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अंतरिक्ष जैसे अहम सेक्टर में निजीकरण पर विवाद

निजीकरण को बढ़ावा देने के लिए अक्सर अच्छे सरकारी संगठनों की नाकामियों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है।

अंतरिक्ष जैसे अहम सेक्टर में निजीकरण पर विवाद
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राजेश पांडेय

निजीकरण को बढ़ावा देने के लिए अक्सर अच्छे सरकारी संगठनों की नाकामियों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है। इसरो के कुछ अभियान विफल हुए हैं। माधवन का कहना सही है कि किसी भी पेंचीदा वैज्ञानिक अभियान में मुश्किलें आती हैं। लेकिन उसे बदनाम करने की बजाय सुधार का रास्ता अपनाया जाना चाहिए। सोवियत यूनियन (अब रूस) और अमेरिका के कई स्पेस मिशन नाकाम हो चुके हैं। लेकिन दोनों देशों ने सरकारी स्पेस संगठनों का महत्व कायम रखा है।

भारतीय अर्थव्यवस्था के कई क्षेत्र तेजी से निजीकरण की ओर बढ़ रहे हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण क्षेत्रों में लंबे समय तक प्राइवेट सेक्टर की भूमिका सीमित रही लेकिन अब इन्हें भी धीरे-धीरे खोला जा रहा है। इनमें अंतरिक्ष कार्यक्रम शामिल है। इस पर विवाद और सवाल उठने लगे हैं। जुलाई-अगस्त के माह भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन ( इसरो) से बड़ी संख्या में वैज्ञानिकों के इस्तीफे और एक निजी कंपनी के अंतरिक्ष अभियान के लिए चर्चित रहे हैं। 23 अगस्त को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अंतरिक्ष दिवस पर इसरो की तारीफ करते हुए कहा कि इसरो की सफलता सेे कई बच्चे साइंटिस्ट बनने के बारे में सोचेंगे। मोदी ने यह भी कहा, भारत की निजी अंतरिक्ष प्रतिभा दुनिया में अपनी पहचान बना रही है। लेकिन, उसी दिन इसरो के पूर्व प्रमुख माधवन नायर ने स्पेस सेक्टर के बहुत ज्यादा निजीकरण के खिलाफ आगाह किया।

माधवन नायर की आपत्ति कई कारणों से ध्यान खींचती है। उन्होंने अक्टूबर 2018 में गृहमंत्री अमित शाह की मौजूदगी मेें सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ग्रहण की थी। शायद उनसे पहले कोई जाना-माना स्पेस साइंटिस्ट भाजपा में नहीं आया था। उनका करिअर कामयाबी और शोहरत की ऊंची उड़ान से विवादों की गहराई में गोता लगाने की कहानी है। वे 2003-04 से छह साल तक इसरो के प्रमुख थे। इस दौरान देश के पहले चंद्र मिशन चंद्रयान-1 सहित 27 अभियान सफल हुए। उन्हें 2009 में मनमोहन सिंह की यूपीए सरकार ने देश के दूसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान पद्मविभूषण से अलंकृत किया था। लेकिन 2012 में सरकार ने टेलीकॉम स्पेक्ट्रम से संबंधित एंट्रिक्स-देवास करार में कथित घोटाले के आरोप में किसी भी सरकारी संगठन में नायर की नियुक्ति पर प्रतिबंध लगा दिया। यह पाबंदी लागू है।

नायर ने निजी कंपनियों को प्रक्षेपण केंद्रों का काम सौंपने के प्रस्ताव का कड़ा विरोध किया है। वे पहले भी इसरो की कमजोरियों को सामने रख चुके हैं। जब संगठन से तीन वर्षों में कई वैज्ञानिकों ने इस्तीफा दे दिया था तब 2017 में उन्होंने नए प्रोजेक्ट, इनोवेशन और किसी भावी परिकल्पना के अभाव को इसका कारण बताया था। इस स्थिति में सुधार नहीं हुआ है। इसरो लंबे समय से सरकार की उपेक्षा, वैज्ञानिकों के लिए अवसरों की कमी और जरूरी प्रोत्साहन जैसी समस्याओं का सामना कर रहा है। पिछले दो दशक से अच्छे वैज्ञानिकों का पलायन जारी है।

वहां से 2004 में 105 और 2005 में 100 वैज्ञानिकों ने काम छोड़ा था। 2006-07 में 354 नई नियुक्तियां हुई तो 187 वैज्ञानिक विदा हो गए। 2012 से 2024 के बीच 700 वैज्ञानिकों और अन्य कर्मचारियों ने इसरो छोड़ दिया। पलायन का सिलसिला 2026 में जारी है। अंतरिक्ष विभाग में 2025-26 के अंत में हर दस स्वीकृत पदों में लगभग तीन पद खाली थे। स्टाफ की कमी 76 फीसदी तक पहुंच गई थी। यह 25 साल में सबसे अधिक है। जुलाई में यूआर राव सैटेलाइट सेंटर से 80 और विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर से 20 साइंटिस्ट और टेक्नीशियन निकल गए। इनमें से कुछ प्रतिष्ठागत गगनयान मिशन में काम कर रहे थे। अधिकतर लोगों को बेहतर वेतन और सुविधाएं प्राइवेट सेक्टर में आकर्षित करती हैं। फिर भी, इसरो जैसे आला दर्जे के सरकारी संगठन को उसके हाल नहीं छोड़ा जा सकता है।

निजीकरण को बढ़ावा देने के लिए अक्सर अच्छे सरकारी संगठनों की नाकामियों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है। इसरो के कुछ अभियान विफल हुए हैं। माधवन का कहना सही है कि किसी भी पेंचीदा वैज्ञानिक अभियान में मुश्किलें आती हैं। लेकिन उसे बदनाम करने की बजाय सुधार का रास्ता अपनाया जाना चाहिए। सोवियत यूनियन (अब रूस) और अमेरिका के कई स्पेस मिशन नाकाम हो चुके हैं। लेकिन दोनों देशों ने सरकारी स्पेस संगठनों का महत्व कायम रखा है। रूस ने तो स्पेस सेक्टर को निजीकरण से पूरी तरह अलग रखा है। पूंजीवादी व्यवस्था के सिरमौर अमेरिका का सरकारी संगठन नासा बीते कुछ वर्षों से स्पेस स्टेशन पर अंतरिक्ष यात्री, सामान भेजने जैसे कामों के लिए स्पेस एक्स, ब्लूओरिजन और नारथ्रॉप ग्रूमन जैसी प्राइवेट कंपनियों पर निर्भर है। अमेरिका के केप केनवरेल स्थित मुख्य प्रक्षेपण सेंटर का मालिकाना हक सरकारी विभागों के पास है। कुछ लॉन्च पैड निजी कंपनियों को लीज पर दिए हैं।

सरकार के कुछ फैसलों ने इसरो की स्थिति को कमजोर बनाया है। पिछले दशक में स्पेस सेक्टर को निजी क्षेत्र के लिए खोल दिया गया। 2020 में इसरो ने देश भर में अपने विभिन्न केंद्र और यूनिट प्रमुखों को ग्रुप ए की कुछ रैंक के वैज्ञानिक और तकनीकी स्टाफ के त्यागपत्र मंजूर करने का अधिकार दिया था। इससे नौकरी छोड़ने की प्रक्रिया आसान हो गई। स्काईरूट एयरोस्पेस, अग्निकुल कॉस्मॉस, बेलाट्रिक्स एयरोस्पेस, पिक्सेल, ध्रुव स्पेस, दिगंतरा सहित लगभग सभी प्राइवेट निजी कंपनियों में इसरो के कर्मचारियों की भरमार है। 2026 में मानवीय अंतरिक्ष मिशन- गगनयान जैसे अहम प्रोजेक्ट से वैज्ञानिकों और तकनीशियनों का पलायन होने के बाद जुलाई में इसरो ने कहा कि अब ऐसे मामले अंतिम निर्णय के लिए अंतरिक्ष विभाग को भेजे जाएं।

इसरो जैसे संगठन की स्थिति निजीकरण की प्रक्रिया पर नए सिरे से गौर करने की जरूरत बताती है। यों भी सैटेलाइट प्रक्षेपण के लिए जरूरी बुनियादी ढांचे की लागत बहुत ज्यादा है। हजारों करोड़ रुपए की भारी पूंजी लगाने पर उसके हिसाब से रिटर्न नहीं मिलता है। प्राइवेट कंपनियों को सैटेलाइट लॉन्च के लिए सरकारी केंद्रों पर निर्भर रहना पड़ेगा। 18 जुलाई को स्काईरूट एयरोस्पेस कंपनी का विक्रम-1 सैटेलाइट सरकार के सतीश धवन स्पेस सेंटर, श्रीहरिकोटा से लॉन्च किया गया। यह धरती की निचली कक्षा में पहुंचने वाला भारत का पहला प्राइवेट रॉकेट है।

अंतरिक्ष कार्यक्रमों को निजी क्षेत्र के लिए खोलने के बाद सरकार के अंतरिक्ष विभाग के बजट में मामूली बढ़ोतरी होती रही है। जबकि निजी क्षेत्र से आने वाली चुनौतियों को देखते हुए बजट में भारी बढ़ोतरी की जरूरत है। 2019-20 में अंतरिक्ष विभाग का बजट 12743 करोड़ रुपए था। इसमें बाद के वर्षों में दो-तीन प्रतिशत का उतार-चढ़ाव आया है। 2020-21 में बजट 13479 करोड़ रुपए, 21-22 में 13949 करोड़ रुपए 22-23 में 13700 करोड़ रुपए, 23-24 में 12543 करोड़ रुपए, 24-25 में 13042 करोड़ रुपए तो 2025-26 में बजट 13416 करोड़ रुपए रहा। जाहिर है, इसका बड़ा हिस्सा कर्मचारियों के वेतन और रोजमर्रा के खर्चों में खपता है।

भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम की बुनियाद दुनिया के बड़े देशों से साइंस, टेक्नालॉजी में होड़ और स्पेस टेक्नालॉजी के फायदे आम लोगों को मुहैया कराने के मकसद से रखी गई है। 1962 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने अंतरिक्ष अनुसंधान के लिए राष्ट्रीय कमेटी का गठन किया था। इसका नतीजा जल्द सामने आया और नवंबर 1963 में भारत ने थुम्बा प्रक्षेपण केंद्र से पहला रॉकेट लॉन्च किया था। उस राकेट को लांच पैड तक साइकिल से ले जाया गया था। 15 अगस्त 1969 को इंदिरा गांधी के शासनकाल में इसरो ने आकार लिया। और भारत कुछ वर्षों के अंदर दुनिया की बड़ी अंतरिक्ष ताकत बन गया। इसरो की रिसर्च के बूते भारत ने अपने मिसाइल कार्यक्रम को नई दिशा दी है। वह हजारों किलोमीटर दूर तक मार करने वाली बैलिस्टिक मिसाइल बना रहा है।

स्पेस साइंस में अग्रणी पांच-छह देशों में भारत की हमेशा गिनती होती है। फिर भी, हाल के वर्षों में अफसरशाही के मजबूत नियंंत्रण और लापरवाही ने इसरो को कमजोर किया है। उसके कई अहम मिशन असफल हुए हैं। गगनयान जी-1 की टेस्ट फ्लाइट, जीएसएलवी-एफ 17 और पीएसएलवी एन 1 जैसे कुछ मिशन अपने निर्धारित समय से पीछे रहे हैं। इस साल प्रमुख प्रक्षेपण यान पीएसएलवी के दो मिशन में देर होने से लॉन्च की गतिविधियों पर असर पड़ा है। मीडिया में छपी खबरों के अनुसार इसरो में अधिकतर फैसले शीर्ष स्तर से होने लगे हैं। प्रमुख टेक्निकल और प्रशासनिक निर्णय चैयरमैन के दफ्तर से होते हैं। इसका वैज्ञानिकों के मनोबल पर प्रभाव पड़ता है।

कह सकते हैं कि 14 हजार से अधिक कर्मचारियों की संख्या के इसरो को किसी एक साल में सौ से अधिक वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और प्रशासनिक अधिकारियों के आने-जाने से ज्यादा फर्क नहीं पड़ता है। लेकिन, 60 साल से अधिक पुराने संगठन के मजबूत आधार और कार्य संस्कृति की तुलना कुछ साल पहले बने निजी संगठनों से कैसे कर सकते हैं। भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम में विक्रम साराभाई, यूआर राव, सतीश धवन, स्वर्गीय राष्ट्रपति अब्दुल कलाम जैसे विश्वविख्यात साइंटिस्ट की बड़ी भूमिका रही है। उनके उदाहरण साइंस, रिसर्च जैसे क्षेत्रों में दिलचस्पी लेने वाले युवाओं को प्रेरित करते हैं। इसरो को देखकर ही प्राइवेट सेक्टर ने अंतरिक्ष में ऊंची उड़ान भरी है। इसलिए इसरो को सरकारी संरक्षण की जरूरत है। उसकी मजबूती ने विश्व में भारत की ताकत, रुतबा और दबदबा बढ़ाया है। स्पेस साइंस सिर्फ चांद, मंगल ग्रहों जैसी सुदूर दुनिया की हकीकत को धरती पर नहीं उतारती है बल्कि वह खेती, मौसम, डिफेंस, दूरसंचार सहित कई क्षेत्रों में तरक्की और संभावनाओं के नए दरवाजे खोलती है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)


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