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पूर्वोत्तर भारत के ईसाई संगठनों ने कहा एफसीआरए में प्रस्तावित बदलाव दमनकारी

इस बातचीत की प्रक्रिया में पूर्वोत्तर के कई चर्च काउंसिल और उनके मुख्य संगठन शामिल हैं।

पूर्वोत्तर भारत के ईसाई संगठनों ने कहा एफसीआरए में प्रस्तावित बदलाव दमनकारी
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  • रवीन्द्र नाथ सिन्हा

मिजोरम के मुख्यमंत्री लालदुहोमा ने 9 अगस्त को सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में केंद्र और उसके गृह मंत्री से एफसीआरए संशोधन बिल को वापस लेने और इसे और गहन विचार-विमर्श के लिए जेपीसी (संयुक्त संसदीय समिति) को भेजने का आग्रह किया। मुख्यमंत्री लालदुहोमा ने 6 अगस्त को नई दिल्ली में ईसाई समुदाय के प्रतिनिधियों के साथ शाह से मुलाकात की थी और उन्हें अपनी चिंताओं से अवगत कराया था।

पूर्वोत्तर भारत के ईसाई संगठन- जहां मिजोरम, नागालैंड और मेघालय जैसे तीन राज्यों में ईसाई आबादी बहुत ज़्यादा है- फॉरेन कंट्रीब्यूशन (रेगुलेशन) अमेंडमेंट (एफसीआरए) बिल, 2026 के खिलाफ़ अपनी बात रखने के लिए आपस में बातचीत कर रहे हैं। हालात के दबाव में भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने इस बिल को संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के पास भेजा है। जेपीसी के लिए यह आम बात है कि वह अपनी राय तय करने से पहले सभी संबंधित पक्षों, जिनमें प्रभावित पक्ष भी शामिल हैं, की बातें सुने। सत्ता पक्ष ने जेपीसी से संसद के मानसून सत्र में अपनी रिपोर्ट सौंपने का आग्रह किया था, परन्तु काम की गंभीरता और विषय की संवेदनशीलता को देखते हुए, जेपीसी को अपनी रपट तैयार करने में देर हो रही है।

इस बातचीत की प्रक्रिया में पूर्वोत्तर के कई चर्च काउंसिल और उनके मुख्य संगठन शामिल हैं। इनमें 'असम क्रिश्चियन फोरम', 'यूनाइटेड क्रिश्चियन फोरम ऑफ़ नॉर्थ-ईस्ट इंडिया' और 'नॉर्थ-ईस्ट इंडिया क्रिश्चियन काउंसिल' जैसे संगठन शामिल हैं। हालांकि, हमेशा की तरह, जेपीसी में सत्तापक्ष का प्रतिनिधित्व दो-तिहाई और विपक्ष का एक-तिहाई है, फिर भी उम्मीद है कि जेपीसी ईसाई संगठनों के रुख पर उचित ध्यान देगी, जिन्हें एफसीआरए (संशोधन) बिल 2026 के प्रावधान 'दमनकारी' लगते हैं।

ईसाई संगठनों को इस बात से राहत मिल रही है कि भले ही दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के अधिकारी विदेशी चंदा पाने वाले और उसका इस्तेमाल घरेलू संसाधनों के साथ मिलकर शिक्षा, चिकित्सा और लोगों के जीवन स्तर को बेहतर बनाने जैसे कल्याणकारी कामों में करने वाले सिविल सोसाइटी संगठनों (सीएसओ) को बहुत ज़्यादा नियंत्रित करने पर तुले हों, फिर भी लोगों के बीच सीएसओ के महत्व को लेकर आम सहमति है। इसके अलावा, प्राकृतिक आपदाओं के समय, अक्सर सीएसओ ही सबसे पहले और दूसरे स्तर पर मदद करने वालों के तौर पर काम करते हैं और पीड़ितों के लिए भोजन और आश्रय का इंतज़ाम करते हैं।

2026 के एफसीआरए (संशोधन) विधेयक से पहले, नई दिल्ली ने 2020 में एफसीआरए में संशोधन पास कराए थे। इन संशोधनों के तहत, किसी रजिस्टर्ड संस्था के लिए किसी दूसरी संस्था (भले ही वह उसी एक्ट के तहत रजिस्टर्ड हो) को धन हस्तांतरित करना मना कर दिया गया था। इसके अलावा, प्रशासन के काम में इस्तेमाल होने वाले विदेशी धन का हिस्सा 50 प्रतिशत से घटाकर 20 प्रतिशत कर दिया गया था। असम क्रिश्चियन फोरम और यूनाइटेड क्रिश्चियन फोरम ऑफ नॉर्थ ईस्ट इंडिया के प्रवक्ता ने संवाद को बताया, 'यह बहुत बड़ी कटौती है, जिससे कामकाज को ठीक से चलाना मुश्किल हो जाता है। इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि चर्च के प्रशासनिक शाखा में कोई व्यक्ति अपनी जेब भरने के लिए गलत तरीकों का इस्तेमाल कर सकता है। लेकिन ऐसी घटनाएं बहुत कम होती हैं। किसी एक व्यक्ति की गलत हरकत के लिए प्रबंधन की कार्यसमिति की छवि खराब करना सही नहीं है।'

2026 के एफसीआरए (संशोधन) विधेयक में नियमों को और सख्त करने का प्रस्ताव है- विदेश से मिले धन से बनाई गई संपत्तियों को तब भी ज़ब्त किया जा सकता है जब निबंधन प्रमाण पत्र की वैधता खत्म हो गई हो। किसी संस्था का निबंधन कई स्थितियों में रद्द हो सकता है; जैसे जब सरकार इसे रद्द कर दे; जब नवीकरण) से इनकार कर दिया जाए; और/या, जब पुराने प्रमाण पत्र की समय-सीमा खत्म होने से पहले नवीकरण के लिए आवेदन न किया गया हो या मंज़ूरी न मिले। ऐसी स्थितियों में, संस्था के विदेशी कोष और उनसे बनाई गई संपत्तियां अपने-आप एक तय अधिकारी के नियंत्रण में चली जाएंगी। संस्था के दोबारा निबंधन के बाद ही ये संपत्तियां उसे वापस मिलेंगी, हालांकि दोबारा निबंधन की समय-सीमा अभी तय नहीं की गई है। अगर दोबारा निबंधन नहीं हो पाता है, तो संपत्ति हमेशा के लिए हाथ से निकल जाएगी। इसके अलावा, अगर किसी भवन का निर्माण आंशिक रूप से विदेशी धन से हुआ है, तो पूरे भवन को ही ज़ब्त कर लिया जाएगा। फिर संबंधित संस्था को उस हिस्से को वापस पाने के लिए तय अधिकारी के पास आवेदन करना होगा, जिसका भुगतान विदेशी धन से नहीं किया गया था।

अपील का दायरा बहुत सीमित है। सक्षम अधिकारी संपत्ति के साथ जो करती है, सिर्फ़ उसी के खिलाफ़ अपील की जा सकती है, तथा प्रमाण पत्र का नवीकरण करने से इनकार करने के फैसले के खिलाफ़ अपील नहीं की जा सकती। इनकार का आदेश जारी होने से पहले सुनवाई का कोई प्रावधान नहीं है। इसका मतलब है कि जब अधिकारी नवीकरण के आवेदन की जांच-पड़ताल कर रहे होंगे, तो वह संबंधित पक्ष की बात नहीं सुनेंगे।

2026 के संशोधन बिल के हर हिस्से पर भाजपा की, या सही कहें तो शाह की मनमानी की छाप दिखती है। इसके उलट, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) पर कोई रोक-टोक नहीं है, जिसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में दिए एक बयान में 'दुनिया का सबसे बड़ा एनजीओ' बताया था। आरएसएस का कोई निबंधन नहीं है। एफसीआरए मुद्दे पर चर्चा के दौरान, संवाद के सूत्रों ने ये सवाल उठाए: 'क्या यह अपनी बड़ी गतिविधियां सिर्फ़ स्थानीय स्तर पर जुटाए गए धन से चलाता है? क्या इसे विदेश से धन नहीं मिलता? असल में, सीएसओ और एनजीओ के बीच बहुत कम फ़र्क है।' एक और परेशानी की बात पिछली तारीख से इसके लागू होने का प्रस्ताव है। शाह ने विपक्ष को ज़ुबानी भरोसा दिलाया है कि इसे पिछली तारीख से लागू नहीं किया जाएगा। लेकिन जानकार सूत्रों ने संवाद को बताया कि इसका कोई भरोसा नहीं है।

मिजोरम के मुख्यमंत्री लालदुहोमा ने 9 अगस्त को सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में केंद्र और उसके गृह मंत्री से एफसीआरए संशोधन बिल को वापस लेने और इसे और गहन विचार-विमर्श के लिए जेपीसी (संयुक्त संसदीय समिति) को भेजने का आग्रह किया। मुख्यमंत्री लालदुहोमा ने 6 अगस्त को नई दिल्ली में ईसाई समुदाय के प्रतिनिधियों के साथ शाह से मुलाकात की थी और उन्हें अपनी चिंताओं से अवगत कराया था।

इसके अलावा, मेघालय के मुख्यमंत्री कॉनरैड संगमा ने नई दिल्ली से प्रस्तावित बदलावों को लेकर राज्य की चिंताओं पर ध्यान देने का आग्रह किया है। उनका तर्क है कि संशोधित रूप में यह बिल जनसेवा में शामिल ईसाई संगठनों पर बुरा असर डालेगा। जिस खास धारा ने समुदाय को सबसे ज्यादा नाराज किया है, वह धारा है 16्र (5), जो उनके कब्जे वाली संपत्तियों- जैसे शैक्षणिक संस्थान, अस्पताल और यहां तक कि जमीन-को सरकार द्वारा अपने नियंत्रण में लेने की प्रक्रिया को आसान बना देगी। नागालैंड के मुख्यमंत्री नीफ्यू रियो ने शाह को पत्र लिखकर संसदीय समीक्षा की मांग की है।


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