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चूल्हों में बुझती आग

नया वित्तीय वर्ष शुरु होते ही देश में एलपीजी सिलेंडरों की कीमतों में फिर से बढ़ोतरी की गई है

चूल्हों में बुझती आग
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मिट्टी तेल से लेकर एलपीजी सिलेंडर तक सबकी कालाबाजारी के दिन लौट आए हैं। सरकार ने नियंत्रण का काम छोड़ दिया है। हर दिन पेट्रोलियम मंत्रालय से अधिकारी आकर वक्तव्य पढ़ देते हैं कि कहीं किसी चीज की कमी नहीं है, देश में तेल और गैस का भरपूर भंडार है। कर्तव्य पथ पर बैठे लोग अब इसी तरह कर्तव्य निभाएंगे।

नया वित्तीय वर्ष शुरु होते ही देश में एलपीजी सिलेंडरों की कीमतों में फिर से बढ़ोतरी की गई है। व्यावसायिक एलपीजी सिलेंडर कम से कम 200 रुपये तक और छोटे सिलेंडर यानी एफटीएल सिलेंडर की कीमत अब 51 रुपये तक की बढ़त हुई है। 5 किलोग्राम का एफटीएल (फ्री ट्रेड एलपीजी) सिलेंडर इंडियन ऑयल द्वारा दिए जाने वाला एक छोटा, पोर्टेबल गैस सिलेंडर है, जो ठोस पते के बिना केवल पहचान पत्र के आधार पर मिल जाता है। यानी प्रवासी मजदूरों, छात्रों और रेहड़ी-पटरी लगाने वालों के लिए यह बड़ा सहारा होता है। लेकिन अब वे इस महंगे सिलेंडर को खरीद पाएंगे या नहीं कौन जानता है। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक घरेलू सिलेंडर के दाम बढ़ाने की कोई खबर तो आई नहीं है, लेकिन सरकार का पीछे से आकर धप्पा करने का जो तरीका है, उसमें अब लोगों को एक धक्का और खाने के लिए तैयार रहना चाहिए। वैसे भी इस देश के बहुसंख्यक हिंदुओं को एक धक्का और के जुमले में ही तो भाजपा ने फंसाया है और लोग खुशी-खुशी फंसे भी, क्योंकि उन्हें लगा कि धर्म बचेगा तो हम बचेंगे। अब पता चल रहा है कि पेट की आग तो हिंदू, मुसलमान, ईसाई सबकी एक जैसी ही होती है। पेट की आग अब और भड़केगी, क्योंकि चूल्हों में आग बुझने लगी है।

एक अप्रैल की सुबह सिलेंडर की कीमतें बढ़ने की खबर आई, तो मन में विचार उठा काश, ये सरकार का अप्रैल फूल वाला कोई मज़ाक हो। लेकिन फिर ध्यान आया कि इस सरकार को हास-परिहास से सख्त नफरत है। संघ का प्रशिक्षण ही ऐसा है कि मुस्कुराना गुनाह लगने लगता है। हर समय तने हुए चेहरे और चढ़ी हुई भृकुटियां ही इन्हें पसंद आती हैं। साहब तो मुस्कुराते भी तभी हैं जब वे खुद विदेश में हों या किसी विदेशी राष्ट्राध्यक्ष से गलबहियां करते हों। अभी फरवरी में ही देश ने देखा है कि कैसे इजरायल जाकर मोदी इसी बात पर जोर से ठहाके मार रहे थे क्योंकि वहां के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा कि देखो मेरी पत्नी ने भी भगवा पहना है। नरेन्द्र मोदी ने बस उन्हें सेम पिंच नहीं किया, वर्ना भगवा देखकर खुश होने की हरकत कर अपने पद की गरिमा गिराने में कोई कसर उन्होंने छोड़ी नहीं थी। वे भूल गए थे कि भारत की जनता के पैसों पर उनका इजरायल दौरा देश के प्रधानमंत्री की हैसियत से हुआ है, वर्ना भाजपा उन्हें अपने खर्च पर चांद भेजे और वहां जाकर वो भगवा-भगवा करें, किसे फर्क पड़ता है। लेकिन जब जनता के दिए टैक्स से करोड़ों रुपये खर्च करके विदेशी दौरे होते हैं, तो उनका मकसद देश और जनता के हित को सर्वोपरि रखना ही होना चाहिए। मगर अभी जो हो रहा है, उसे जनता से बेहतर कौन समझ सकता है। इजरायल जाकर मोदी लौटे नहीं कि ईरान पर हमला हो गया और उसके बाद ईंधन का ऐसा संकट देश में खड़ा हुआ कि अब फिर से अंगीठी सुलगाने के दिन आ गए हैं। हालांकि उसके लिए भी कोयला, लकड़ी और कैरोसिन का संकट सामने है। जिस सरकार ने कैरोसिन का उपयोग बंद करवाने के दावे किए थे, वही मोदी सरकार अब फिर से उसे बेचने की छूट दे रही है। लोगों से कहा जा रहा है कि आप कैरोसिन से स्टोव जलाइए। हालांकि अब बाजार में मिट्टी तेल से जलने वाले स्टोव मिलना भी मुश्किल है। अगर मिल भी रहे हैं तो पहले से कई गुना बढ़े दामों पर। इसके अलावा बिजली से चलने वाले चूल्हों की मांग भी बढ़ गई है, तो उनकी कीमतें भी अनाप-शनाप बढ़ रही हैं। इसके बाद महिलाओं के सामने एक ही चारा बचता है कि वे मिट्टी के चूल्हे बनाकर गोबर के उपलों से आग जलाकर खाना पकाएं।

पिछले दिनों कुछ ऐसी खबरें देखने मिलीं, जिनमें कोयले, लकड़ी या उपलों से जले चूल्हे पर पके भोजन के स्वाद की तारीफ की गई। पुराना जमाना याद दिलाया गया कि कैसे हमारी दादी-नानी के पकाए भोजन में अलग सा स्वाद होता था, क्योंकि वे जमीन पर बैठकर मिट्टी के चूल्हे पर भोजन पकाती थीं। वाकई भक्तों की बुद्धि की दाद देनी पड़ेगी। अब देखना ये है कि मिक्सर ग्राइंडर की जगह सिलबट्टे और मशीन से अनाज पीसने की जगह फिर से पत्थर वाली चक्की का इस्तेमाल शुरु करने के लिए कौन से तर्क दिए जाते हैं। ऐसे में कोई महिलाओं की आजादी, दफ्तर जाने वाली महिलाओं पर पड़ने वाला दोहरा बोझ या इसी तरह की बेतुकी बात करे, तो फिर रानी लक्ष्मीबाई का उदाहरण भक्त दे सकते हैं। जब एक महिला अपनी पीठ पर बच्चे को बांध कर घोड़े पर सवार हो अंग्रेजों से लड़ सकती है, ताकि उसकी झांसी बचे, तो क्या आज की आधुनिक स्त्री अपने देश की खातिर, परिजनों की सेवा की खातिर इतना सा बोझ नहीं उठा सकती।

प्रधानमंत्री मोदी चाहें तो अब अपने भाषण की पंक्तियों को बदल भी सकते हैं। उन्होंने बूढ़ी मांओं को रसोई के धुएं से होने वाली तकलीफ का ज़िक्र किया था, अब वे बता सकते हैं कि उनके बचपन में उन्होंने चक्की पीसती महिलाओं को देखकर संघर्ष का कैसा सबक लिया है। वैसे भी इस देश के लोग तो इसी बात पर द्रवित होते रहे हैं कि बेचारे मोदीजी ने कितनी मुश्किलों से चाय बेच-बेच कर आठ हजार करोड़ तक के हवाई जहाज का सफर तय किया है। उन्हें भी एक दिन ऐसे ही ऐश करने का मौका मिल सकता है, बशर्ते जनता अभी ऐसे संघर्ष करने के लिए तैयार रहे। इसलिए तो 2014 से लेकर 2016 तक तरह-तरह के अच्छे दिन जनता ने देखे हैं।

मिट्टी तेल से लेकर एलपीजी सिलेंडर तक सबकी कालाबाजारी के दिन लौट आए हैं। सरकार ने नियंत्रण का काम छोड़ दिया है। हर दिन पेट्रोलियम मंत्रालय से अधिकारी आकर वक्तव्य पढ़ देते हैं कि कहीं किसी चीज की कमी नहीं है, देश में तेल और गैस का भरपूर भंडार है। कर्तव्य पथ पर बैठे लोग अब इसी तरह कर्तव्य निभाएंगे, उन्हें वहां से उठकर आम गलियों के भीतर जाने की जरूरत महसूस ही नहीं होती, ताकि वहां जाकर देखें कि आम लोगों तक इस तेल और गैस के भंडार से आपूर्ति आसानी से हो रही है या नहीं। कभी खुशी, कभी गम फिल्म याद कीजिए, उसमें अमिताभ बच्चन बार-बार कहते हैं- कह दिया, बस कह दिया। यानी उसके बाद पूर्णविराम, कोई अल्पविराम या प्रश्नवाचक चिह्न की गुंजाइश नहीं है। हालांकि फिल्म का अंत आते-आते ऐसा मौका भी आता है कि जया बच्चन भी पलट कर कह देती हैं कह दिया, बस कह दिया। देश में अभी मोदी फिल्म का शायद मध्यांतर चल रहा है, अंत तो तभी आएगा जब जनता कहेगी कह दिया, बस कह दिया। लेकिन उससे पहले अभी बहुत कुछ नाटकीय घटना बाकी दिख रहा है।

जैसे जब सरकार यह तय कर रही होगी कि एक अप्रैल से गैस सिलेंडर के दाम फिर से बढ़ाने हैं, क्योंकि जनवरी, फरवरी और मार्च की बढ़ोतरी के बाद अप्रैल में नहीं बढ़ाएंगे तो ये महीना बुरा मान जाएगा। तो उससे पहले 31 मार्च को नरेन्द्र मोदी गुजरात में भाषण दे रहे थे कि मध्यपूर्व में जंग के कारण कई देशों में ईंधन की कीमतों में 10 से 25 प्रतिशत की वृद्धि हुई है जबकि भारत ने सुनिश्चित किया है कि उसके लोग इसके सबसे बुरे प्रभाव से सुरक्षित रहें। अब कोई मोदी से पूछे कि लोग घंटों सिलेंडर लेने के लिए लाइन में लगे हैं, बूढ़े-बच्चे-महिलाएं सब कतार में खड़े हैं और कुछ लोगों की तो जान भी चली गई है। घरों में मियां-बीवी के रिश्तों में दरारें पड़नी शुरु हो गई हैं, क्योंकि वक्त पर भोजन न देने का गुस्सा कई पुरुष अपनी पत्नियों पर ही निकाल रहे हैं। शहरों में छोटे कारखाने बंद हो रहे हैं, और मजदूर फिर अपने गांवों में बेरोजगारी का बोझ लिए लौट रहे हैं। खाली सिलेंडर भर जाए और गाड़ियों में पेट्रोल-डीजल भर जाए, यही दिन की सबसे बड़ी उपलब्धि बन चुकी है। इससे ज्यादा और किस बुरे प्रभाव की उम्मीद मोदी कर रहे थे।

वैसे हद तो ये है कि इतने बड़े वैश्विक और उसकी वजह से पैदा हुए घरेलू संकट पर भी प्रधानमंत्री कांग्रेस को कोसना नहीं छोड़ रहे, गुजरात में उन्होंने कांग्रेस को राजनैतिक गिद्ध तक बता दिया। मोदी ने कहा, आज जब देश को एकता और एकजुटता की जरूरत है, तब कांग्रेस नेता विभाजनकारी राजनीति कर रहे हैं। जब देश को भरोसे की जरूरत है, तब कांग्रेस भय और अफवाहें फैलाने में व्यस्त है। जब देश संयम बरतने की अपील कर रहा है, तब कांग्रेस लोगों को भड़काना चाहती है। उन्होंने कहा कि 'राजनीति के गिद्धोंÓ की तरह, कांग्रेस घरेलू समस्याओं के बढ़ने का इंतजार कर रही है और उम्मीद कर रही है वह स्थिति का इस्तेमाल राजनीतिक लाभ के लिए करेगी। उन्होंने कहा, 'भारत किसी भी संकट का सामना करने में सक्षम है। हालांकि, कांग्रेस पेट्रोल पंप पर लंबी कतारें लगाने और अव्यवस्था फैलाने के लिए लोगों को उकसाने की कोशिश कर रही है।Ó

शायद न चाहते हुए भी मोदी ने पेट्रोल पंपों और गैस एजेंसियों के आगे लगी कतारों को देख ही लिया होगा। इसलिए इसका ठीकरा वे कांग्रेस पर फोड़ रहे हैं। वैसे कांग्रेस को इस बात पर खुश हो जाना चाहिए कि मोदी अब भी खुद को कांग्रेस के आगे कमजोर समझ रहे हैं। क्योंकि कांग्रेस के कहने पर अगर लोग भड़क रहे हैं और सरकार लोगों को संभाल नहीं पा रही, तो इसका मतलब यही है कि आज भी देश की जनता सरकार से ज्यादा कांग्रेस की बात सुन रही है।


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