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एथेनॉल क्रांति : संभावनाओं में छिपे संकट?

जैव-ईंधन के क्षेत्र में तकनीकी नवाचार तेजी से बढ़ रहे हैं, जिसके दो मुख्य स्तंभ वैश्विक पटल पर दिखाई देते हैं।

एथेनॉल क्रांति : संभावनाओं में छिपे संकट?
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  • सुदर्शन सोलंकी

भारतीय किसान दालों और तिलहनों की खेती छोड़कर 'एथेनॉल' केंद्रित फसलों की ओर आकर्षित होते हैं, तो भविष्य में देश को भोजन और खाद्य तेलों के आयात पर निर्भर होना पड़ सकता है। ऐसे में हम पेट्रोलियम आयात का बिल तो घटा लेंगे, लेकिन भोजन आयात का बिल बढ़ा बैठेंगे, जिससे वास्तविक आत्मनिर्भरता कभी हासिल नहीं होगी।

श्विक भू-राजनीतिक अस्थिरता और कच्चे तेल की आसमान छूती कीमतों ने दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं को एक बार फिर ऊर्जा संकट के मुहाने पर खड़ा कर दिया है। इस संकट से उबरने और विदेशी मुद्रा भंडार पर पड़ रहे दबाव को कम करने के लिए दुनिया भर में 'एथेनॉल' को एक अचूक समाधान के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। हाल ही में ब्राजील द्वारा 'एथेनॉल' से बिजली ग्रिड को संभालने का प्रयोग और भारत सरकार द्वारा देश में 100प्रतिशत 'एथेनॉल' से चलने वाले वाहनों को कानूनी मंजूरी देना इसी दिशा में उठाए गए बड़े कदम हैं। विकास की इस आपाधापी में पर्यावरणविदों और वैज्ञानिकों ने एक यक्ष प्रश्न खड़ा कर दिया है कि क्या हम तेल आयात का बिल कम करने की जल्दबाजी में अपनी आने वाली पीढ़ियों का पानी, उपजाऊ भूमि और खाद्य-सुरक्षा दांव पर लगा रहे हैं?

जैव-ईंधन के क्षेत्र में तकनीकी नवाचार तेजी से बढ़ रहे हैं, जिसके दो मुख्य स्तंभ वैश्विक पटल पर दिखाई देते हैं। 'एथेनॉल-टू-पावर' प्रयोग में ब्राजील ने गन्ने से निर्मित 'एथेनॉल' का उपयोग कर बिजली उत्पादन का दुनिया का पहला बड़ा प्रयोग शुरू किया है। पर्नाम्बुको स्थित 'सुपे-2' बिजली संयंत्र में फिनलैंड की 'वार्टसिला' तकनीक के साथ एक विशेष इंजन लगाया गया है, जो सीधे 'राष्ट्रीय बिजली ग्रिड' को ऊर्जा देता है। इस तकनीक की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह सौर और पवन ऊर्जा की मौसमी अनिश्चितताओं (जैसे धूप न होना या हवा न चलना) को दूर कर, मांग के अनुसार 'ऑन-डिमांड' बिजली की निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित कर सकती है।

भारत ने जहां एक ओर 2025-26 तक पेट्रोल में 20 प्रतिशत 'एथेनॉल' मिश्रण का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है, वहीं दूसरी ओर देश में 100प्रतिशत शुद्ध 'एथेनॉल' पर चलने वाले वाहनों को भी हरी झंडी दे दी है। मारुति सुजुकी ने फ्लेक्स-फ्यूल कारें और टू-व्हीलर सेगमेंट में अग्रणी कंपनियों ने अपनी मोटरसाइकिलें बाजार में उतार दी हैं। इससे आयातित तेल पर निर्भरता कम होने और कार्बन उत्सर्जन घटने की सीधी संभावना दिखती है।

इतिहास गवाह है कि जब भी किसी तात्कालिक संकट के समाधान के लिए समग्र दृष्टि के बिना जल्दबाजी में नीतियां लागू की गईं, वे कुछ समय बाद स्वयं एक बड़े संकट का कारण बन गईं। साठ और सत्तर के दशक की 'हरित क्रांति' इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जिसने देश को तत्कालीन खाद्यान्न संकट से तो उबारा, लेकिन आज वही मॉडल मिट्टी की उर्वरता में गिरावट, रासायनिक प्रदूषण और पंजाब-हरियाणा जैसे राज्यों में भयावह भूजल-दोहन का कारण बन चुका है। 'एथेनॉल' नीति भी आज इसी खतरनाक मुहाने पर खड़ी है।

भारत वर्तमान में 'पहली पीढ़ी' के 'एथेनॉल' उत्पादन के लिए मुख्य रूप से गन्ना, चावल और 'जीन संवर्धित' (जेनेटिकली मॉडिफाइड, जीएम) मक्का जैसी खाद्य फसलों का उपयोग कर रहा है। ये सभी फसलें अत्यधिक पानी की मांग करती हैं। पर्यावरण विशेषज्ञों के हालिया विश्लेषण के मुताबिक इसके आंकड़े भयावह हैं। एक लीटर चावल आधारित 'एथेनॉल' उत्पादन के लिए लगभग 10,790 लीटर पानी की आवश्यकता होती है। एक लीटर गन्ना आधारित 'एथेनॉल' के लिए लगभग 3,630 लीटर पानी खर्च होता है और एक लीटर 'जीएम' मक्का आधारित 'एथेनॉल' के लिए लगभग 4,670 लीटर पानी की आवश्यकता पड़ती है। महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना, मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश के कई क्षेत्र पहले से ही गर्मियों में गंभीर पेयजल संकट और 'डार्क ज़ोन' की समस्या से जूझ रहे हैं। ऐसे में ईंधन बनाने के लिए इन फसलों को बढ़ावा देना देश के जल-सुरक्षा तंत्र को पूरी तरह ध्वस्त कर सकता है।

'एथेनॉल' नीति का सबसे गंभीर सामाजिक और आर्थिक पहलू 'भोजन बनाम ईंधन' का द्वंद्व है। जब बाजार के आकर्षण और अधिक लाभ के कारण उपजाऊ भूमि पर खाद्यान्न के बजाय वाहनों के लिए ईंधन उगाया जाने लगेगा, तो खाद्य-सुरक्षा पर दबाव बढ़ना स्वाभाविक है। यदि भारतीय किसान दालों और तिलहनों की खेती छोड़कर 'एथेनॉल' केंद्रित फसलों की ओर आकर्षित होते हैं, तो भविष्य में देश को भोजन और खाद्य तेलों के आयात पर निर्भर होना पड़ सकता है। ऐसे में हम पेट्रोलियम आयात का बिल तो घटा लेंगे, लेकिन भोजन आयात का बिल बढ़ा बैठेंगे, जिससे वास्तविक आत्मनिर्भरता कभी हासिल नहीं होगी।

भारत के लगभग 86 प्रतिशत किसान छोटे और सीमांत हैं, जिनके पास दो हेक्टेयर से कम भूमि है। पारंपरिक रूप से ये किसान अनाज, दालें, तिलहन, सब्जियां और पशुपालन को एकीकृत रूप में अपनाते थे, जिससे उनकी खाद्य-सुरक्षा और ग्रामीण समाज की 'अड़जी-पड़जी' (सामूहिक श्रमदान) जैसी समृद्ध परंपराएं सुरक्षित रहती थी, लेकिन एकल खेती और व्यावसायिक नकदी फसलों के विस्तार ने किसानों को बाजार पर निर्भर कर दिया है, संकर (हाइब्रिड) बीजों और रसायनों की लागत बढ़ गई है और ग्रामीण समुदायों के आपसी संबंध कमजोर हो रहे हैं।

'एथेनॉल' उत्पादन को खाद्य फसलों से हटाकर पूरी तरह से कृषि अपशिष्ट (जैसे पराली, डंठल) और जैविक कचरे तक सीमित किया जाना चाहिए। इससे पर्यावरण प्रदूषण (पराली जलने की समस्या) भी खत्म होगी और भोजन-पानी पर संकट भी नहीं आएगा। 'एथेनॉल' के लिए गन्ने और चावल की बजाय ज्वार, बाजरा, कोदो, कुटकी और रागी जैसे मोटे अनाजों के उपयोग को बढ़ावा दिया जाना चाहिए, जो सूखे और कम पानी में भी उग सकते हैं। किसी भी विस्तारवादी नीति को लागू करने से पहले देश के वैज्ञानिकों, पर्यावरणविदों, किसानों और नागरिक संगठनों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए।

विकास का वास्तविक अर्थ केवल 'सकल घरेलू उत्पाद' (जीडीपी) में वृद्धि या आयात बिल में कटौती नहीं है। वास्तविक विकास वह है जो प्रकृति, समाज और अर्थव्यवस्था के बीच एक न्यायपूर्ण संतुलन स्थापित करे। 'एथेनॉल' से बिजली बनाने और 100प्रतिशत 'एथेनॉल' गाड़ियां चलाने की वैज्ञानिक प्रगति सराहनीय है, लेकिन इसे देश की जल-सुरक्षा और खाद्य-सुरक्षा की कीमत पर नहीं भुनाया जा सकता। भारत को अपनी नीतियों में दूरदर्शिता लानी होगी, ताकि आज जो तकनीक एक 'वरदान' और समाधान प्रतीत हो रही है, वह कल हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए 'अभिशाप' और महासंकट न बन जाए।

(विज्ञान संबंधी विषयों के लेखक एवं ब्लॉगर हैं।)


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