दिल्ली की ईवी नीति : क्या स्वच्छ हवा की राह इलेक्ट्रिक होगी?
राष्ट्रीय प्रयासों के समानांतर अनेक राज्यों ने अपनी-अपनी इलेक्ट्रिक वाहन नीतियां बनाई हैं।

- अरुण कुमार डनायक
राष्ट्रीय प्रयासों के समानांतर अनेक राज्यों ने अपनी-अपनी इलेक्ट्रिक वाहन नीतियां बनाई हैं। दिल्ली के साथ-साथ, उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, तेलंगाना, केरल, हरियाणा और मध्य प्रदेश सहित कई राज्यों ने ऐसी नीतियां लागू कीं, जिससे जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता घटे, प्रदूषण कम हो और हरित अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहन मिले।
लगभग डेढ़ दशक पहले बीजिंग दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों में था। तब शायद ही किसी ने सोचा होगा कि वही शहर आज इलेक्ट्रिक मोबिलिटी का वैश्विक उदाहरण बन जाएगा। चीन सरकार ने शहरी परिवहन में इलेक्ट्रिक बसों व टैक्सियों का बड़े पैमाने पर बढ़ावा दिया। इससे वायु गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार हुआ, हालांकि प्रदूषण पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ।
दिल्ली आज बहुस्तरीय प्रदूषण संकट से जूझ रही है। सर्दियों में धीमी हवाओं और तापमान उलटाव से जहरीली हवा फंस जाती है। वाहनों का दबाव, निर्माण व औद्योगिक धूल, पराली जलाने का धुआं और कचरा/बायोमास दहन प्रदूषण को और गहरा करते हैं। आसपास के कोयला आधारित बिजलीघर और मथुरा रिफायनरी से निकलने वाले सल्फर डाइऑक्साइड व नाइट्रोजन ऑक्साइड भी वायु गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं। इन सबके संयुक्त प्रभाव से सार्वजनिक स्वास्थ्य पर गंभीर संकट खड़ा होता है और सरकारों के सामने ऊर्जा संक्रमण, क्षेत्रीय सहयोग तथा शहरी परिवहन सुधार जैसी चुनौतियां उपस्थित होती हैं। इन परिस्थितियों के बीच दिल्ली सरकार द्वारा अधिसूचित नई इलेक्ट्रिक वाहन नीति-2026 केवल परिवहन नीति नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और ऊर्जा संक्रमण की दिशा में एक महत्वाकांक्षी पहल के रूप में सामने आई है।
भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों की यात्रा केवल राज्यों की पहल तक सीमित नहीं रही। केंद्र सरकार ने 2015 में फेम इंडिया योजना शुरू की, जिसे बाद में फेम-11 के रूप में विस्तारित किया गया। अनुदान, बैटरी निर्माण, चार्जिंग अवसंरचना तथा पीएम ई-ड्राइव जैसी पहलों के माध्यम से केंद्र सरकार ने केवल वाहन खरीद ही नहीं बल्कि पूरे ईवी पारितंत्र को विकसित करने का प्रयास किया है।
राष्ट्रीय प्रयासों के समानांतर अनेक राज्यों ने अपनी-अपनी इलेक्ट्रिक वाहन नीतियां बनाई हैं। दिल्ली के साथ-साथ, उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, तेलंगाना, केरल, हरियाणा और मध्य प्रदेश सहित कई राज्यों ने ऐसी नीतियां लागू कीं, जिससे जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता घटे, प्रदूषण कम हो और हरित अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहन मिले।
दिल्ली ने वर्ष 2020 में देश की सबसे प्रगतिशील इलेक्ट्रिक वाहन नीतियों में से एक लागू की थी, जिसका आधार प्रोत्साहन था। खरीद पर सब्सिडी, सड़क कर एवं पंजीकरण शुल्क में छूट, चार्जिंग स्टेशनों का विस्तार और जन-जागरूकता अभियानों के माध्यम से लोगों को स्वेच्छा से इलेक्ट्रिक वाहन अपनाने के लिए प्रेरित किया गया। इसका सकारात्मक परिणाम यह हुआ कि दिल्ली देश के सबसे तेजी से बढ़ते इलेक्ट्रिक वाहन बाजारों में शामिल हो गई, विशेषकर दोपहिया वाहनों और ई-रिक्शा के क्षेत्र में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई। वर्ष 2026 की नई नीति इसी यात्रा का अगला चरण है। यदि 2020 की नीति को 'प्रोत्साहन आधारित नीति' कहा जाए, तो 2026 की नीति 'समयबद्ध परिवर्तन आधारित नीति' है। अब सरकार केवल रियायतें देकर लोगों की स्वैच्छिक भागीदारी पर निर्भर नहीं रहना चाहती, बल्कि स्पष्ट समय-सीमा निर्धारित कर चरणबद्ध रूप से पेट्रोल और सीएनजी वाहनों से इलेक्ट्रिक वाहनों की ओर संक्रमण सुनिश्चित करना चाहती है। इसी उद्देश्य से 1 जनवरी 2027 से केवल इलेक्ट्रिक ऑटो-रिक्शा तथा 1 अप्रैल 2028 से केवल इलेक्ट्रिक दोपहिया वाहनों के नए पंजीकरण का प्रावधान किया गया है। यही गुणात्मक परिवर्तन नई नीति को 2020 की नीति से अधिक साहसिक, स्पष्ट और दूरगामी बनाता है।
यद्यपि नई नीति में इलेक्ट्रिक कारों की खरीद पर भी कर एवं पंजीकरण शुल्क में छूट सहित विभिन्न प्रोत्साहनों का प्रावधान है, फिर भी सरकार का मुख्य जोर दोपहिया वाहनों के विद्युतीकरण पर है, क्योंकि दिल्ली के लगभग दो-तिहाई पंजीकृत वाहन इसी श्रेणी के हैं। इनके विद्युतीकरण से वायु प्रदूषण, ईंधन खपत और कार्बन उत्सर्जन में सबसे अधिक कमी लाई जा सकती है।
इलेक्ट्रिक मोबिलिटी केवल पर्यावरणीय परियोजना नहीं, बल्कि औद्योगिक नीति भी है। बैटरी निर्माण, सॉफ्टवेयर, चार्जिंग नेटवर्क, बिजली वितरण, ऑटोमोबाइल विनिर्माण और सेवा क्षेत्र में लाखों नए रोजगार सृजित हो सकते हैं। यदि भारत इस क्षेत्र में समय रहते निवेश करता है तो वह वैश्विक ईवी आपूर्ति श्रृंखला का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकता है।
परंतु किसी भी नीति की सफलता केवल उसकी घोषणा से नहीं, बल्कि उसके क्रियान्वयन से तय होती है। दिल्ली की नई नीति के सामने अनेक चुनौतियां भी हैं। भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों की सबसे बड़ी चुनौती चार्जिंग अवसंरचना है—लाखों नए ईवी सड़कों पर आने वाले हैं, जबकि मौजूदा नेटवर्क अभी भी अपर्याप्त है। दूसरी चुनौती बिजली वितरण व्यवस्था की है, जिसे बढ़ती मांग के अनुरूप सुदृढ़ करना होगा। तीसरी चुनौती बैटरी आपूर्ति श्रृंखला की है, क्योंकि भारत लिथियम और अन्य महत्वपूर्ण खनिजों के लिए चीन जैसे देशों पर निर्भर है; यदि संबंधों में खटास आती है तो आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। इसलिए भारत को लिथियम, कोबाल्ट तथा दुर्लभ खनिजों के वैकल्पिक स्रोत विकसित करना भी उतना ही आवश्यक है। चौथी चुनौती बैटरी रीसाइक्लिंग की है, अन्यथा प्रदूषण का नया स्रोत पैदा होगा। उपभोक्ताओं के लिए इलेक्ट्रिक दोपहिया वाहनों की दूरी भी अहम प्रश्न है—हालांकि शुरुआती मॉडलों की सीमा 50 किमी थी, आज अधिकांश स्कूटर 120-160 किमी तक चल सकते हैं, जो दिल्ली जैसे महानगर में दैनिक यात्रा के लिए पर्याप्त है। इसके बावजूद कीमत, सर्विस नेटवर्क, प्रशिक्षित तकनीशियन और उपभोक्ता विश्वास जैसी व्यावहारिक चुनौतियां बनी हुई हैं। साथ ही, जब तक बिजली उत्पादन नवाचारी स्रोतों से नहीं बढ़ेगा, ईवी का पर्यावरणीय लाभ सीमित रहेगा।
यह भी ध्यान रखना होगा कि दिल्ली का वायु प्रदूषण केवल वाहनों से नहीं होता। पराली जलाना, निर्माण कार्यों से उठने वाली धूल, औद्योगिक गतिविधियां तथा पड़ोसी राज्यों से आने वाले प्रदूषक भी इसमें बड़ी भूमिका निभाते हैं। इसलिए केवल इलेक्ट्रिक वाहन नीति से समस्या का पूर्ण समाधान नहीं होगा। इसे सार्वजनिक परिवहन के विस्तार, मेट्रो, बसों, साइकिल मार्गों, हरित ऊर्जा और समग्र वायु गुणवत्ता प्रबंधन के साथ जोड़कर ही अपेक्षित परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं। नीति की सफलता के लिए सख्त प्रशासनिक निगरानी आवश्यक है, क्योंकि निचले स्तर की लापरवाही, भ्रष्टाचार और उच्चाधिकारियों की अनदेखी अक्सर क्रियान्वयन को कमजोर कर देती है।
फिर भी यह स्वीकार करना होगा कि दिल्ली की नई इलेक्ट्रिक वाहन नीति भारत में हरित परिवहन की दिशा में एक साहसिक और दूरदर्शी कदम है। यदि बीजिंग अपने कठिन अनुभवों से सीख लेकर प्रदूषण नियंत्रण की दिशा में आगे बढ़ सकता है, तो दिल्ली भी सुविचारित नीतियों, मजबूत आधारभूत ढांचे और प्रभावी क्रियान्वयन के माध्यम से स्वच्छ परिवहन की नई मिसाल बन सकती है। यह नीति केवल वाहनों को बदलने की योजना नहीं है; यह ऊर्जा, पर्यावरण और शहरी जीवन शैली के व्यापक परिवर्तन का आरंभ है। इसकी सफलता अंतत: इस बात पर निर्भर करेगी कि सरकार, उद्योग और नागरिक—तीनों इस परिवर्तन को कितनी गंभीरता से स्वीकार करते हैं।
(लेखक एवं समाजसेवी )


