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जनगणना में प्रवासी मजदूरों की गिनती जरूरी

सिर्फ प्रवासी बन जाने से वहां रहना, खाना, पहनना, ओढ़ना से लेकर पढ़ाई तक का काम कितना मुश्किल हो गया है इसकी कल्पना मुश्किल है।

जनगणना में प्रवासी मजदूरों की गिनती जरूरी
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सिर्फ प्रवासी बन जाने से वहां रहना, खाना, पहनना, ओढ़ना से लेकर पढ़ाई तक का काम कितना मुश्किल हो गया है इसकी कल्पना मुश्किल है। लोकतंत्र हो तो संख्या का बल और लोकतान्त्रिक शासन हो तो संगठित जमातों की बारगेनिंग पावर को नजरअंदाज करना मुश्किल होता है। अब यह दूसरी ताकत भी तभी हासिल होगी जब पहला काम हो जाएगा।

तो इस बार के चुनाव में भी मजदूरों के पलायन का सवाल आ ही गया। कैसा भी चुनाव हो, विकसित राज्य का हो या पिछड़े राज्य का, पलायन और प्रवासी मजदूर मुद्दा बन जाते हैं। पिछड़ा बिहार हो या विकसित पंजाब, यह मुद्दा है। दिल्ली में तो प्रवासियों का वोट निर्णायक ही माना जाने लगा है पर इस बार चुनाव न बिहार में है न पंजाब में और न दिल्ली में। केरल में चुनाव है तो वह भी खाली होने लगा है। प्रवासी मजदूर सिर्फ रसोई गैस की तंगी से ही नहीं वोट देने के लिए अपने देश बंगाल और असम लौट रहे हैं।

तमिलनाडु में बहुत बिहारी मजदूर हैं तो उनका लौटना खास चरचा में नहीं है क्योंकि अभी वे वहां के वोटर नहीं हैं। केरल में तो आर्थिक जीवन ही नहीं हर तरफ प्रवासी बिहारी, झारखंडी, बंगाली और असमिया या ओडिया मजदूरों का 'राजÓ है। उनके हिसाब से सस्ते होटलों का खाना बनता है, सिनेमा दिखाया जाता है, बसों पर हिन्दी और बांग्ला में तख्तियां लगाकर उनके आने-जाने के स्थान की सूचना दी जाती है, कमरों का किराया तय होता है और उनके बंगाल और असल लौटने की वजह मतदाता सूचियों का बृहद संशोधन और उस नाम पर लोगों के नाम काटने जोड़ने का खेल भी एक वजह है। कई तो अपने अपूर्ण या विवादित दस्तावेज की गवाही के लिए पहले आ गए हैं लेकिन ज्यादातर को लगता है कि वोट गिराने से उनकी नागरिकता पुख्ता होगी।

इस बार प्रवासी मतदाताओं की उस तरह लल्लो-चप्पों नहीं हो रही है जैसा अक्सर अब बिहार या दिल्ली या फिर पंजाब चुनाव में दिखाई देता है। वहीं क्यों? अब तो मुंबई और सूरत वगैरह में भी चुनाव के समय भी प्रवासियों की आवाजाही और वोट का सवाल प्रमुख बनता है। पार्टियां उनके लिए खास तौर से उन राज्यों के अपने नेताओं को जिम्मा सौंपती है। मोटा फंड भी दिया जाने लगा है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लोग भी पेड लीव और रिटर्न प्लेन टिकट के साथ अपने शहर भेजे जाते हैं। मजदूरों को साड़ी, बिंदी सहित छुट्टी के साथ घर भेजा जाता है।

पिछले बिहार चुनाव में दिल्ली और हरियाणा से स्पेशल रेलगाड़ियां चलाई गईं और मजदूरों को मुफ़्त में लाया-ले जाया गया। भाजपा ने यह काम किया तो विपक्ष को इसे मुद्दा बनाने का मौका मिला। इस बार न पक्ष सक्रिय है न विपक्ष। सारा जतन प्रवासियों को खुद करना है। हां, इतना जरूर हुआ है कि बार-बार दिखने वाली दुर्दशा के चलते इस बार मीडिया, खासकर सोशल मीडिया में मजदूरों की घर वापसी एक मुद्दा बनकर सामने आई है। इसमें मुख्य मसला रसोई गैस के संकट का है पर किसी बहाने अगर समाज को इनकी सुध आने लगी है तो यह शुभ लक्षण है।

बीते काफी वर्षों से इन अभागे मजदूरों के हिस्से जो ज़लालत और परेशानी की जिंदगी रही है उसमें ऐसे मौके-कुमौके की चर्चा से ज्यादा बदलाव नहीं आना है। उससे न तो अमीर और गरीब इलाकों के विकास का क्रम उलटेगा और न इस फासले से पैदा होने वाले पलायन के हालात। हमारा विकास ऐसे ही आड़ा-तिरछा बढ़ता गया है और उसी क्रम में मजदूरों का पलायन भी। प्रसिद्ध समाजवादी चिंतक इस क्रम को इंटरनल कालोनी वाले तर्क से समझाने की कोशिश करते थे और सिर्फ चुनाव के वक्तनेताओं और भाग्य विधाताओं को इन मजदूरों की याद इसलिए आती हैं क्योंकि इनका वोट है।

चुनावी लोकतंत्र में यह चीज इतनी बड़ी है जिसकी कल्पना आसानी से नहीं होती और आज इसी चीज को संदेहास्पद बनाने का जतन भी हो रहा है। जरा कल्पना कीजिए कि अगर यह अधिकार न होता तो इन मजदूरों की सुध लेने का होश किस नेता और अधिकारी को रहता? वर्षों पहले राजीव गांधी की सरकार ने एक अंतरराज्य प्रवासी मजदूर कानून बनाकर कुछ चीजें व्यवस्थित करने का प्रयास किया था तो वह बात जाने कहां पीछे छूट गई है। इसमें अपने प्रांत से बाहर जाने वाले मजदूरों के पंजीकरण की बात थी। इस लेखक की भी राय है कि अगर सिर सही संख्या सामने आ जाए तो कोई भी सरकार और नेता इनकी उपेक्षा करने का साहस नहीं कर सकता। फिर कोरोना की तालाबंदी में इन लाखों मजदूरों की जो दुर्गति हुई थी वह भी थमती।

अभी इस लेख को लिखने का प्रयोजन चुनाव और मजदूरों की आवाजाही बढ़ाने या तकलीफों को बताने का नहीं है। हम जानते हैं कि लंबे इंतजार और सात-आठ साल की देरी से अभी जनगणना का काम शुरू हुआ है। घर गिनती से शुरुआत हुई है। अभी तक अपने यहां मजदूरों के पलायन का कोई ढंग का या अधिकृत आंकड़ा नहीं है। जब घर-घर जाकर सबको गिनने का क्रम चल रहा है तो इस श्रेणी को भी पर्याप्त महत्व देकर अलग स्थान दिया जाए। यह काम किसी एआई यानी आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस से नहीं होगा, घर-घर जाकर ही होगा।

अपने यहां जनगणना लगातार दस साल पर हुई है, सिर्फ इसी बार क्रम तोड़ा गया है। अब उन कारणों में न जाएं और मोदी सरकार को आंकड़ों से डरने वाला न भी बताएं तो यह कहना जरूरी है कि जब पचीसों पैमाने वाले आंकड़े जुटाए जा रहे हैं तो यह आंकड़ा भी जुटाया जाए, मजदूरों से संबंधित आंकड़े भी लिए जाएं। इन दो मामलों में काफी घालमेल है। मजदूरों के आंकड़ों में नेशनल सैंपल सर्वे और जनगणना के आंकड़ों में भारी गैप है और सरकार भी पीएफ के खातों की संख्या देखकर मजदूरों की संख्या बताने का हास्यास्पद प्रयास करती है। लेकिन प्रवासी मजदूरों के मामले में तो पूरा डिब्बा गोल है सिर्फ अटकलों के आधार पर और वोट देखकर इनकी संख्या के बारे में अंदाजा लगाया जाता है।

संख्या जाने बगैर आर्थिक योजनाओं में प्रवासियों को उचित क्या अनुचित स्थान या महत्व की बात सोची जा सकती है, उसके बगैर तो कुछ नहीं हो सकता। उनके मरने और उनके यहां जन्म लेने वालों तक के आंकड़े उपलब्ध नहीं है। उनकी कमाई को वापस घर तक पहुंचाना आज के युग में भी इतनी नाटकीयता और लूट से भरा है कि उस पर पूरा ग्रंथ लिखा जा सकता है।

न्यूनतम मजदूरी कानून से लेकर परदेश की जमीन और भाषा से अलग इलाके के जीवन में क्या कुछ मुश्किलें आती है यही उनका हिसाब लगाना मुश्किल है और इस बीच हम यह किस्से भी चटखारे लेकर छापते हैं कि केरल में मलयालम की परीक्षा में एक बिहारी मजदूर की बेटी टाप करती है। सिर्फ प्रवासी बन जाने से वहां रहना, खाना, पहनना, ओढ़ना से लेकर पढ़ाई तक का काम कितना मुश्किल हो गया है इसकी कल्पना मुश्किल है। लोकतंत्र हो तो संख्या का बल और लोकतान्त्रिक शासन हो तो संगठित जमातों की बारगेनिंग पावर को नजरअंदाज करना मुश्किल होता है। अब यह दूसरी ताकत भी तभी हासिल होगी जब पहला काम हो जाएगा। इसलिए इस जनगणना में प्रवासी मजदूरों की गिनती जरूर होनी चाहिए।


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