्वार के लड्डू, महुआ का भुरका, कोदो पुलाव, कुटकी खीर, सावां की खिचड़ी, ज्वार का भात, मड़िया का हलवा इत्यादि।

मुनिया मस्कोले बताती हैं कि बच्चों को लड्डू, बिस्कुट बहुत पसंद आते हैं। और इसी के साथ उनके परिवारजन भी खाते हैं। इसलिए प्रदर्शनी इसकी शुरूआत भर है। बाद में इसे वे खुद बनाते और खाते हैं। आदिवासी तो पहले से ही इन्हें जानते और खाते थे, इसलिए वे जल्दी इससे जुड़ जाते हैं।

वे आगे बताती हैं कि उनका काम बैगा समुदाय में बीजों को बचाने और उनको खेतों में वापस लाने के लिए प्रेरित करना है। वे कोदो बिस्कुट, रागी बिस्कुट बनाती हैं। इनको बनाने के लिए प्रशिक्षण देती हैं। महुआ लड्डू, दलिया और सत्तू भी बनाती हैं। कोदो, कुटकी, सांवा की खिचड़ी व खीर भी बनाती हैं।

इसके पहले संस्था ने कई बरसों तक बेंवर खेती को बढ़ावा दिया है, जिसमें पौष्टिक अनाज ही बोए जाते हैं। बेंवर खेती बिना जुताई की जाती है। ऐसी मान्यता है कि हल से धरती मां की छाती पर घाव होगा और उसे पीड़ा होगी। उसे नुकसान होगा। ग्रीष्म ऋतु में पेड़ों की छोटी-छोटी टहनियां, पत्ते, घास और छोटी झाड़ियों को एकत्र कर उनमें आग लगा दी जाती है और फिर उसकी राख की पतली परत पर बीजों को बिखेर दिया जाता है। जब बारिश होती है तो उन बीजों में अंकु र आ जाते हैं। धीरे-धीरे उगे पौधे बड़े होते हैं और फसलें लहलहा जाती हैं। धरती मां की इस फसल को देखकर किसी भी किसान का दिल खुशी से उछल सकता है।

कुल मिलाकर, बेंवर खेती की विविध खेती, जैव विविधता प्रदर्शनी, पौष्टिक अनाजों का प्रशिक्षण, बाल मेला, यह सभी प्रयास पौष्टिक अनाजों को फिर से चलन में लाने के लिए हैं। इससे भोजन में विविधता, स्वाद तो बढ़ता ही है, रोगों की रोकथाम भी होती है। इस प्रकार खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य सुरक्षा, जैव विविधता, पर्यावरण की रक्षा और मौसम बदलाव सभी दृष्टि से उपयोगी है। बच्चों को उनके आसपास के जंगल पहचानने, गुणधर्म जानने व जैव विविधता से जोड़ने के लिए उपयोगी है। समुदाय के साथ मिलकर जैव विविधता के संरक्षण व संवर्धन की भी यह अच्छी पहल है। महिला सशक्तिकरण का भी यह अच्छा उदाहरण है। क्या हम इस दिशा में आगे बढ़ना चाहेंगे?


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