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शांति के लिए प्रमुख जातीय समूहों के साथ संवाद जरूरी

लगभग तीन वर्षों से हिंसा की चपेट में रहे मणिपुर की स्थिति यह स्पष्ट करती है कि केवल सुरक्षा बलों की तैनाती पर्याप्त नहीं है

शांति के लिए प्रमुख जातीय समूहों के साथ संवाद जरूरी
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  • कृष्ण झा

लगभग तीन वर्षों से हिंसा की चपेट में रहे मणिपुर की स्थिति यह स्पष्ट करती है कि केवल सुरक्षा बलों की तैनाती पर्याप्त नहीं है। जब तक मैतेयी, कुकी, नागा और अन्य संबंधित समुदायों के बीच विश्वास बहाली, राजनीतिक संवाद और स्थायी समाधान की दिशा में गंभीर पहल नहीं होगी, तब तक हिंसा का यह दुष्चक्र समाप्त होना कठिन दिखाई देता है।

देश के पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर में पिछले तीन वर्षों से जारी जातीय हिंसा थमने का नाम नहीं ले रही है। घात लगाकर हमले, अपहरण, हत्याएं और विरोध प्रदर्शन यहां की सामान्य स्थिति बन चुके हैं। राज्य कई जातीय प्रभाव क्षेत्रों में बंट चुका है और हाल की घटनाओं ने यह संकेत दिया है कि संघर्ष अब और अधिक जटिल होता जा रहा है। कुछ दिन पहले ही नागा समुदाय के कई लोगों का अपहरण किया गया, जिनमें से दो के क्षत-विक्षत शव बरामद हुए।

पिछले कुछ सप्ताहों में मैतेयी और कुकी समुदायों के बीच चल रहे संघर्ष में तीसरे प्रमुख समुदाय नागा भी प्रत्यक्ष रूप से शामिल हो गया है। मणिपुर के पहाड़ी क्षेत्रों में निवास अधिकार और क्षेत्रीय नियंत्रण को लेकर कुकी और नागा समुदायों के बीच झड़पें हुई हैं। 13 मई को हुए एक घातक हमले में तीन कुकी चर्च नेताओं सहित एक दर्जन से अधिक लोगों की जान गई जब कि कई लोगों का अपहरण कर लिया गया। इसे मई 2023 के बाद का सबसे गंभीर हिंसक दौर माना जा रहा है, जब मैतेयी और कुकी समुदायों के बीच हुई हिंसा में सैकड़ों लोगों की मौत हुई थी।

हिंसा को नियंत्रित करने के लिए केंद्र सरकार ने अर्धसैनिक बल तैनात किए, लेकिन स्थिति पूरी तरह सामान्य नहीं हो सकी। मैतेयी समुदाय मुख्यत: इंफाल और आसपास के मैदानी इलाकों में रहता है, जबकि कुकी समुदाय की आबादी अधिकतर पहाड़ी क्षेत्रों में है। दोनों समुदायों ने अपने-अपने प्रभाव वाले सुरक्षित क्षेत्र बना लिए हैं और हजारों लोग अब भी विस्थापित जीवन जीने को मजबूर हैं। हिंसा की प्रत्येक नई घटना के लिए दोनों पक्ष एक-दूसरे को जिम्मेदार ठहराते रहे हैं।

राज्य को जोड़ने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग-2 पर अनेक स्थानों पर सुरक्षा चौकियां, कंटीले तारों से घिरे संवेदनशील क्षेत्र और हमलों की आशंका आज भी सामान्य दृश्य हैं। हजारों विस्थापित लोग राहत शिविरों में रह रहे हैं और सरकारी सहायता पर निर्भर हैं।

फरवरी 2026 में राष्ट्रपति शासन हटाकर युमनाम खेमचंद सिंह के नेतृत्व में फिर से निर्वाचित सरकार को सत्ता सौंपी गई थी। इससे पहले फरवरी 2025 में राज्य सरकार की कानून-व्यवस्था संभालने में विफलता के बाद राष्ट्रपति शासन लगाया गया था। उम्मीद थी कि नई व्यवस्था के साथ हालात सुधरेंगे, लेकिन हिंसा और असुरक्षा का सिलसिला जारी रहा। मई 2023 से शुरू हुई जातीय हिंसा में अब तक 200 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है और लगभग 60 हजार लोग अपने घर छोड़ने को मजबूर हुए हैं। अनेक गांव, कारोबार और धार्मिक स्थल नष्ट हो चुके हैं तथा राज्य जातीय आधार पर विभाजित हो चुका है।

एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया के बोर्ड अध्यक्ष ने कहा है कि हाल के अपहरण और हत्याएं स्थिति की गंभीरता को और बढ़ाती हैं। अपहरण के लिए जिम्मेदार सशस्त्र समूहों को सभी बंधकों को तत्काल रिहा करना चाहिए तथा लापता लोगों की जानकारी उनके परिवारों को उपलब्ध करानी चाहिए। नागरिकों को किसी भी जातीय या राजनीतिक संघर्ष में निशाना बनाना या उन्हें बंधक बनाना स्वीकार्य नहीं है।

मानवाधिकार संगठनों ने राज्य सरकार से सभी बंधकों की सुरक्षित रिहाई सुनिश्चित करने, निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच कराने तथा दोषियों के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई की मांग की है। उसके अनुसार हाल के दिनों में लगभग 20 लोगों के अपहरण की घटनाएं सामने आई हैं, जिनमें अधिकांश पीड़ित कुकी और नागा समुदायों से हैं। अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत नागरिकों का अपहरण और उन्हें बंधक बनाना गंभीर अपराध माना जाता है।

एमनेस्टी इंटरनेशनल का यह भी कहना है कि मणिपुर सरकार को केवल तात्कालिक सुरक्षा उपायों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। सभी पक्षों द्वारा किए गए अपराधों की निष्पक्ष जांच, पीड़ितों को न्याय और क्षतिपूर्ति, मानवाधिकारों की सुरक्षा तथा संघर्ष के मूल कारणों के समाधान के लिए ठोस और दीर्घकालिक कदम उठाना आवश्यक है।

इस मसले में केंद्र सरकार की प्रतिक्रिया भी अपेक्षित स्तर की नहीं रही। प्रधानमंत्री ने पिछले वर्ष सितंबर में मणिपुर का संक्षिप्त दौरा किया था, जबकि केंद्र सरकार लगातार यह रुख अपनाती रही कि अधिकांश हिंसा शुरुआती महीनों में हुई थी। हाल की घटनाएं बताती हैं कि राज्य में शांति अब भी स्थापित नहीं हो सकी है।

लगभग तीन वर्षों से हिंसा की चपेट में रहे मणिपुर की स्थिति यह स्पष्ट करती है कि केवल सुरक्षा बलों की तैनाती पर्याप्त नहीं है। जब तक मैतेयी, कुकी, नागा और अन्य संबंधित समुदायों के बीच विश्वास बहाली, राजनीतिक संवाद और स्थायी समाधान की दिशा में गंभीर पहल नहीं होगी, तब तक हिंसा का यह दुष्चक्र समाप्त होना कठिन दिखाई देता है। यही कारण है कि अब सभी प्रमुख जातीय समूहों के साथ नए सिरे से व्यापक और भरोसेमंद वार्ता शुरू करना समय की सबसे बड़ी जरूरत है।


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