ललित सुरजन की कलम से पंचायती राज में बाधक अभिजात सोच
अनिवार्य शिक्षा कानून लागू हो जाने के बाद भी उसका उल्लंघन कदम-कदम पर हो रहा है।

'यह तर्क उचित ही है कि सांसद, विधायक या पंच-सरपंच बनने के लिए कुछ न्यूनतम अहर्ताएं हों, लेकिन औपचारिक शिक्षा को ही अनिवार्य तथा सर्वप्रमुख योग्यता क्यों माना जाए? यह सोच एक तरफ तो मनुष्य की सहज बुद्धि की अवज्ञा करती है, दूसरी तरफ इसमें भारत की सामाजिक संरचना के प्रति अवहेलना का भाव प्रकट होता है एवं तीसरी ओर अभिजात एवं सम्पन्न वर्ग की वर्चस्ववादी नीति का प्रतिबिंब भी देखने मिलता है। यह सब जानते हैं कि भारत में औपचारिक शिक्षा का ढांचा कितना कमजोर और गरीब विरोधी है। अनिवार्य शिक्षा कानून लागू हो जाने के बाद भी उसका उल्लंघन कदम-कदम पर हो रहा है। आज़ादी के समय साक्षरता और शिक्षा की जो दर थी उसमें काफी बढ़ोतरी हुई है, फिर भी संपूर्ण साक्षरता का लक्ष्य अभी तक हासिल नहीं किया जा सका है। भारत ने सहस्राब्दी लक्ष्य के प्रति जो प्रतिबद्धता जाहिर की थी उस पर भी वह खरा नहीं उतरा है।'
(देशबन्धु सम्पादकीय 29 दिसंबर 2014)
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