ललित सुरजन की कलम से देशबन्धु : चौथा खंभा बनने से इंकार- 8
'छत्तीसगढ़ में शुक्ल बंधुओं के वर्चस्व के कारण अनेक कांग्रेसजन घुटन महसूस करते थे,

'छत्तीसगढ़ में शुक्ल बंधुओं के वर्चस्व के कारण अनेक कांग्रेसजन घुटन महसूस करते थे, उन्हें पार्टी में अपने लिए संभावनाएं नजर नहीं आती थी। ऐसे अनेक लोग स्वाभाविक तौर पर सेठीजी के साथ जुड़ गए थे। मैं इनमें से प्रमुख रूप से रायपुर के अमरचंद बैद का नाम लेना चाहूंगा। वे प्रगतिशील विचारों वाले प्रबुद्ध व्यापारी थे और हमेशा लोगों की मदद के लिए तैयार रहते थे। अमरचंद जी अच्छी किताबें खरीदते व पढ़ते थे। उन्होंने निजी लाइब्रेरी बना रखी थी। सेठीजी के कार्यकाल में उनका काफी दबदबा हो गया था। लेकिन अपनी हैसियत का उन्होंने दुरुपयोग किया हो, ऐसा कोई प्रकरण प्रकाश में नहीं आया। सेठीजी को गुस्सा बहुत जल्दी आता था। ऐसा कहा जाता है कि वे नर्वस ब्रेकडाउन के मरीज थे और बीच-बीच में अपना मानसिक संतुलन खो बैठते थे। इसे लेकर कई किस्से प्रचलित हुए। जितना सच था, उससे ज्यादा उनके विरोधियों द्वारा बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया है। मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने जो भी निर्णय लिए, उनमें ऐसी कोई बात नहीं दिखी। मुख्यमंत्री पद संभालने के कुछ दिन बाद रायपुर प्रवास के दौरान उन्होंने वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक केसी बाजपेयी को खड़े-खड़े सस्पेंड कर दिया था, जिसे लेकर उनकी आलोचना हुई थी। इस तरह के कुछ और अन्य प्रसंग भी रहे होंगे। इन प्रसंगों को एक लंबी पारी में अपवाद ही मानना चाहिए। मुझे उनका एक अलग तरह का प्रसंग याद आता है। शायद खंडवा में लोकसभा उपचुनाव होना था। इसके लिए उन्होंने छत्तीसगढ़ के राइस किंग कहे जाने वाले नेमीचंद श्रीश्रीमाल से आर्थिक सहयोग की अपेक्षा की थी। नेमीचंद जी शुक्ल गुट के थे, सो उन्होंने सेठीजी के संदेश की उपेक्षा कर दी। इसके कुछ समय बाद सेठीजी का महासमुंद दौरा हुआ। नेमीचंद जी ने उन्हें भोजन पर आमंत्रित किया जिसे सेठीजी ने ठुकरा दिया। कुछ देर बाद वे वापसी के लिए हेलीकाप्टर में बैठे और उड़ने के पहले ही अपना टिफिन खोला और भोजन आरंभ कर दिया। हैलीपेड पर उपस्थित लोगों को जो संदेश जाना था, वो चला गया।'
(देशबन्धु में 30 जुलाई 2020 को प्रकाशित)
https://lalitsurjan.blogspot.com/2020/07/8.html


