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पार्टी निकली या कुर्सी?

राजनीति में आजकल विचारधारा उतनी स्थायी नहीं रही जितनी मोबाइल की स्क्रीन पर लगाई गई वॉलपेपर

पार्टी निकली या कुर्सी?
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  • डॉ रामानुज पाठक

लोकतंत्र बड़ा विचित्र जीव है। यहाँ आम तौर पर लोग पार्टी से निकाले जाते हैं, लेकिन कभी-कभी ऐसा भी समय आता है जब कुछ लोग मिलकर पार्टी को ही बाहर का रास्ता दिखा देते हैं। तब समझ में नहीं आता कि निष्कासन हुआ है, विस्थापन हुआ है या सत्ता के कमरे में फर्नीचर की पुनर्सज्जा हुई है।

राजनीति में आजकल विचारधारा उतनी स्थायी नहीं रही जितनी मोबाइल की स्क्रीन पर लगाई गई वॉलपेपर। सुबह एक विचार, दोपहर में दूसरा और शाम तक तीसरा। जनता बेचारे पुराने नक्शे लेकर चलती रहती है, जबकि राजनीतिक सड़कें रातों-रात नई दिशा पकड़ लेती हैं।

पहले दल व्यक्ति बनाते थे। अब कई बार व्यक्ति ही दल बना लेते हैं। कुछ समय बाद वही व्यक्ति इतने बड़े हो जाते हैं कि दल उनके आसपास घूमने लगता है। फिर एक दिन ऐसा आता है कि कमरे में बैठे कुछ लोग तय करते हैं कि अब दल कहाँ रहेगा और कौन बाहर जाएगा। दर्शक दीर्घा में बैठी जनता यह दृश्य देखकर सोचती है कि यह राजनीतिक दल की बैठक है या किसी पारिवारिक संपत्ति का बँटवारा।

सबसे रोचक स्थिति तब होती है जब हर पक्ष लोकतंत्र बचाने का दावा करता है। एक पक्ष कहता है— 'हमने पार्टी बचाई।' दूसरा कहता है— 'हमने असली पार्टी बचाई।' तीसरा कहता है— 'हमने पार्टी की आत्मा बचाई।' और जनता पूछती रह जाती है— 'भाइयों, कोई यह भी बताए कि हमारे मुद्दे कहाँ गए? '

आज राजनीति में पार्टी का अर्थ भी बड़ा लचीला हो गया है। कभी झंडा पार्टी होता है, कभी चुनाव चिह्न, कभी संगठन, कभी नेता और कभी विधायकों की संख्या। जिस तरफ बहुमत चला जाए, वहीं 'मूल' होने का प्रमाणपत्र भी पहुँच जाता है। लगता है जैसे राजनीति में न्यूटन का नहीं, 'नंबरों का गुरुत्वाकर्षण नियम' लागू होता है—जिधर संख्या अधिक, उधर सत्य अधिक।

जनता भी अब अनुभवी हो चुकी है। उसे पता है कि राजनीति में 'त्याग' शब्द का अर्थ अक्सर नई कुर्सी प्राप्त करना होता है और 'सिद्धांत' शब्द का अर्थ परिस्थितियों के अनुसार बदलने वाली सुविधा। जनता मुस्कुराकर सब देखती है, क्योंकि उसे मालूम है कि चुनाव आने पर वही नेता फिर उसके दरवाजे पर विनम्रता की मूर्ति बनकर खड़े होंगे।

विडंबना यह है कि लोकतंत्र में सबसे स्थायी चीज़ जनता होनी चाहिए, लेकिन सबसे अधिक उपेक्षित वही रहती है। नेता बदलते हैं, दल बदलते हैं, गठबंधन बदलते हैं, बयान बदलते हैं, आरोप बदलते हैं; केवल जनता की समस्याएँ हैं जो अद्भुत निष्ठा के साथ वहीं की वहीं बनी रहती हैं।

दरअसल राजनीति का यह खेल हमें एक गहरा दर्शन सिखाता है—यहाँ कुर्सी कभी खाली नहीं रहती, केवल उसके चारों ओर खड़े लोगों की जगह बदलती रहती है। और जनता? वह हर बार तालियाँ बजाने, हूटिंग करने और अगली पटकथा का इंतजार करने के लिए आमंत्रित रहती है।

कभी-कभी तो लगता है कि राजनीति में दल नहीं टूटते, केवल कुर्सी के चारों ओर बैठने की ज्यामिति बदलती है। बाकी सब कुछ वैसा ही रहता है—वादे भी, दावे भी और आश्चर्यजनक रूप से जनता का धैर्य भी।

सतना (म. प्र.)


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