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इथनाल ब्लेन्डिंग समस्या है समाधान नहीं

चंपारण की चीनी मिलों के आसपास बचपन गुजारने के चलते उनके कचरे से निकलने वाली बास और राजनैतिक चर्चाओं की याद हमेशा के लिए मन में रह गई है

इथनाल ब्लेन्डिंग समस्या है समाधान नहीं
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  • अरविन्द मोहन

पिछले दिनों मिलावट की सीमा बढ़ाने पर भी विचार हुआ था लेकिन तभी सोशल मीडिया में यह बहस छिड़ गई कि मिलावटी ईंधन का गाड़ियों के इंजन पर बुरा असर होगा। यह बात खास तौर से भारत में बिकने वाली गाड़ियों पर लागू होती है क्योंकि यहां इस विशेष ईंधन से चलने वाले इंजन लगाए ही नहीं जाते। इथनाल मिश्रित ईंधन की कीमत घटाने की मांग भी उठती रही है।

चंपारण की चीनी मिलों के आसपास बचपन गुजारने के चलते उनके कचरे से निकलने वाली बास और राजनैतिक चर्चाओं की याद हमेशा के लिए मन में रह गई है। कई बार किसान मिल में गन्ना उतारकर खाली बैलगाड़ी में मिल का छोआ वाला कचरा उठा लाते थे और अपने खेत में खाद की तरह इस्तेमाल करते थे। इसकी दुर्गंध तो मिलों दूर से भी ज्यादा लगती थी और लोग कुछेक दिन उन खेतों की तरफ जाने से बचते थे। नेता लोग इसी छोआ अर्थात मोलासेज से केमिकल कारखाना लगवाने या 'पेट्रोल बनाने' और बगास अर्थात गन्ने की सीठी से कागज बनाने का प्लांट लगवाने की बात करते थे। हमारे कुमारबाग में बेतिया राज की जमीन खाली थी। वहीं आसपास की चीनी मिलों से इन बाई-प्रॉडक्टों से स्वर्ग बसाने का वादा होता था जो आज तक पूरा नहीं हुआ। गन्ने से पेट्रोल बनाने की बात उन दिनों कचरे से सोना बनाने जैसी लगती थी पर बायो डीजल और बायो पेट्रोल का जमाना भी आया। हमारे यहां झटरोपा से तेल बनाने का प्रयोग चला तब तक अमेरिका ने मक्का और अन्य कृषि उत्पादों से बायो पेट्रोल बनाना शुरू करा दिया क्योंकि पेट्रोलियम पदार्थों की कीमत बेतहाशा बढ़ने लगी और सौ डालर प्रति बैरल का रेट भी पीछे हो गया। ऐसे में मक्का वगैरह से पेट्रोल बनाना 75 डालर प्रति बैरल जितने रेट पर संभव हो तो कौन मानता? हमारे यहां भी झटरोपा वाला प्रयोग तभी हुआ और अनाज से तेल बनाने की चर्चा शुरू हुई।

वह तो हुआ नहीं लेकिन नितिन गडकरी के परिवहन मंत्री बनने वाले राज में इसी छोआ अर्थात मोलासेज से पेट्रोल बनाने और पेट्रोल में मिलाकर बेचने का काम शुरू हुआ जो आज परवान पर है। यह काम सिर्फ गन्ना चीनी मिलों का न होकर सारे ब्रुअरीज(शराब कारखाने) के कचरे से होना शुरू हुआ है। करीब बीस फीसदी ब्लेन्डिंग के बिना पेट्रोल बिकता नहीं और कुछ पेट्रोल की खपत में बीस फीसदी का मतलब बहुत बड़ा हुआ। कीमत और विदेशी मुद्रा की बचत का हिसाब लगाएं तो और उजली तस्वीर दिखेगी पर जल्दी ही इस मामले में भी उत्पादन क्षमता जरूरत से ऊपर निकल जाएगी यह कल्पना से परे की चीज है। लेकिन आज यह स्थिति आ गई है। गन्ने के अलावा कुछ कृषि उत्पादों के इस्तेमाल की चर्चा भी है। लेकिन अमेरिका से जिस लटकी हुई व्यापार संधि को 'सपनों का सौदा' बताया जा रहा है उसमें मक्के की कुछ खास किस्म के आयात की बात भी थी और माना जाता है कि इसका प्रयोग इथनाल बनाने में हो सकता है। वैसे भारत खुद भी बड़े पैमाने पर मक्का पैदा करने लगा है जो मुर्गीपालन और मछलीपालन समेत देश की पूरी जरूरत से ज्यादा ही है। ऐसे में अगर हम अभी ही इथनाल अपनी जरूरत से ज्यादा बनाने लगे हों तो अमेरिका से मक्का आयात करने का तर्क समझना मुश्किल है।

अभी वह व्यापार समझौता हो, मक्का आयात हो उसका इस्तेमाल इथनाल बनाने में हो जैसे सारे लेकिन परंतु पर क्यों जाएं, अभी तो मौजूदा स्थिति ही इस कारोबार को परेशान करने वाली है। देश में इथनाल बनाने की कुल क्षमता 18 अरब लीटर की है जबकि पेट्रोलियम कंपनियां 11 से 12 अरब लीटर माल खरीदती हैं। देश में अब बिना इथनाल मिला पेट्रोल बिकता ही नहीं और मिलावट भी बीस फीसदी मात्रा तक है। इतना होने पर भी पूरा देशी इथनाल खपाने में परेशानी हो रही है। उधर तीन अरब लीटर और उत्पादन क्षमता इस साल बढ़ेगी। तब क्या होगा यही सोचकर व्यवसाय के लोग चिंतित हैं। यह सही है कि महंगे पेट्रोल के साथ बिकने से अच्छी कीमत वसूल होती है लेकिन खुद इथनाल की कीमतों और मांग आपूर्ति का हिसाब बहुत अनिश्चितता वाला है। सार्वजनिक क्षेत्र की तीनों कंपनियां, इंडियन आयल, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम यह सारा माल खरीदकर तेल में मिलाकर बेचती हैं। अब हो यह रहा है कि पेट्रोल की खपत में तो मात्र छह फीसदी सालाना की वृद्धि है जबकि इथनाल उत्पादन की क्षमता ज्यादा रफ्तार से बढ़ रही है। अगर तीन अरब लीटर की क्षमता और बढ़ी तो यह वृद्धि 20 फीसदी हो जाएगी। फिर कीमतों और आपूर्ति का खेल एक अन्य स्तर पर जाएगा, अगर अमेरिकी मक्का भी इस खेल में शामिल हुआ तो क्या दृश्य होगा? यह कल्पना ही की जा सकती है और यह विकल्प भी नहीं है कि मिलावट को बीस फीसदी से बढ़ा दिया जाए। क्योंकि इथनाल की मिलावट से ईंधन की ऊर्जा का स्तर कम होता है-बीस फीसदी की मिलावट से यह गिरावट छह फीसदी की होती है और इसके खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटाना भी हो चुका है। अभी तक अदालत ने ग्राहकों के दावे को दरकिनार रखा है। एक दूसरी शिकायत इस मिलावटी ईंधन का गाड़ी के इंजन पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव की है।

माना जाता है कि पिछले दिनों मिलावट की सीमा बढ़ाने पर भी विचार हुआ था लेकिन तभी सोशल मीडिया में यह बहस छिड़ गई कि मिलावटी ईंधन का गाड़ियों के इंजन पर बुरा असर होगा। यह बात खास तौर से भारत में बिकने वाली गाड़ियों पर लागू होती है क्योंकि यहां इस विशेष ईंधन से चलने वाले इंजन लगाए ही नहीं जाते। इथनाल मिश्रित ईंधन की कीमत घटाने की मांग भी उठती रही है लेकिन उसकी कीमत ज्यादा होने के नाम पर सरकार ने इस मांग को ठुकरा दिया था पर असल में तो इथनाल बाई-प्रोडक्ट ही है जो चीनी और शराब जैसे उद्योगों से निकलने वाले कचरे से बनता है। उसकी कीमत की एक सीमा होनी चाहिए। इससे उस अमेरिकी या पश्चिम जगह के अभियान पर भी अंकुश लगेगा जो अनाज को सड़ाकर इथनाल बनाने को लाभकर मानने से शुरू होता है। जैसे ही पेट्रोलियम पदार्थ 75 डालर बैरल के ऊपर पहुंचते हैं वे मक्का, गेहूं और अन्य अनाजों से इथनाल बनाने लगते हैं और जब पिछली बार यह दर सवा सौ के ऊपर पहुंची थी तब तो इतना अनाज इथनाल में जाने लगा कि दुनिया में अनाज की कमी और गरीब देशों में तंगी शुरू हो गई थी। हमारे पड़ोसी पाकिस्तान में तो आटे की लूट शुरू हो गई थी। कम से कम उस स्थिति से तो बचना ही होगा और इथनाल की कीमतों को एक सीमा में रखना होगा।


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