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इथेनॉल सम्मिश्रण : मकसद सही, बदलाव की रफ़्तार गलत

ंभारत में पेट्रोल में इथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम ने कम समय में बहुत तरक्की की है। सम्मिश्रण का अनुपात 2013-14 में 1.5 प्रतिशत से बढ़कर 2025-26 में 20 प्रतिशत हो गया है

इथेनॉल सम्मिश्रण : मकसद सही, बदलाव की रफ़्तार गलत
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  • डॉ.अजीत रानाडे

इथेनॉल सम्मिश्रण जैसे एक ही तरीके से विदेशी मुद्रा बचाने, कार्बन उत्सर्जन कम करने और किसानों की आय बढ़ाने जैसे कई लक्ष्यों को हासिल करना आसान नहीं है। अच्छी पॉलिसी में ट्रेड-ऑफ़ को समझा जाता है, सही क्रम तय होता है और नागरिकों पर ज़बरदस्ती करने के बजाय उन्हें उनकी पसंद का विकल्प देकर मनाया जाता है।

ंभारत में पेट्रोल में इथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम ने कम समय में बहुत तरक्की की है। सम्मिश्रण का अनुपात 2013-14 में 1.5 प्रतिशत से बढ़कर 2025-26 में 20 प्रतिशत हो गया है जिससे ई-20 का लक्ष्य तय समय से पांच साल पहले ही हासिल कर लिया गया है। कई कारणों से अब यह विवाद का विषय बन गया है।

गाड़ी चलाने वाले लोग माइलेज कम होने, पुरानी गाड़ियों को नुकसान पहुंचने की आशंका और सबसे बड़ी बात, पेट्रोल पंपों पर कोई विकल्प न होने की शिकायत कर रहे हैं। दूसरी ओर सरकार कच्चे तेल के आयात में कमी, विदेशी मुद्रा की बचत, कार्बन उत्सर्जन में कमी और किसानों की अतिरिक्त आय का हवाला देती है।

बंटे हुए विचारों वाली ज़्यादातर बहसों की तरह दोनों पक्षों की अपनी-अपनी बात सही है। इथेनॉल न तो कोई जादुई ईंधन है और न ही कारों के लिए कोई यांत्रिक खतरा। ज़्यादा सम्मिश्रण का लक्ष्य अच्छा है। फिर भी क्या हम वहां तक पहुंचने के लिए सही रास्ता, रफ़्तार और क्रम चुन रहे हैं?

भारत ने बहुत तेज़ी से काम किया है। ई-20 ने देश भर के पेट्रोल पंपों पर असल में सभी तरह के सम्मिश्रण की जगह ले ली है। भारतीय सड़कों पर ई-20 के अनुकूल गाड़ियां 2023 से आनी शुरू हुईं। इसलिए लाखों पुरानी गाड़ियां ऐसा ईंधन इस्तेमाल कर रही हैं जिसके लिए उन्हें मूलरूप से नहीं बनाया गया था। ब्राज़ील में गाड़ी चलाने वालों के उलट भारतीय ग्राहकों के पास अलग-अलग सम्मिश्रण चुनने के बहुत कम विकल्प हैं।

इथेनॉल के लिए सरकार का पहला तर्क ऊर्जा सुरक्षा (एनर्जी सिक्योरिटी) है। भारत अपनी ज़रूरत का लगभग 90 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है और कीमतों में उतार-चढ़ाव को देखते हुए इस पर निर्भरता कम करना एक रणनीतिक प्राथमिकता है। देश में बना इथेनॉल कच्चे तेल के आयात और विदेशी मुद्रा की कुछ बचत करता है।

लेकिन कितनी? 'सेंटर फॉर सोशल एंड इकानॉमिक प्रोग्रेस' (सीएसईपी) के अनुसार, 2014 से अगस्त 2024 के बीच इथेनॉल सम्मिश्रण से 181 लाख टन कच्चे तेल की खपत कम हुई और विदेशी मुद्रा में रुपए 1.06 लाख करोड़ की बचत हुई। यह उस दौरान भारत के कुल कच्चे तेल के आयात का सिर्फ़ 0.8 प्रतिशत है। यह सही है कि पिछले दशक में सम्मिश्रण का अनुपात काफी कम था और भविष्य में बचत ज़्यादा हो सकती है।

यह भी ध्यान दें कि गन्ने, मक्का और चावल की खेती के लिए आयातित उर्वरकों के अलावा सिंचाई, प्रसंस्करण और परिवहन के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है। सही बचत जानने के लिए इन सभी को घटाना आवश्यक है।

दूसरा तर्क उत्सर्जन में कमी से संबंधित है। सीएसईपी की रिपोर्ट कहती है कि 2014 से अगस्त 2024 के बीच उर्वरक मिश्रण से 544 लाख टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन कम हुआ। अफसोस की बात है कि यह केवल लगभग एक चौथाई प्रतिशत ही है और इस गणना के लिए भी जीवनचक्र लेखांकन की आवश्यकता है जिसमें उर्वरक, भूजल पम्पिंग, खेती, प्रसंस्करण और परिवहन से होने वाले उत्सर्जन शामिल हैं। सार्वजनिक नीति के लिए ठीक इसी तरह के परिप्रेक्ष्य की आवश्यकता है।

तीसरा तर्क किसानों की अतिरिक्त कमाई का है। सीएसईपी का अनुमान है कि पिछले दशक में इथेनॉल बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाली चीज़ों (फीडस्टॉक) की बढ़ी हुई मांग से किसानों ने रुपए 87,558 करोड़ कमाए। यह फ़ायदा सिफ़र् गन्ना, मक्का और धान उगाने वाले किसानों को ही मिला है। यह भारत के सभी किसानों को मिलने वाला कोई आम फ़ायदा नहीं है। प्रतिशत के हिसाब से देखें तो यह एक दशक में हुई कुल खेती की कमाई का बहुत छोटा सा हिस्सा है।

यहां हमें इथेनॉल की राजनीतिक अर्थव्यवस्था देखने को मिलती है। खासकर महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश में किसान, सहकारी समितियां, चीनी मिलें, डिस्टिलरी और राजनीति- इन सबके बीच गन्ना एक अहम कड़ी है। चीनी सेक्टर में अक्सर ज़रूरत से ज़्यादा उत्पादन की समस्या रही है जिसकी एक वजह गन्ने की तय कीमतें और खरीद की पक्की व्यवस्था है। इथेनॉल ने अतिरिक्त गन्ने के लिए एक बेहतरीन रास्ता दिया और गन्ने के बकाया भुगतान को कम करने में मदद की।

इसके बावजूद शायद भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती न तो विदेशी मुद्रा है और न ही कार्बन। यह पानी है। गन्ना और चावल हमारी सबसे ज़्यादा पानी लेने वाली फ़सलें हैं। भारत में पहले से ही पानी की भारी कमी है और देश के बड़े हिस्सों में भूजल स्तर गिर रहा है। कीमती विदेशी मुद्रा बचाने की कोशिश में हमें यह पक्का करना होगा कि हम इससे भी ज़्यादा कीमती संसाधन का नुकसान न करें। ब्राज़ील के इथेनॉल के अनुभव को सीधे भारत में लागू नहीं किया जा सकता। ब्राज़ील की आबादी भारत की आबादी का लगभग छठा हिस्सा है और उसका ज़मीन का क्षेत्रफल भारत से लगभग तीन गुना है। भारत का ज़मीन-पानी-आबादी का गणित बिल्कुल अलग है।

इसीलिए पूरी लागत व फ़ायदे का विश्लेषण बहुत ज़रूरी है। एक तरफ़ कच्चे तेल की बचत, विदेशी मुद्रा की बचत, कार्बन उत्सर्जन में कमी और किसानों की आमदनी है। दूसरी तरफ़ पानी की खपत की लागत, खाने-पीने की चीज़ों की कीमतों पर असर, आयातित खाद, वित्तीय छूट, गाड़ियों का कम माइलेज और पुरानी गाड़ियों पर पड़ने वाला खर्च है। पेट्रोल के मुकाबले इथेनॉल में एनर्जी कम होती है इसलिए इथेनॉल मिश्रित ईंधन से 6 से 7 प्रतिशत कम माइलेज मिलता है और पुरानी गाड़ियों के मामले में तो शायद और भी कम।

भले ही यह कोई बहुत बड़ी आपदा न हो लेकिन पुरानी गाड़ियों को लेकर जायज चिंताओं को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। इथेनॉल नमी सोखता है और कुछ रबर सील, होज़ और फ़्यूल-सिस्टम के हिस्सों पर असर डाल सकता है। सवाल यह नहीं है कि क्या हर पुरानी कार खराब हो जाएगी। सवाल यह है कि जब कोई दूसरा विकल्प मौजूद न हो तो क्या ई-10 के लिए बनी गाड़ी के मालिक को ई-20 इस्तेमाल करने के लिए मजबूर किया जाना चाहिए?

इसलिए सुधार का क्रम और रफ़्तार बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है। मौजूदा गाड़ियों के बेड़े से आगे निकलने वाले फ़्यूल स्टैंडर्ड लागू होने से पहले गाड़ियों को उनके अनुकूल बनाना होगा। फूू ड क्रॉप्स (खाने की फ़सलों) को ज़्यादा मात्रा में फ़्यूल बनाने में इस्तेमाल करने से पहले सेकंड-जेनरेशन इथेनॉल की क्षमता बढ़ानी होगी। विकल्प छीनने से पहले ग्राहकों का भरोसा जीतना होगा।

ज़बरदस्ती करने से बेहतर है कि इंसेंटिव और प्रोत्साहन दिया जाए। जो गाड़ियां इसके लिए बनी हैं, उन्हें ज़्यादा ब्लेंड वाला ईंधन इस्तेमाल करने दें। पुरानी गाड़ियों के मालिकों को ई-10 इस्तेमाल करने की सुविधा दें। अपनी मज़ीर् से बदलाव को बढ़ावा देने के लिए टैक्स का इस्तेमाल करें। साथ ही, खाने की फ़सलों और कम पानी पर निर्भरता बढ़ाने के बजाय, खेती के कचरे और अवशेषों से बनने वाले सेकंड-जेनरेशन इथेनॉल के उत्पादन को तेज़ी से बढ़ाएं।

भारत की एनर्जी स्ट्रैटेजी में इथेनॉल की जगह होनी चाहिए। लेकिन ई-20 से आगे बढ़ने में जल्दबाज़ी करना ज़रूरी नहीं कि कोई बेहतर पॉलिसी हो। तेज़ी का मतलब कामयाबी नहीं होता।

इथेनॉल की एक सही और बारीकी से तैयार की गई बैलेंस शीट से ये बातें पता चलेंगी: इम्पोर्ट किए गए इनपुट के बाद कितनी विदेशी मुद्रा की बचत हुई? लाइफ़ साइकल के आधार पर असल में कितना कार्बन उत्सर्जन कम हुआ? कितना पानी इस्तेमाल हुआ? खाने-पीने की चीज़ों और पशुओं के चारे की कीमतों पर क्या असर पड़ा? टैक्स में छूट, सस्ते फाइनेंस और दूसरे इंसेंटिव की कुल आर्थिक लागत क्या है; और गाड़ी चलाने वालों को माइलेज कम होने या पार्ट्स को जल्दी बदलने की वजह से क्या लागत उठानी पड़ी?

इथेनॉल सम्मिश्रण जैसे एक ही तरीके से विदेशी मुद्रा बचाने, कार्बन उत्सर्जन कम करने और किसानों की आय बढ़ाने जैसे कई लक्ष्यों को हासिल करना आसान नहीं है। अच्छी पॉलिसी में ट्रेड-ऑफ़ को समझा जाता है, सही क्रम तय होता है और नागरिकों पर ज़बरदस्ती करने के बजाय उन्हें उनकी पसंद का विकल्प देकर मनाया जाता है।

(लेखक वरिष्ठ अर्थशास्त्री हैं। सिंडिकेट: द बिलियन प्रेस)


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