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डोनाल्ड ट्रम्प, विश्व कप और राजनीति का खेल

अमेरिका-ईरान तनातनी की जड़ में तेल संसाधनों पर कब्जा और मिडिल ईस्ट पर प्रभुत्व कायम रखने के साम्राज्यवादी इरादे भी काम करते हैं।

डोनाल्ड ट्रम्प, विश्व कप और राजनीति का खेल
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  • राजेश पांडेय

अमेरिका-ईरान तनातनी की जड़ में तेल संसाधनों पर कब्जा और मिडिल ईस्ट पर प्रभुत्व कायम रखने के साम्राज्यवादी इरादे भी काम करते हैं। 1900 के दशक से एंग्लो-ईरानियन तेल कंपनी के माध्यम से ब्रिटेन ने ईरान के तेल क्षेत्रों पर नियंत्रण कायम रखा था। 1953 में मोहम्मद मोसादेह के प्रधानमंत्री बनने के बाद ईरान में ब्रिटिश नियंत्रण का विरोध तेज हो गया।

मेरिका और ईरान के बीच युद्धविराम हो चुका है लेकिन विश्व कप फुटबॉल पर उसकी लंबी और गहरी छाया साफ दिखाई पड़ती है। मौजूदा विश्व कप कई मायनों में अलग है। यह पहला विश्व कप है जिसकी मेजबानी तीन देश-अमेरिका, कनाडा और मेक्सिको कर रहे हैं। 48 टीमें 104 मैचों में हिस्सा ले रही हैं। कनाडा, मेक्सिको के हिस्से में 13-13 मैच आए हैं और बाकी 78 मैचों का मेजबान अमेरिका है। टूर्नामेंट के शुरुआती दौर में अर्जेंटीना के लियोनेल मेसी, फ्रांस के किलियन एमबापे, नार्वे के एर्लिंग हालैंड जैसे चमकते सितारों ने अपना दबदबा दिखाया है। लेकिन दूसरी तरफ अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प मैदान से बाहर अलग तरीके से अपनी ताकत दिखा रहे हैं।

ट्रम्प ने ईरान से आए अतिथियों के लिए शिष्टाचार और कूटनीति के तौर-तरीकों को ताक पर रख दिया है। वे टूर्नामेंट के दौरान भी अपने इमिग्रेशन एजेंडा को जोर-शोर से लागू कर रहे हैं। राष्ट्रपति यह सब उस देश में कर रहे हैं जहां पूरी दुनिया से आकर लोग बसे हैं। शायद अमेरिका ही ऐसा एकमात्र देश हैं जहां इतनी ज्यादा नस्लों, धर्मों और संस्कृतियों के लोग मिलेंगे। वहां किसी कोने में यूरोप तो कहीं एशिया तो कहीं अफ्रीका महाद्वीप सहित दुनिया के सभी देशों के लोग मिल जाएंगे। अमेरिका को विश्व की सबसे बड़ी ताकत बनाने में उसकी बहुलता की निर्णायक भूमिका है। ट्रम्प इस पर पानी फेरने की कोशिश में जुटे हैं।

11 जून को पहले मैच की व्हिसल बजने से पहले ही विवादों की शुरुआत हो गई थी। कई टीमों के खिलाड़ियों और दर्शकों को कस्टम्स, इमिग्रेशन (आईसीई) की कड़ी सुरक्षा जांच का सामना करना पड़ रहा है। अंतरराष्ट्रीय फुटबॉल फेडरेशन (फीफा) द्वारा चुने गए सोमालिया के रैफरी उमर ओर्टन को मियामी कस्टम्स ने रोका और वापस भेज दिया। 2025 में ओर्टन को अफ्रीका के सर्वश्रेष्ठ रैफरी का दर्जा मिला है। अमेरिकी अधिकारियों ने ओर्टन को प्रवेश न देने का अस्पष्ट कारण बताया कि अवांछनीय लोगों को प्रवेश की अनुमति नहीं है। इस अपमान की अफ्रीका में तीखी प्रतिक्रिया हुई है। इसके अलावा सेनेगल, उजबेकिस्तान के खिलाड़यों को अकारण जांच से गुजरना पड़ा है।

सबसे अधिक परेशानियां ईरान की टीम के सामने आई थी। अमेरिका से उसका टकराव कदम-कदम पर नजर आया है। इसकी शुरुआत 2025 में हो गई थी। ईरानी फुटबॉल फेडरेशन के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों को वीजा नहीं देने के बाद दिसंबर में ड्रा की घोषणा होने पर ईरान ने टूर्नामेंट के बहिष्कार की घोषणा कर दी थी। बाद में ईरान ने टूर्नामेंट में भाग लेने का फैसला लिया। उस वक्त अमेरिका-ईरान युद्ध शुरू नहीं हुआ था। वैसे, दोनों देशों के बीच दुश्मनी का लंबा इतिहास है। कई कारणों से ईरान में अमेरिका विरोधी भावनाओं का जोर रहा है।

अमेरिका-ईरान तनातनी की जड़ में तेल संसाधनों पर कब्जा और मिडिल ईस्ट पर प्रभुत्व कायम रखने के साम्राज्यवादी इरादे भी काम करते हैं। 1900 के दशक से एंग्लो-ईरानियन तेल कंपनी के माध्यम से ब्रिटेन ने ईरान के तेल क्षेत्रों पर नियंत्रण कायम रखा था। 1953 में मोहम्मद मोसादेह के प्रधानमंत्री बनने के बाद ईरान में ब्रिटिश नियंत्रण का विरोध तेज हो गया। मोसादेह ने तेल क्षेत्रों का राष्ट्रीयकरण कर दिया। इससे मिडिल ईस्ट के तेल पर बहुत ज्यादा निर्भर अमेरिका और ब्रिटेन को जबर्दस्त धक्का लगा। 1957 में अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीईए ने मोसादेह का तख्ता पलट दिया। सीआईए की मदद से शाह रजा पहलवी ईरान के शाह बन गए। राजशाही के खिलाफ 1978-79 में भीषण क्रांति की शुरुआत हो गई। लाखों लोग शाह के खिलाफ सड़कों पर उतर आए। शाह को ईरान से भागकर अमेरिका में शरण लेना पड़ी थी। 1979 में धार्मिक नेता अयातुल्ला खोमैनी की अगुआई में नई सरकार बनी।

कई मुद्दों पर मतभेदों के बावजूद दोनों देशों के बीच संवाद का सिलसिला चलता रहा है। इस बीच ईरान ने परमाणु तकनीक हासिल कर ली। वह एटम बम बनाने की स्थिति में पहुंच गया है। लंबी बातचीत के बाद 2013 में पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा के समय ईरान के परमाणु कार्यक्रम की गति धीमी करने के वास्ते एक समझौते पर दस्तखत हुए। हालांकि, ट्रम्प ने 2018 में अपने पहले कार्यकाल में करार को एकतरफा तौर पर रद्द कर दिया। राष्ट्रपति जार्ज बुश ने तो ईरान को आतंकवाद की धुरी घोषित कर रखा था। ट्रम्प के शासनकाल में दोनों देशों के बीच दुश्मनी बढ़ी है। 2025 में ओमान में अमेरिका-ईरान शांति वार्ता के बीच इजरायल और अमेरिका ने ईरान पर हमला बोल दिया।

इस तनाव का खामियाजा ईरान की फुटबॉल टीम को अमेरिका में भुगतना पड़ रहा है। अमेरिका-ईरान के बीच शांति समझौता होने के बाद उम्मीद बढ़ी थी कि ईरानी टीम का रास्ता आसान होगा। लेकिन, ऐसा नहीं हो सका है। न्यूजीलैंड से 2-2 की बराबरी के बाद ईरानी टीम को उनके कार्यक्रम में बदलाव की सूचना मिली। उन्हें लॉस एंजिल्स में रात गुजारने की बजाय अमेरिका की सीमा के पास मेक्सिको के तिजुआना स्थित अपने ट्रेनिंग कैम्प में लौटने के लिए कहा गया। मैच रात 8 बजे खत्म हुआ था। मेक्सिको के लिए उनकी फ्लाइट रात 11 बजे थी। टीम के हेड कोच आमिर गेनलेनोएल की गुस्से से भरी प्रतिक्रिया आई कि समूचे वर्ल्ड कप में हमारी टीम सबसे ज्यादा शोषित और पीड़ित रही है। विश्व कप से बाहर होने के बाद ईरानी टीम के मैनेजमेंट ने उनके साथ हुए व्यवहार पर निराशा जताई है।

यों भी टूर्नामेंट में ईरान की हिस्सेदारी को लेकर देश में विभाजन की स्थिति है। अमेरिका से टकराव को देखते हुए ईरान में बहुत लोग नहीं चाहते थे कि टीम विश्व कप में भाग ले। इसकी तस्वीर ईरान के मैचों में देखने मिली है। लॉस एंजिल्स में लगभग एक लाख ईरानी रहते हैं। वहां मैच के दौरान कुछ ईरानी दर्शक टीम के समर्थन में बैनर लहरा रहे थे तो कुछ लोगों ने ईरान में लोकतंत्र और मानव अधिकारों की मांग करने वाले सैकड़ों लोगों की हत्याओं पर वर्तमान सरकार का विरोध किया है। ऐसे लोग टीम को दमनकारी शासन का प्रतिनिधि मानते हैं।

बहरहाल, टूर्नामेंट पर ट्रम्प का साया काफी पहले से नजर आ रहा है। इसकी शुरुआत फीफा के प्रेसिडेंट गिआनी इनफेंटिनो ने ट्रम्प की कई बार तारीफ के साथ की है। इनफेंटिनो के रुख की जमकर आलोचना हुई है। फीफा प्रमुख ने 5 दिसंबर 2025 को डोनाल्ड ट्रम्प को फीफा शांति पुरस्कार से सम्मानित कर दिया। फीफा ने इससे पहले कभी किसी को ऐसा अवॉर्ड नहीं दिया था बल्कि ऐसे किसी पुरस्कार का तो अस्तित्व ही नहीं था। फीफा कार्यकारिणी के अधिकतर सदस्यों तक को पुरस्कार की भनक नहीं थी। नार्वे सहित कई देशों के फुटबॉल संघों ने पुरस्कार के लिए इनफेंटिनो पर कड़े प्रहार किए थे।

आप्रवासियों के खिलाफ आईसीई के सख्त तेवर टूर्नामेंट में भी सामने आए हैं। जिन शहरों में मैच हो रहे हैं,वहां आईसीई के एजेंट विदेशियों पर नजर रखते हैं। यह भी हुआ है कि दूसरे देशों से विश्व कप देखने के लिए आने वाले लोगों ने सावधानी के बतौर अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर ऐसे पोस्ट बंद कर दिए थे जिन्हें ट्रम्प सरकार ने आपत्तिजनक घोषित कर रखा है। ट्रम्प ने इमिग्रांट्स के खिलाफ अभियान में उनकी सोशल मीडिया पोस्ट को भी हथियार बनाया है। बहरहाल, राजनीति के तमाम दांवपेंचों के बावजूद फुटबॉल का रोमांच सर्वोच्च शिखर पर है। पहले 44 मैचों को लगभग 21 लाख लोग देख चुके थे। ज्यादातर स्टेडियम अपनी क्षमता के 99.6 प्रतिशत तक भरे रहते हैं।

विश्व कप में हिस्सा ले रही टीमों के खिलाड़ियों पर नजर डालें तो लगता है कि वे यूरोप और अमेरिका के इमिग्रांट विरोधी एजेंडा का उपहास उड़ा रही हैं। एक तरफ राजनेता इमिग्रेशन के खिलाफ कड़े कानून बना रहे हैं तो विश्व कप देशों की सीमाओं, रंगभेद, नस्लभेद को ढहा रहा है। जर्मनी, स्पेन, फ्रांस, इंग्लैंड, बेल्जियम, इटली, पुर्तगाल की टीमों में अफ्रीकी मूल के कई खिलाड़ी हैं। फ्रांस की टीम के 26 में से 22 खिलाड़ी अफ्रीकी नस्ल के हैं। फ्रांस के किलियन एमबापे कैमरून-अल्जीरियाई मूल के हैं। जादुई खेल के लिए मशहूर स्पेन के लेमिने यमाल अफ्रीकी हैं। इंग्लैंड के 26 में से आठ खिलाड़ी कैरीबियन और 10 अफ्रीकी हैं। इंग्लैंड, फ्रांस में धुर दक्षिणपंथी राजनेता कहने लगे हैं कि इंग्लैंड की टीम पूरी तरह इंग्लिश और फ्रांस की टीम विशुद्ध रूप से फ्रेंच नहीं रहीं।

स्टेडियमों में उमड़ रही दर्शकों की भीड़ अमेरिका का दूसरा चेहरा पेश करती है। यह ट्रम्प के अतिवाद और भेदभाव की राजनीति से परे है। वह रंग और नस्ल के आधार पर अंतर नहीं करती है। वह दुनिया के सामने मिसाल पेश करती है कि खुलेपन और आजादी के बूते मानव अनंत आकाश में उड़ान भरने की क्षमता रखता है। उसमें अमेरिका की मिली-जुली संस्कृति और बांहें फैलाकर हर किसी का स्वागत करने की उदारता रेखांकित होती है। दर्शक दिल खोलकर सभी देशों के खिलाड़यों के करतबों की प्रशंसा कर रहे हैं। लॉस एंजिल्स में स्थानीय दर्शकों का जोरदार समर्थन मिलने के बाद ईरान की टीम अपने लॉकर रूम में एक संदेश छोड़कर आई जिसमें लिखा है, 'लॉस एंजिल्स मेहमाननवाजी के लिए आपका शुक्रिया'।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)


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