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डॉ. एम. एस. स्वामीनाथन : भारत की हरित क्रांति के जनक

जैविक खेती, सूक्ष्म सिंचाई (ड्रिप एवं स्प्रिंकलर), मृदा परीक्षण तथा जल संरक्षण को प्रोत्साहित करना तथा एवरग्रीन रिवोल्यूशन की अवधारणा को व्यवहार में उतारने के लिए किसानों को जलवायु-अनुकूल कृषि तकनीकों का प्रशिक्षण दिया जाना भी जरूरी है

डॉ. एम. एस. स्वामीनाथन : भारत की हरित क्रांति के जनक
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  • प्रदीप पाटिल

जैविक खेती, सूक्ष्म सिंचाई (ड्रिप एवं स्प्रिंकलर), मृदा परीक्षण तथा जल संरक्षण को प्रोत्साहित करना तथा एवरग्रीन रिवोल्यूशन की अवधारणा को व्यवहार में उतारने के लिए किसानों को जलवायु-अनुकूल कृषि तकनीकों का प्रशिक्षण दिया जाना भी जरूरी है। सभी राज्यों एवं प्रमुख फसलों में न्यूनतम समर्थन मूल्य का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित हो।

भारत रत्न डॉ. एम. एस. स्वामीनाथन को भारत में 'हरित क्रांति के जनक' के रूप में याद किया जाता है। कृषि विज्ञान के क्षेत्र में उनके दूरदर्शी एवं क्रांतिकारी योगदान ने भारत को खाद्यान्न संकट से उबारकर विश्व के सबसे बड़े अनाज उत्पादक देशों में शामिल कर दिया। वैज्ञानिक कार्यपद्धति, अभिनव प्रयोग, प्रभावी नीतिगत हस्तक्षेप तथा किसानों के साथ जमीनी स्तर पर जुड़ाव के माध्यम से उन्होंने भारतीय कृषि की दिशा और दशा दोनों बदल दी।

7 अगस्त 1925 को तमिलनाडु में जन्मे डॉ. स्वामीनाथन ने अपना सम्पूर्ण जीवन खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने तथा टिकाऊ (सस्टेनेबल) कृषि को बढ़ावा देने के लिए समर्पित किया। 1960 के दशक में जब भारत बार-बार अकाल, खाद्यान्न संकट और आयात पर निर्भरता जैसी गंभीर चुनौतियों से जूझ रहा था, तब डॉ. स्वामीनाथन ने अपने वैज्ञानिक दृष्टिकोण और नेतृत्व से देश की कृषि व्यवस्था में ऐतिहासिक परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त किया।

डॉ. एम. एस. स्वामीनाथन की कृषि विरासत के प्रमुख स्तंभ

1. उच्च उपज देने वाली किस्में:- डॉ. स्वामीनाथन का सबसे महत्वपूर्ण योगदान भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप उच्च उपज देने वाली गेहूं एवं धान की किस्मों का विकास और प्रसार था। उन्होंने नोबेल पुरस्कार विजेता नॉर्मन बोरलॉग सहित अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिकों के साथ मिलकर मेक्सिको की कम ऊंचाई वाले गेहूं की किस्मों को भारत में लाने और उन्हें भारतीय किस्मों के साथ विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इन नई किस्मों ने भारत की जलवायु एवं कृषि परिस्थितियों में बेहतरीन परिणाम दिए। इस हरित क्रांति की शुरुआत पंजाब और हरियाणा से हुई और शीघ्र ही पूरे देश में फैल गई।

2.आधुनिक कृषि अनुसंधान प्रणाली का निर्माण

डॉ. स्वामीनाथन ने भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) को एक सशक्त एवं गतिशील संस्था के रूप में विकसित किया, जिसने कालांतर में वैज्ञानिकों, किसानों और नीति-निर्माताओं के बीच प्रभावी समन्वय स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उनके नेतृत्व में कृषि अनुसंधान केवल प्रयोगशालाओं तक सीमित न रहकर किसानों की वास्तविक समस्याओं के समाधान पर केंद्रित हो गया।

3.टिकाऊ (सस्टेनेबल) कृषि के प्रबल समर्थक

डॉ. स्वामीनाथन अपने समय से बहुत आगे की सोच रखने वाले वैज्ञानिक थे। उन्होंने रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग तथा भूजल के अंधाधुंध दोहन से होने वाले दुष्प्रभावों के प्रति समय रहते चेताया। उन्होंने 'सदाबहार क्रांति' (एवरग्रीन रिवोल्यूशन) की अवधारणा प्रस्तुत की, जिसका उद्देश्य पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखते हुए कृषि उत्पादन में वृद्धि करना था। डॉ. स्वामीनाथन ने जैविक खेती, जल संरक्षण तथा फसल विविधीकरण को विशेष महत्व दिया।

4.छोटे एवं सीमांत किसानों के अधिकार तथा बीज-संप्रभुता

डॉ. स्वामीनाथन ने यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया कि आधुनिक विज्ञान का लाभ छोटे एवं सीमांत किसानों तक भी पहुंचे। उन्होंने किसानों के बीजों को सुरक्षित रखने, उपयोग करने और साझा करने के अधिकारों का पुरजोर समर्थन किया। उनके प्रयासों से पौधा-किस्म एवं कृषक अधिकार संरक्षण अधिनियम, 2001 अस्तित्व में आया, जिसे अभिनव प्रयोग और परंपरा के संतुलन का वैश्विक उदाहरण माना जाता है।

5.संवेदनशील एवं तथ्य-आधारित कृषि नीति के समर्थक

राष्ट्रीय किसान आयोग के अध्यक्ष के रूप में वर्ष 2006 में प्रस्तुत उनकी रिपोर्ट में अनुशंसा की गई कि फसल का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) उत्पादन लागत से कम-से-कम 50 प्रतिशत अधिक होना चाहिए। किसानों को उचित मूल्य, ग्रामीण आधारभूत संरचना तथा संस्थागत ऋण उपलब्ध कराने का उनका दृष्टिकोण आज भी भारत की कृषि नीति का महत्वपूर्ण आधार बना हुआ है।

भावी दिशा- आज भारत जलवायु परिवर्तन, बाजार की अनिश्चितता तथा जल संकट जैसी नई चुनौतियों का सामना कर रहा है। ऐसे समय में डॉ. स्वामीनाथन की सोच हमें आगे बढ़ने का स्पष्ट मार्ग दिखाती है। इसके लिए आईसीएआर जैसी संस्थाओं का आधुनिकीकरण तथा कृषि विस्तार सेवाओं को गांव-गांव तक पहुंचाया जाना जरूरी है ताकि प्रत्येक किसान नवीनतम अनुसंधान, तकनीक एवं कृषि सलाह से जुड़ सके। इसी प्रकार मोबाइल ऐप, कृत्रिम बुद्धिमत्ता तथा डिजिटल कियोस्क जैसी आधुनिक और नवोन्मेषपूर्ण तकनीकों का व्यापक उपयोग लाभप्रद होगा।

जैविक खेती, सूक्ष्म सिंचाई (ड्रिप एवं स्प्रिंकलर), मृदा परीक्षण तथा जल संरक्षण को प्रोत्साहित करना तथा एवरग्रीन रिवोल्यूशन की अवधारणा को व्यवहार में उतारने के लिए किसानों को जलवायु-अनुकूल कृषि तकनीकों का प्रशिक्षण दिया जाना भी जरूरी है। सभी राज्यों एवं प्रमुख फसलों में न्यूनतम समर्थन मूल्य का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित हो। छोटे, सीमांत, बटाईदार, महिला एवं जनजातीय किसानों के लिए संस्थागत ऋण, फसल बीमा तथा बेहतर बाजार सुविधाओं तक पहुंच आसान बनाई जाए।

उनकी अन्य सिफारिशों जैसे ग्रामीण आधारभूत संरचना में निवेश तथा वर्षा आधारित कृषि के विकास हेतु राष्ट्रीय वर्षा आधारित क्षेत्र प्राधिकरण को लागू करना भी भारत की कृषि व्यवस्था को नई मजबूती प्रदान कर सकता है।

डॉ. एम. एस. स्वामीनाथन का बड़प्पन उनके समग्र दृष्टिकोण में निहित है। उन्होंने आनुवंशिकी को नैतिकता से, उत्पादकता को पर्यावरण संरक्षण से तथा विज्ञान को मानवीय संवेदनाओं से जोड़ा। उनका विश्वास था कि कृषि केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि राष्ट्र की गरिमा, आत्मनिर्भरता और समृद्धि का आधार है। आज जब भारत विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में अग्रसर है, तब डॉ. स्वामीनाथन के विचार और उनकी दूरदर्शिता पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक और प्रेरणादायक हैं।


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