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क्या प्रतिभा का सही आकलन कर पाती हैं नीट जैसी परीक्षाएं?

लखनऊ के एक कोचिंग सेंटर में लगी आग में कई विद्यार्थियों की दुखद मृत्यु हो गई और कई घायल हो गए। नीट पेपर लीक के बाद भी देश के कई हिस्सों से लगातार विद्यार्थियों की आत्महत्याओं की खबरें सामने आई हैं।

क्या प्रतिभा का सही आकलन कर पाती हैं नीट जैसी परीक्षाएं?
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  • डॉ. अरुण मित्रा

मौजूदा परीक्षा प्रणाली विद्यार्थियों की वास्तविक प्रतिभा का सही आकलन नहीं कर सकती। ऐसे में यह प्रश्न उठता है कि विद्यार्थियों के मूल्यांकन की अधिक न्यायसंगत व्यवस्था क्या हो सकती है? पहले पेशेवर महाविद्यालयों में प्रवेश मुख्यत: बारहवीं कक्षा के अंकों के आधार पर होता था। लेकिन अब परिस्थितियां बदल चुकी हैं। अंकों पर भी सिफारिशों और अन्य दबावों का प्रभाव पड़ता है।

लखनऊ के एक कोचिंग सेंटर में लगी आग में कई विद्यार्थियों की दुखद मृत्यु हो गई और कई घायल हो गए। नीट पेपर लीक के बाद भी देश के कई हिस्सों से लगातार विद्यार्थियों की आत्महत्याओं की खबरें सामने आई हैं। देश के बड़े कोचिंग सेंटर कोटा से भी वर्ष दर वर्ष विद्यार्थियों की आत्महत्याओं की घटनाएं हो रही हैं। ये अत्यंत दुखद और चिंताजनक घटनाएं हैं, जिन पर समाज और सरकारों- दोनों को गंभीरता से विचार करना चाहिए।

इसके साथ ही पिछले कई वर्षों में हम यह भी देख रहे हैं कि विभिन्न परीक्षाओं के प्रश्नपत्र परीक्षा से पहले ही लीक हो जाते हैं। ऐसे पेपर लीक अक्सर धनबल और मिलीभगत के जरिए संभव होते हैं। जब भी ऐसी घटनाएं सामने आती हैं, विद्यार्थियों को दोबारा परीक्षा देनी पड़ती है, जिससे उनके भीतर अनिश्चितता और तनाव बढ़ जाता है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार पिछले दस वर्षों में लगभग 90 परीक्षाओं के प्रश्नपत्र लीक हो चुके हैं।

विद्यार्थी कड़ी मेहनत करते हैं और उच्च शिक्षा संस्थानों में प्रवेश पाने की उम्मीद से परीक्षाओं में बैठते हैं। इस पूरी प्रक्रिया में परिवार भी बराबर का भागीदार होता है, क्योंकि माता-पिता भी चाहते हैं कि उनके बच्चे बेहतर उच्च शिक्षा प्राप्त करें। अनेक विद्यार्थी एक ही परीक्षा तीन-चार बार तक देते हैं, इस उम्मीद में कि किसी प्रयास में बेहतर अंक प्राप्त कर उनके मनचाहे संस्थान में प्रवेश मिल जाएगा।

जब प्रश्नपत्र लीक होते हैं तो विद्यार्थियों में गुस्सा, निराशा और असहायता की भावना पैदा होती है। यह समझना कठिन नहीं है कि किसी विद्यार्थी के एक परीक्षा में अच्छा प्रदर्शन करने की कोई गारंटी नहीं होती कि वह दोबारा परीक्षा में भी वैसा ही प्रदर्शन कर सकेगा। कम उम्र में कई विद्यार्थी इस मानसिक दबाव को सहन नहीं कर पाते और कुछ आत्महत्या जैसा कदम उठा लेते हैं, जिससे परिवार और समाज दोनों को गहरा आघात पहुंचता है।

वर्तमान में कई स्कूलों में दसवीं कक्षा के बाद की पढ़ाई लगभग औपचारिकता बनकर रह गई है। विद्यार्थियों को कोचिंग संस्थानों में भेज दिया जाता है, जहां उन्हें केवल प्रवेश परीक्षाओं की तैयारी कराई जाती है। कई मामलों में स्कूल स्वयं विद्यार्थियों को कोचिंग में जाने के लिए प्रेरित करते हैं और अपनी शैक्षणिक जिम्मेदारियों से लगभग हाथ खींच लेते हैं। कुछ स्कूल तो विद्यार्थियों की उपस्थिति भी औपचारिक रूप से दर्ज कर देते हैं।

स्कूली शिक्षा में शिक्षकों के साथ संवाद, चर्चा और विद्यार्थियों के बौद्धिक दायरे का विस्तार शामिल होता है, जो उनके समग्र विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसके विपरीत कोचिंग संस्थानों का मुख्य उद्देश्य प्रवेश परीक्षा के प्रश्न हल कराना और याद रखने की तकनीक सिखाना होता है। विद्यार्थियों को यह विश्वास दिलाया जाता है कि जीवन का एकमात्र लक्ष्य किसी भी तरह प्रवेश प्राप्त करना है, जबकि शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य अच्छे नागरिक, ज्ञानवान व्यक्ति, व्यापक दृष्टिकोण वाले विचारक और सामाजिक सरोकारों के प्रति संवेदनशील इंसान तैयार करना है।

कोचिंग संस्थानों पर भारी खर्च आता है, जिसे आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग वहन नहीं कर पाता। परिणामस्वरूप उनके बच्चे प्रतिस्पर्धा में पीछे छूट जाते हैं। यह भी अक्सर सुनने में आता है कि कई कोचिंग संस्थान स्वयं ऐसे विद्यार्थियों का चयन करते हैं जिनसे बेहतर परिणाम की उम्मीद होती है और फिर उन्हें विशेष सुविधा प्रदान करते हैं। इससे कम उम्र में ही भेदभाव की भावना विकसित होने लगती है।

मौजूदा परीक्षा प्रणाली विद्यार्थियों की वास्तविक प्रतिभा का सही आकलन नहीं कर सकती। ऐसे में यह प्रश्न उठता है कि विद्यार्थियों के मूल्यांकन की अधिक न्यायसंगत व्यवस्था क्या हो सकती है? पहले पेशेवर महाविद्यालयों में प्रवेश मुख्यत: बारहवीं कक्षा के अंकों के आधार पर होता था। लेकिन अब परिस्थितियां बदल चुकी हैं। अंकों पर भी सिफारिशों और अन्य दबावों का प्रभाव पड़ता है। यहां तक कि प्रायोगिक परीक्षाएं भी ऐसे प्रभावों से पूरी तरह मुक्त नहीं हैं। नई शिक्षा नीति लागू होने के बाद से शिक्षा व्यवस्था में संपन्न वर्गों के हितों को अधिक महत्व दिए जाने और असमानताओं को बढ़ावा मिलने की आशंकाएं भी लगातार व्यक्त की जाती रही हैं। इसलिए इस विषय पर शिक्षा विशेषज्ञों से व्यापक परामर्श लेना चाहिए कि विद्यार्थियों के मूल्यांकन का सबसे उपयुक्त तरीका क्या हो सकता है।

जहां तक नीट के प्रश्नपत्र लीक होने का सवाल है, परीक्षा आयोजित करने वाली एजेंसियों की जिम्मेदारी है कि वे परीक्षा की पूर्ण सुरक्षा और गोपनीयता सुनिश्चित करें। 21 जून को परीक्षा केंद्रों पर अर्धसैनिक बलों और पुलिस की भारी तैनाती ने विद्यार्थियों पर अनावश्यक दबाव पैदा किया। छात्राओं के जूड़े तक खुलवाकर तलाशी ली गई, मानो पहले हुए प्रश्नपत्र लीक इसी माध्यम से हुए हों। इस प्रकार की कार्रवाई युवा छात्राओं की गरिमा को ठेस पहुंचाती है। बड़ी संख्या में परीक्षा केंद्र अंतिम समय में बदल दिए गए, जिससे अनेक विद्यार्थी परीक्षा में शामिल ही नहीं हो सके। ऐसी घटनाएं मानवीय मूल्यों की उपेक्षा को दर्शाती हैं।

प्रश्नपत्रों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाने के लिए भारतीय सेना और भारतीय वायु सेना की सहायता ली गई। यह सरकार की कमजोरी को दर्शाता है। सशस्त्र बलों का दायित्व देश की सीमाओं की रक्षा करना है, परीक्षा प्रश्नपत्रों का वितरण करना नहीं।

इसी संदर्भ में युवाओं और विद्यार्थियों ने 'कॉकरोच जनता पार्टी' के बैनर तले अपनी आवाज बुलंद की। एआईएसएफ, एनएसयूआई और अन्य छात्र संगठनों के नेतृत्व में विद्यार्थियों ने शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग को लेकर प्रदर्शन किए। लेकिन देश के प्रधानमंत्री ने इस पूरे मुद्दे पर एक शब्द तक नहीं कहा। इसके विपरीत, जब विद्यार्थी परेशान थे और कुछ आत्महत्या तक कर चुके थे, उस समय प्रधानमंत्री 21 जून को योग करते हुए तस्वीरें खिंचवाने और विश्वभर में योग के प्रचार-प्रसार में व्यस्त दिखाई दिए। विद्यार्थियों की पीड़ा के प्रति यह रवैया असंवेदनशीलता का परिचायक प्रतीत होता है।


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