पांच राज्य के चुनाव विपक्ष के लिए मौका : मोदी का सबसे कमजोर समय
ईरान युद्ध और उसके नतीजे में देश में गैस और पेट्रोल की किल्लत में पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों की खबर दब गई

सबसे ज्यादा चर्चा में बंगाल का चुनाव है। पिछले दो विधानसभा चुनाव से जब से मोदी प्रधानमंत्री बने हैं उन्होंने बंगाल में पूरी ताकत झोंक रखी है। मगर पिछले 12 सालों में उनसे लड़ने में क्षेत्रीय दलों का रिकार्ड अच्छा है। ममता ने दोनों बार 2016 और 2021 में भाजपा के मंसूबे पूरे नहीं होने दिए। लेकिन इस बार एक नए हथियार से वोट काटकर वह ममता को कमजोर करना चाह रहे हैं।
ईरान युद्ध और उसके नतीजे में देश में गैस और पेट्रोल की किल्लत में पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों की खबर दब गई। मगर विपक्ष के लिए यह चुनाव बहुत महत्वपूर्ण हैं। तीन राज्यों केरल असम और पुडुचेरी में तो नामांकन की प्रक्रिया खत्म भी हो गई है। यहां 10 दिन बाद मतदान है। 9 अप्रैल को। बाकी दो राज्यों बंगाल और तमिलनाडु में नामांकन चल रहा है। बंगाल में दो चरणों में चुनाव होना है। पहला चरण 23 अप्रैल को है। उसी दिन तमिलनाडु में भी चुनाव है। एक ही दिन में। यहां के लिए नामांकन चल रहे हैं। 6 अप्रैल को खतम हो जाएंगे। फिर बंगाल में दूसरे चरण की प्रक्रिया शुरू होगी। दूसरे चरण का मतदान 29 अप्रैल को होगा।
विपक्ष के लिए एक मौका है। मैच फिनिशर बनने का। वह पूरे मैच में अच्छा खेलता है। मगर मैच हाथ से निकल जाता है। जनता का विश्वास इससे टूटता है। इसमें कांग्रेस का परसेन्टेज सबसे ज्यादा है। मैच को हाथों से फिसल दिए जाने का। इन पांच राज्यों में केवल एक राज्य असम में ही कांग्रेस का सीधा मुकाबला बीजेपी से है। हालांकि पुडुचेरी में भी मुकाबले में वही है। कांग्रेस से गए और क्षेत्रीय दलों के भाजपा के साथ बने एनडीए गठबंधन से। मगर बहुत छोटी विधानसभा है 30 सदस्यों की तो उसमें किसी कि रूचि ज्यादा नहीं है।
बाकी सबसे ज्यादा चर्चा में बंगाल का चुनाव है। पिछले दो विधानसभा चुनाव से जब से मोदी प्रधानमंत्री बने हैं उन्होंने बंगाल में पूरी ताकत झोंक रखी है। मगर पिछले 12 सालों में उनसे लड़ने में क्षेत्रीय दलों का रिकार्ड अच्छा है। ममता ने दोनों बार 2016 और 2021 में भाजपा के मंसूबे पूरे नहीं होने दिए। लेकिन इस बार एक नए हथियार से वोट काटकर वह ममता को कमजोर करना चाह रहे हैं। अभी तक 76 लाख लोगों के नाम काटे जा चुके हैं और अभी फाइनल मतदाता सूची नहीं आई है। आशंका है कि एक करोड़ के लगभग वोट काटे जा सकते हैं। राज्य में साढ़े सात करोड़ के करीब मतदाता थे। इनमें से एक करोड़ का नाम कटने का मतलब 15 प्रतिशत मतदाता गायब करना। बहुत बड़ा आंकड़ा है। पूरी चुनाव प्रक्रिया पर सवाल खड़ा हो गया है। सुप्रीम कोर्ट मामले को लगातार टालता जा रहा है। अब एक अप्रैल को सुनवाई है। मतदाता सूची अभी तक फाइनल नहीं है। नाम काटने की प्रक्रिया जारी है। बंगाल सरकार का कहना है कि पहले चरण के लिए 6 अप्रैल को और दूसरे के लिए 9 अप्रैल को नामांकन खतम हो जाने के बाद मतदाता सूची में कोई फेरबदल नहीं हो सकता है।
उससे पहले सुप्रीम कोर्ट को एसआईआर के नाम पर गलत तरीके से काटे गए नाम वापस जुड़वाना चाहिए। नहीं तो यह माना जाएगा कि सारी संवैधानिक संस्थाएं बीजेपी को चुनाव जिताने की कोशिश में लगी हैं। और यह सच है। खासतौर पर आज जब प्रधानमंत्री मोदी हर मोर्चें पर फंसे हुए हैं तब केवल जीत ही उनके गिरते ग्राफ को कुछ सहारा दे सकती है। और यह बात वे अच्छी तरह जानते हैं। और पूरी ताकत लगाए हुए हैं।
लेकिन यह बात विपक्ष पर भी लागू होती है। उसकी वापसी का भी यह सुनहरा मौका है। जीत का सबसे बड़ा फायदा यह होगा जनता का हौसला बढ़ेगा। विपक्ष की तरह जनता भी हार माने बैठी है। आएगा तो मोदी ही। यह नरेटिव (धारणा)ऐसा फैला दिया गया है कि लोग कुछ करते ही नहीं। और अगर कोई कुछ करना चाहे तो कहते हैं क्या फायदा चुनाव आयोग जीता देगा!
सब सही है। मगर क्या इसका मतलब है विपक्ष हाथ पर हाथ धरा बैठा रहे। चुनाव आयोग गड़बड़ कर रहा है। मगर रुकेगा कैसे? सुप्रीम कोर्ट तो उल्टा बंगाल सरकार को डांटता है कि उसके काम में बाधा मत बनो। मतलब वह नाम काट रहा है काटने दो। हल चुनाव जीतने में ही है। किसी भी तरह। ज्यादा से ज्यादा मेहनत करके। क्योंकि पिछले 12 साल में यह साफ हो गया है कि जिसकी सरकार सारी संवैधानिक संस्थाएं उसकी।
अपनी स्वतंत्रता स्वायत्तता को खोने में उन्हें कोई गुरेज नहीं। इन्हें अगर वापस लाइन पर लाना है तो हाथ में ताकत होना चाहिए। नहीं तो। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने चुनाव धांधलियों का पूरी तरह पर्दाफाश कर दिया। नाम गलत जोड़े किस तरह जाते हैं और काटे किस तरह जाते हैं। यह दो प्रेस कान्फ्रेंस करके उन्होंने मय सबूतों के दिखा दिया। मगर किसी पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा।
यह काम करते रहना चाहिए मगर उन लोगों की बातों में बिल्कुल नहीं आना चाहिए जो कहते हैं कि चुनाव आयोग जीतने ही नहीं देगा। अभी राज्यसभा चुनाव में क्या हुआ? तीन राज्यों में कांग्रेस के विधायकों ने भाजपा को वोट दिए। दो में विपक्ष का प्रत्याशी हार गया। बस हरियाणा में जरा से मार्जिन से जीत पाया। कांग्रेस की हार की हैट्रिक बनते-बनते रह गई। इससे पहले दो राज्यसभा चुनावों में कांग्रेस का बहुमत होते हुए भी उसके प्रत्याशी हारे।
इसी तरह अभी लास्ट हरियाणा के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस हारी। माना कि चुनाव आयोग और बीजेपी ने सारी धांधलियां की थीं मगर फिर भी जनता कांग्रेस को जिताना चाह रही थी। लेकिन कांग्रेस ने जनता की इच्छाओं आकांक्षाओं को भी दरकिनार करते हुए अपनी गुटबाजी को तरजीह दी। और आपस में इस तरह लड़े कि जनता सिर्फ रोती रह गई कि यह नहीं सुधर सकते। आप हरियाणा के दोनों गुटों से पूछ लीजिए दोनों मानेंगे कि गुटबाजी ने हरवाया। बस फर्क यह है कि दोनों एक दूसरे पर आरोप लगाएंगे। लेकिन यह सारा मामला देखना चाहिए था कांग्रेस हाईकमान को। सख्त कदम उठाना चाहिए थे।
तीन बार से विधानसभा चुनाव हरवा रहे हैं। दो राज्यसभा हरवा चुके। तीसरे में केन्डिडेट की किस्मत ही काम कर गई कि वह बच गया। कांग्रेसियों ने तो हरवाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। लेकिन क्या कार्रवाई हुई? कुछ नहीं। सबको मैसेज गया कि चौथी बार राज्यसभा में भी और विधानसभा चुनाव में भी इसी तरह कांग्रेस को हराना। हाईकमान खुश होगा!
हरियाणा की तरह ही राजस्थान हारे थे। जनता की जिताने की सारी कोशिशों को असफल करते हुए। वही गुटबाजी। मध्यप्रदेश में तो जनता ने कांग्रेस को जिताने की कोशिशें ही छोड़ दीं। 2003 से कितने चुनाव हो गए। याद ही नहीं है। 2018 में कांग्रेस द्वारा नहीं जितेंगे की भारी जिद के बावजूद जनता ने जिता ही दिया था। मगर कांग्रेस ने कहा कि अच्छा तुम अपनी मर्जी कर लोगे! लो हम सत्ता ऐसे गंवाते हैं। लड़ पड़े। एक साल बाद ही बीजेपी की सरकार फिर बनवा दी।
चुनाव आयोग गलत है, गलत है, बहुत गलत! मगर आप भी सही नहीं हैं, नहीं हैं, नहीं। मध्य प्रदेश के 2003, 2008 और 2013 तक के चुनाव में चुनाव आयोग की क्या भूमिका थी? 2014 के लोकसभा चुनाव में क्या थी?कांग्रेस को इन सवालों से गुजरना पड़ेगा। इन पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में उसका कुछ ज्यादा दांव पर नहीं लगा है। मगर पूरे विपक्ष का लगा है। मुख्य विपक्षी पार्टी होने के नाते उसे सोचना पड़ेगा। कहीं से भी मोदी की जीत उसी का नुकसान है।
केरल में भाजपा की एक भी विधानसभा सीट नहीं है। मगर लेफ्ट और कांग्रेस दोनों एक दूसरे पर उसके साथ मिले होने का आरोप लगा रहे हैं। केरल में इन दोनों में से ही कोई एक जीतेगा। मगर जिस तरह लड़ रहे हैं उससे लगता है कि बीजेपी चाहे जीत जाए लेकिन दूसरा नहीं जीतना चाहिए।
विपक्ष की एकता खतम हो गई है। बंगाल और केरल दोनों जगह अगर थोड़े संयम से लड़ लें तो आगे के लड़ाई के लिए संग साथ बना रहेगा। विपक्ष की एकता और चुनावी जीत हासिल करना यह दोनों चीज ही ऐसी हैं जो मोदी की वापसी को रोक सकती हैं। मोदी इस समय अपने सबसे कमजोर दौर में हैं।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार है)


