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आदिवासी 'जेन जी' की नाराजगी को अनदेखा न करें

जुलाई से देश में दो बड़े विरोध-प्रदर्शन हुए हैं। पहला, 'जेन जी' के नेतृत्व में छात्रों का आंदोलन था जो जंतर-मंतर पर केंद्रित था

आदिवासी जेन जी की नाराजगी को अनदेखा न करें
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बिरसा मुंडा का 'उलगुलान' महज़ नारा नहीं था बल्कि एक राजनीतिक आंदोलन था- 'अबूआ राज सेतेर जाना, महारानी राज टुंडू जाना'- यानी महारानी का शासन खत्म हो और हमारा अपना शासन स्थापित हो। इसने ज़मींदारी व्यवस्था, 'दिकुओं' (बाहरी लोग, साहूकार और ज़मींदार),'बेठ-बेगारी' (ज़बरदस्ती काम कराने की प्रथा) और उन औपनिवेशिक वन कानूनों को चुनौती दी जिन्होंने आदिवासियों को उनके जल, जंगल और जमीन से अलग कर दिया था।

जुलाई से देश में दो बड़े विरोध-प्रदर्शन हुए हैं। पहला, 'जेन जी' के नेतृत्व में छात्रों का आंदोलन था जो जंतर-मंतर पर केंद्रित था। इसके दबाव में जुलाई में ही धर्मेन्द्र प्रधान को केंद्रीय शिक्षा मंत्री के पद से इस्तीफा देना पड़ा था। दूसरा आंदोलन मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की मांग को लेकर जारी है। इन दो राष्ट्रीय घटनाओं के बीच, महाराष्ट्र में आदिवासी 'जेन जी' का भी एक आंदोलन हुआ जिस पर बहुत कम लोगों का ध्यान गया। जहां देशव्यापी विरोध-प्रदर्शनों का निशाना लोकतांत्रिक संस्थाओं पर सरकार के कब्ज़ा का करने की कोशिशों का विरोध था, वहीं आदिवासी छात्रों के नेतृत्व वाले इन विरोध-प्रदर्शनों ने यह उजागर किया कि लोकतंत्र कई स्तरों पर किस तरह विफल हो रहा है। चाहे वे मुद्दे दिखाई देने वाले हों, छिपे हुए या स्थानीय हों अथवा राष्ट्रीय। लोकतंत्र की यह विफलता बड़े समूहों से लेकर छोटे समुदायों तक, सभी पर असर डाल रही है। इसकी शुरुआत अगस्त में पुणे के पास एक छोटे स्तर पर हुई जो बाद में 17 दिनों की भूख हड़ताल में बदल गई और अंतत: पूरे राज्य में फैल गई। इसका समापन 6 अक्टूबर को हुआ जब आदिवासी छात्रों ने नासिक से मुंबई तक लगभग 190 किलोमीटर की पैदल यात्रा की। इससे पहले कि वे राजभवन में राज्यपाल से मिल पाते और अपनी शिकायतों का ज्ञापन सौंपते, पुलिस ने उन्हें जबर्दस्ती निजी बसों में बिठाकर शहर से बाहर भेज दिया।

महाराष्ट्र के आदिवासी 'जेन जी' ने अपनी इस नाराजगी को 'उलगुलान' (यानी 'बड़ी हलचल' या 'विद्रोह') नाम दिया है। यह शब्द मुंडा जनजाति की भाषा मुंडारी से आया है। 1899-1900 में बिरसा मुंडा ने यह आंदोलन किया था। 9 जून 1900 को केवल 25 वर्ष की उम्र में उन्होंने रांची जेल में अंतिम सांस ली थी। ब्रिटिश उपनिवेशवादियों और सत्ता के स्थानीय दलालों द्वारा होते शोषण के खिलाफ़ उनके संघर्ष ने इस शब्द को ऐतिहासिक महत्व दिया। बिरसा मुंडा का 'उलगुलान' महज़ नारा नहीं था बल्कि एक राजनीतिक आंदोलन था- 'अबूआ राज सेतेर जाना, महारानी राज टुंडू जाना'- यानी महारानी का शासन खत्म हो और हमारा अपना शासन स्थापित हो। इसने ज़मींदारी व्यवस्था, 'दिकुओं' (बाहरी लोग, साहूकार और ज़मींदार),'बेठ-बेगारी' (ज़बरदस्ती काम कराने की प्रथा) और उन औपनिवेशिक वन कानूनों को चुनौती दी जिन्होंने आदिवासियों को उनके जल, जंगल और जमीन से अलग कर दिया था। अंग्रेजों ने डोम्बारी पहाड़ी पर बिरसा के 'उलगुलान' (विद्रोह) को कुचल तो दिया लेकिन उन्हें झुकना पड़ा। बिरसा की मृत्यु के आठ साल बाद उन्होंने 'छोटा नागपुर काश्तकारी अधिनियम, 1908' लागू किया। इस कानून के तहत आदिवासियों की जमीन को गैर-आदिवासियों को हस्तांतरित करने पर रोक लगा दी गई और 'मुंडारी खुंटकट्टीदार' अधिकारों को मान्यता दी गई- अर्थात मूल बसने वालों का ज़मीन पर सामूहिक स्वामित्व।

2026 का 'महाराष्ट्र उलगुलान' (आंदोलन) बिरसा मुंडा की लड़ाई के सामने बहुत छोटा लगता है। इसमें किसी राज्य की मांग नहीं हो रही, बस जीवित रहने का एक मौका मांगा जा रहा है। 9 अगस्त की रात, गढ़चिरौली के धनोरा तालुका के जप्तलाई गांव में एक छात्रावास के फर्श पर सो रही छह लड़कियों को भारत के चार सबसे जहरीले सांपों में से एक समझे जाने वाले 'कॉमन क्रैत' ने काट लिया। उस रात क्रैत दंश का शिकार बनी छह लड़कियों में से तीन की मौत हो गई। वे ऐसे कमरे में थीं जहां 79 लड़कियां रहती हैं। यह हॉस्टल पिछले 25 सालों से इसी तरह चल रहा है। इन मौतों ने यह उजागर कर दिया कि आदिवासी बच्चों को एक बेहतर भविष्य देने के लिए बनाए गए इन आवासीय स्कूलों (आश्रम शालाओं) में न तो सांप-बिच्छुओं से बचने के लिए खाट हैं, न ही कीड़े-मकोड़ों से बचाव के लिए मच्छरदानियां। आपात स्थिति में बच्चों को नज़दीकी अस्पताल तक ले जाने के लिए कोई परिवहन सुविधा भी नहीं है। गढ़चिरौली कोई अपवाद नहीं है। पिछले दो वर्षों में महाराष्ट्र के 1,013 आश्रम स्कूलों में 584 छात्रों की मौत हो चुकी है। इनमें से 384 मौतें सरकारी स्कूलों में और 200 सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में हुईं। राज्य के आदिवासी विकास विभाग के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, इन मौतों के कारणों में सांप का काटना, सिकल-सेल व अन्य बीमारियां, दुर्घटनाएं और आत्महत्याएं शामिल हैं। यानी, औसतन हर दिन एक छात्र की मौत हो रही है। डिंडोरी लोकसभा क्षेत्र के सांसद भास्कर भगारे ने इन 584 आदिवासी छात्रों की मौत की केंद्रीय जांच की मांग की है। भारत में मध्य प्रदेश के बाद आदिवासियों की सबसे अधिक आबादी महाराष्ट्र में है। राज्य की कुल जनसंख्या में 1 करोड़ से अधिक (नौ प्रतिशत से ज्यादा) आदिवासी होने के बावजूद वास्तव में उनकी आवाज को कोई सुनता नहीं है।

पिछले बारह वर्षों से हमारे पास जनजातीय स्थितियों पर एक डायग्नोस्टिक रिपोर्ट मौजूद है। 2013 में प्रधानमंत्री कार्यालय ने जाने-माने समाजशास्त्री और जनजातीय अध्ययन के विद्वान प्रो. वर्जिनियस ख़ाखा की अध्यक्षता में एक समिति गठित की जिसका काम अनुसूचित जनजातियों की सामाजिक-आर्थिक, स्वास्थ्य और शैक्षिक स्थिति की जांच करना था। इस समिति ने मई 2014 में अपनी रिपोर्ट सौंपते हुए वे ही बातें लिखीं जिन्हें हर जनजातीय छात्र जानता है- ऐसे स्कूल जहां पानी, बिजली, शौचालय और चारदीवारी जैसी सुविधाएं नहीं हैं; बाहर से आए ऐसे शिक्षक हैं जो बच्चों की भाषा नहीं समझते; एक ऐसा पाठ्यक्रम है जो जनजातीय इतिहास, कला, संगीत और नृत्य को मिटा देता है,जहां न तो स्वास्थ्य ऑडिट होता है और न ही सुरक्षा का कोई प्रोटोकॉल। समिति ने उन कदमों की सिफारिश की जिन्हें तुरंत उठाया जाना चाहिए था- शुरुआती वर्षों में बहुभाषी शिक्षा, स्थानीय शिक्षकों और स्वास्थ्य कर्मियों की भर्ती, कक्षा की पढ़ाई को जनजातीय संस्कृति, लोककथाओं, इतिहास और ज्ञान प्रणालियों के साथ जोड़ना, 'जनजातीय स्वास्थ्य सभाओं' का गठन और हर आवासीय स्कूल के लिए सुरक्षा तथा बुनियादी ढांचे का एक ऐसा ऑडिट जिसे कानूनी रूप से लागू किया जा सके।

समिति ने सिफारिश की कि स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय को अनुसूचित क्षेत्रों में प्राथमिक और माध्यमिक स्वास्थ्य सेवाओं का ढांचा फिर से तैयार करना चाहिए। इसके लिए एक विशेष स्वास्थ्य योजना हो जो ऊपर से थोपे गए किसी राष्ट्रीय स्वास्थ्य कार्यक्रम की तरह न होकर उसमें स्थानीय लोगों की भागीदारी सुनिश्चित हो। समिति की मुख्य चेतावनी और भी सख्त थी- सुरक्षात्मक कानूनों, जैसे पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम, 1996 [पेसा]), अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वनवासी (वन अधिकार मान्यता) अधिनियम, 2006 (फेरा) और ग्राम सभा की 'पूर्व सूचित सहमति' के सिद्धांत के साथ लगातार छेड़छाड़ की जा रही है और उन्हें कमजोर किया जा रहा है। पंचायत अधिनियम (1996) और वन अधिकार अधिनियम दो ऐसे महत्वपूर्ण कानून हैं जो जमीन, जंगलों और स्थानीय प्रशासन पर नियंत्रण का विकेंद्रीकरण करके आदिवासियों और वनवासियों को सशक्त बनाते हैं।

यह बगावत गढ़चिरौली में दिखती है, नासिक में दिखती है और राज्य के 13 जिलों में फैले आदिवासी क्षेत्रों में भी साफ़ नजर आती है। 7 अक्टूबर को राज्य सरकार ने वार्षिक हॉस्टल और रहने-सहने के भत्ते बढ़ाने की जो घोषणा की है वह उनकी दयनीय स्थिति के सामने कुछ भी नहीं है। वहां गंदगी, घटिया बुनियादी ढांचा, गंभीर कुपोषण और असुरक्षित माहौल है। सरकार द्वारा किए गए छोटे-मोटे बदलाव या भत्ते देने से समस्या हल नहीं होने वाली है। वहां पीने का साफ पानी नहीं है, दीवारें गिर रही हैं और फर्श पर सांप-बिच्छू रेंगते रहते हैं। बिरसा के 'उलगुलान' (विद्रोह) ने अंग्रेजों को छोटा नागपुर के भूमि कानूनों को बदलने पर मजबूर कर दिया था। महाराष्ट्र का 'उलगुलान' एक बहुत छोटा सा सवाल पूछ रहा है- क्या हमारी जान की कोई कीमत है? और अब तक इसका जवाब है- नहीं।

(लेखिका 'द बिलियन प्रेस' की मैनेजिंग एडिटर हैं। सिंडिकेट : द बिलियन प्रेस)


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