Top
Begin typing your search above and press return to search.

देसी बीज, पशुपालन और जंगल बचाने का जतन!

ग्रामीणों ने अपना बांज का जंगल बचाया है और उसी जंगल के जलस्रोत से वर्ष भर ठंडा पानी मिलता है।

देसी बीज, पशुपालन और जंगल बचाने का जतन!
X

— बाबा मायाराम

ग्रामीणों ने अपना बांज का जंगल बचाया है और उसी जंगल के जलस्रोत से वर्ष भर ठंडा पानी मिलता है। जड़धारी बताते हैं कि बांज का पेड़ न सिर्फ चारा, पत्ती व खाद का काम करता है बल्कि मिट्टी बांधने एवं जलस्रोतों की रक्षा भी अन्य पेड़ों के मुकाबले ज्यादा करता है। यहां की सामूहिकता और भाईचारे ने बीज, खेती, पशुपालन और जंगल बचाने का सराहनीय काम किया है।

उत्तराखंड के सामाजिक कार्यकर्ता विजय जड़धारी देसी बीज बचाने के लिए जाने जाते हैं। मुझे उनसे कई बार मिलने, साथ में यात्रा करने और उनके साथ समय बिताने का मौका मिला है। कुछ साल पहले उनके गांव भी गया था। इस कॉलम में उनके बारे में बात करना चाहूंगा।

जड़धारी जी न केवल खुद देसी बीजों की खेती करते हैं, बल्कि इसका प्रचार-प्रसार करते हैं। देसी बीजों की प्रदर्शनी लगाते हैं, बीजों का आदान-प्रदान करते हैं। किताबें लिखते हैं, जिससे देसी बीजों की खेती की ओर लोगों का रूझान बने। उनके काम का असर देश भर में देखा जा सकता है। देसी बीजों की खेती का चलन बढ़ रहा है।

पिछले कई सालों से मुझे उनके साथ कई बार मिलने व साथ रहने का मौका मिला है। उनका देशी बीजों का काम तो प्रभावित करता ही है, बल्कि उनका जीवन भी आदर्श है। वे गांव में रहते हैं, खेती करते हैं, और उस पर सार्थक लेखन भी करते हैं।

उन्होंने देसी बीज बचाने के साथ उनके गांव का जंगल भी हरा-भरा किया है। गांव के लोगों के सहयोग से सूखे और उजाड़ जंगल को फिर से पुनर्जीवित किया है। उनसे जब भी बात होती है, तब वे बताते हैं कि कई लोग इस जंगल को देखने आ रहे हैं। वनविभाग की कई टीमें भी उस जंगल को देखने आईं हैं और जंगल को फिर से हरा-भरा करने के काम को सराहा है।

जड़धारी जी, जहां भी जाते हैं, उत्तराखंड के देसी बीजों को साथ लेकर जाते हैं। रंग-बिरंगे बीज न केवल आकर्षित करते हैं, बल्कि स्वाद में भी बेजोड़ हैं। इन पौष्टिक अनाजों को पर्यटक भी बहुत पसंद करते हैं। कई अनाजों को स्वास्थ्य की दृष्टि से भी बेहतर माना जाता है। चिकित्सक भी इनको खाने के लिए कहते हैं।

कुछ साल पहले जब मैं उनके गांव जड़धार गया था। यह टिहरी गढ़वाल जिले का गांव है। तराई में हेंवल नदी बड़े-बड़े पत्थरों के बीच से चमकती हुई बहती है। नदी इठलाती कूदती पहाड़ों के बीच अपना सौन्दर्य बिखेरते चलती है। हेंवल सरकण्डा से निकलती है और आगे चलते हुए गंगा में समाहित हो जाती है। हेंवल नदी के इलाके को यहां लोग हेंवलघाटी कहते हैं।

जड़धारी जी का गांव हेंवल नदी के किनारे बसा है। गांव में मकान दूर-दूर बसे हैं। कुछ पहाड़ी पर तो कुछ तराई में। पहाड़ी पर बसे घर दूर-दूर हैं, इसका कारण समतल जमीन का नहीं होना है। जहां पर कुछ समतल जमीन मिली, वहीं पर घर बनाकर रहने लगे। तराई में घनी आबादी है।

सत्तर के दशक के उत्तरार्ध में उत्तराखण्ड का यह क्षेत्र देश-दुनिया में इसलिए मशहूर हो गया जब यहां के लोग जंगल को कटने से बचाने के लिए पेड़ों से चिपक गए। इसे चिपको आंदोलन के नाम से जानते हैं। विजय जड़धारी, चिपको आन्दोलन के प्रमुख कार्यकर्ताओं में एक थे। इसके बाद उन्होंने जड़धार गांव का जंगल बचाने का जतन किया जिससे आज परम्परागत पानी के स्रोत सदानीरा हैं ।

वे बारहनाजा की मिश्रित खेती करते हैं। बारहनाजा का अर्थ है बारह अनाज। किन्तु इसमें अनाज ही नहीं, दलहन, तिलहन, शाक भाजी, मसाले व रेशा आदि भी शामिल हैं। बारहनाजा में 12 फसलें हों, यह जरूरी नहीं। इसमें 20 फसलें भी हो सकती हैं।

उनके घर पूरी तरह अपने खेतों में उगाए गए अनाज से भोजन बनता है। झंगोरा का भात, बाजरा की घी चुपड़ी रोटी, राजमा, मीठा करेले की सब्जी का स्वाद ही अलग था। तीन दिन मैं उनके घर ठहरा था। पूरी तरह देसी पौष्टिक अनाजों का भोजन किया, यह सदैव ही याद रहता है। जड़धारी बताते हैं कि यहां हर से कोई-न-कोई एक नौकरी में है। लेकिन इससे खेती के प्रति लोगों का मोह कम नहीं हुआ। जो लोग घर में हैं, वे मेहनत से पीछे नहीं हटते।

मुझे याद आ रहा है कि वे मुझे एक घर ले गए थे, उस घर के लड़के की हाल में ही शादी हुई थी। वह लड़का कनाडा में पहले होटल व्यवसाय से जुड़ा था। बाद में किसी फैक्ट्री में काम कर रहा है। अच्छा पैसा भी कमाता है। उसकी बहू इसी गांव की थी। वह अच्छी पढ़ी-लिखी थी। लेकिन मोबाइल को घर रखकर घास काटने जाती है। खेतों में मेहनत करती है।

इसी प्रकार, जड़धारी जी मुझे पटुडी गांव ले गए। इस गांव में बीज बचाने का अच्छा काम हुआ है। इस काम में महिलाओं की प्रमुख भूमिका है क्योंकि खेती का अधिकांश काम महिलाएं ही करती हैं। वे हल चलाने को छोड़कर खेती के हर काम करती हैं। फिर भी महिलाओं के काम की मान्यता नहीं है। बीज भंडारण, बुआई, निंदाई, गुड़ाई, व बीज संकलन आदि का महत्वपूर्ण कार्य महिलाएं ही करती हैं।

यहां उस दिन बीज बचाओ आंदोलन की बैठक भी थी। और सभी गांव की महिलाएं उनके घरों से एक-एक मु_ी बीज लेकर आई थी। ऐसी बैठकों में बीजों का आदान-प्रदान होता है। जो भी बीज यहां से लेकर जाती हैं, अगले साल वापस करती हैं, और दूसरे पड़ोसियों को भी बीज उपलब्ध करवाती हैं।

पहाड़ों में पशुपालन भी बड़ा आजीविका का स्रोत है। यहां के बाशिंदे भी भैंसें पालते हैं। पहले गायें भी पालते थे तब जंगल ज्यादा था। और उस समय बच्चों को पढ़ाने का चलन नहीं था, तब वे पशु चराने का काम करते थे लेकिन अब सब बच्चे पढ़ना चाहते हैं। इसलिए इसमें थोड़ी कमी आ रही है।

इस गांव के लोगों ने जल, जंगल और जमीन जैसे प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग किया है और इसी से इसकी पहचान स्वावलंबी और आदर्श गांव के रूप में की जाती है। बारहनाजा की मिश्रित फसलें, गांव में साफ-सफाई व पानी का प्रबंधन, जंगल की रखवाली और खेतों की जंगली जानवरों से सुरक्षा गांव वाले मिलकर करते हैं।

ग्रामीणों ने अपना बांज का जंगल बचाया है और उसी जंगल के जलस्रोत से वर्ष भर ठंडा पानी मिलता है। जड़धारी बताते हैं कि बांज का पेड़ न सिर्फ चारा, पत्ती व खाद का काम करता है बल्कि मिट्टी बांधने एवं जलस्रोतों की रक्षा भी अन्य पेड़ों के मुकाबले ज्यादा करता है।

कुल मिलाकर, यह कहा जा सकता है यहां की सामूहिकता और भाईचारे ने बीज, खेती, पशुपालन और जंगल बचाने का सराहनीय काम किया है जो यहां गांव में टिके रहने के लिए जरूरी है। यह ऐसे समय और भी महत्वपूर्ण हो जाता है, जब आज खेती में ठहराव आ गया है, इसलिए देसी बीजों की खेती के साथ पशुपालन और जंगल बचाना बहुत ही जरूरी है। क्या हम इस दिशा में आगे बढ़ना चाहेंगे?


Next Story

Related Stories

All Rights Reserved. Copyright @2019
Share it