भारत के लिए पाकिस्तान से ज्यादा खतरनाक है चीन
चीन का यह रवैया देश के रक्षा मंत्री रहे दिवंगत समाजवादी नेता जॉर्ज फर्नांडीस की उस चेतावनी की याद दिलाता है जिसमें उन्होंने चीन को 'भारत का दुश्मन नंबर-1' करार दिया था।

— अनिल जैन
चीन का यह रवैया देश के रक्षा मंत्री रहे दिवंगत समाजवादी नेता जॉर्ज फर्नांडीस की उस चेतावनी की याद दिलाता है जिसमें उन्होंने चीन को 'भारत का दुश्मन नंबर-1' करार दिया था। यह बात करीब ढाई दशक पुरानी है। तब भी केंद्र में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की सरकार थी और अटल बिहारी वाजपेयी उसका नेतृत्व कर रहे थे।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से लगातार अपमानजनक व्यवहार और धमकी भरे बयान झेलने के बाद अब भारत की नरेन्द्र मोदी सरकार और सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी एक बार फिर चीन की तरफ आशा भरी निगाहों से देख रही है। चीन के नेताओं से अतीत में किसी मौके पर कांग्रेस और वामपंथी दलों के नेताओं की मुलाकातों को लेकर उन्हें अक्सर 'चीन का एजेंट' और 'देशद्रोही' तक करार देते रहने वाली भाजपा और उसके मार्गदर्शक संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नेताओं ने हाल ही में अपने दिल्ली स्थित मुख्यालय में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के प्रतिनिधिमंडल से लंबी मुलाकात की है। हैरानी की बात है कि 12 जनवरी को यह मुलाकात हुई, ठीक उसी दिन चीन ने जम्मू-कश्मीर में स्थित शक्सगाम घाटी पर अपने क्षेत्रीय दावे को दोहराते हुए कहा कि -'इस घाटी में जारी चीन की बुनियादी ढांचागत परियोजनाएं पूरी तरह वैध हैं।'
इस घटनाक्रम से एक बार फिर इस बात की तसदीक होती है कि भारत की सुरक्षा के लिए चीन ही सबसे बड़ा खतरा है और भाजपा व उसकी सरकार अपनी घरेलू राजनीति और दिशाहीन विदेश नीति के चलते चीन को खतरा मानने के लिए तैयार नहीं है। यह स्थिति तब है जब पिछले एक दशक के दौरान ही चीन ने कभी लद्दाख तो कभी सिक्किम और कभी अरुणाचल प्रदेश पर न सिर्फ अपना दावा जताया है बल्कि उन इलाकों के नाम बदल कर वहां अपनी सैन्य चौकियां भी कायम की हैं। इतना ही नहीं, कुछ महीनों पहले ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान के साथ हुए भारत के सैन्य टकराव में भी चीन ने खुल कर पाकिस्तान की मदद की थी।
चीन का यह रवैया देश के रक्षा मंत्री रहे दिवंगत समाजवादी नेता जॉर्ज फर्नांडीस की उस चेतावनी की याद दिलाता है जिसमें उन्होंने चीन को 'भारत का दुश्मन नंबर-1Ó करार दिया था। यह बात करीब ढाई दशक पुरानी है। तब भी केंद्र में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की सरकार थी और अटल बिहारी वाजपेयी उसका नेतृत्व कर रहे थे।
मई, 1998 में वाजपेयी सरकार ने पोखरण-2 परमाणु परीक्षण किया था, जिसकी वजह से अमेरिका ने भारत को काली सूची में डाल दिया था। उस विस्फोट के बाद ही एनडीए सरकार के रक्षा मंत्री जार्ज फर्नांडीस ने अपने एक चौंकाने वाले बयान में सामरिक दृष्टि से चीन को भारत का दुश्मन नंबर एक करार दिया था। जार्ज का यह बयान निश्चित ही किन्हीं ठोस सूचनाओं पर आधारित रहा होगा, जो रक्षा मंत्री होने के नाते उन्हें हासिल हुई होगी। लेकिन उनका यह बयान कई लोगों को रास नहीं आया था। उनके ही कई साथी मंत्रियों ने उनके इस बयान पर नाक-भौंह सिकोड़ी थी। आज की तरह उस समय भी कांग्रेस विपक्ष में थी और उसे ही नहीं, बल्कि एनडीए की नेतृत्वकारी भाजपा और आरएसएस को भी जॉर्ज का यह बयान नागवार गुजरा था। वामपंथी दलों को तो स्वाभाविक रूप से जॉर्ज की यह साफगोई नहीं ही सुहा सकती थी, सो नहीं सुहाई थी।
यह दिलचस्प था कि संघ और वामपंथियों के रूप में दो परस्पर विरोधी विचारधारा वाली ताकतें इस मुद्दे पर एक सुर में बोल रही थीं, ठीक वैसे ही जैसे दोनों ने अलग-अलग कारणों से 1942 में 'भारत छोड़ो' आंदोलन का विरोध किया था। जॉर्ज के इस बयान के विरोध के पीछे भी दोनों की प्रेरणाएं अलग-अलग थीं। संघी कुनबा जहां अपनी चिर-परिचित मुस्लिम विरोधी ग्रंथि के चलते पाकिस्तान के अलावा किसी और देश को भारत के लिए सबसे बड़ा खतरा नहीं मान सकता था, वहीं वामपंथी दल चीन के साथ अपने वैचारिक बिरादराना रिश्तों के चलते जॉर्ज के बयान को खारिज कर रहे थे। कई तथाकथित रक्षा विशेषज्ञों और विश्लेषकों समेत मीडिया के एक बड़े हिस्से ने भी इसके लिए जॉर्ज की काफी लानत-मलानत की थी।
जॉर्ज अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन चीन को लेकर उनका आकलन समय की कसौटी पर बीते ढाई दशकों के दौरान और खास कर पिछले एक दशक में ही कई बार सही साबित हुआ है। इस समय भी चीन का रवैया जॉर्ज के कहे की तसदीक कर रहा है।
वैसे न तो चीनी खतरा भारत के लिए नया है और न ही उससे आगाह करने वाले जॉर्ज अकेले राजनेता रहे। 2017 में चीन की सेना जब डोकलाम में कई किलोमीटर अंदर तक घुस आई थी, तब संयुक्त मोर्चा सरकार में रक्षा मंत्री रहे मुलायम सिंह यादव ने भी अपने अनुभव के आधार पर चीनी खतरे के प्रति सरकार को आगाह किया था। इस मसले पर लोकसभा में बहस के दौरान मुलायम सिंह ने दो टूक कहा था कि भारत की सुरक्षा को सबसे बड़ा खतरा चीन से ही है और सरकार उसे हल्के में न ले।
दरअसल, चीन ने जब तिब्बत पर कब्जा किया था, तभी से वह भारत के लिए खतरा बना हुआ है। देश को सबसे पहले इस खतरे की चेतावनी राममनोहर लोहिया ने दी थी। तिब्बत पर चीनी हमले को उन्होंने 'शिशु हत्याÓ करार देते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से कहा था कि वे तिब्बत पर चीनी कब्जे को मान्यता न दे, लेकिन नेहरू ने लोहिया की सलाह मानने के बजाय चीनी नेता चाऊ एन लाई से अपनी दोस्ती को तरजीह देते हुए तिब्बत को चीन का अविभाज्य अंग मानने में जरा भी देरी नहीं की। यह वह समय था जब भारत को आजाद हुए महज 11 वर्ष हुए थे और माओ की सरपरस्ती में चीन की लाल क्रांति भी नौ साल पुरानी ही थी। हमारे पहले प्रधानमंत्री नेहरू तब समाजवादी भारत का सपना देख रहे थे जिसमें चीन से युद्ध की कोई जगह नहीं थी। उधर माओ को पूरी दुनिया के सामने जाहिर करना था कि साम्यवादी कट्टरता के मामले में वे लेनिन और स्टालिन से भी आगे हैं। तिब्बत पर कब्जा उनके इसी मंसूबे का नतीजा था।
इतना सब होने के बावजूद लगभग एक दशक तक भारत-चीन के बीच राजनयिक रिश्ते अच्छे रहे। लेकिन 1960 का दशक शुरू होते-होते चीनी नेतृत्व के विस्तारवादी इरादों ने अंगड़ाई लेनी शुरू कर दी थी और भारत के साथ उसके रिश्ते शीतकाल में प्रवेश कर गए। तिब्बत जब तक आजाद देश था, तब तक चीन और भारत के बीच कोई सीमा विवाद नहीं था, क्योंकि तब भारतीय सीमाएं सिर्फ तिब्बत से मिलती थीं। मगर चीन द्वारा तिब्बत को हथिया लिए जाने के बाद वहां तैनात चीनी सेना भारतीय सीमा का अतिक्रमण करने लगी। उन्हीं दिनों चीन की ओर से जारी किए गए नक्शों से भारत को पहली बार झटका लगा। उन नक्शों में भारत के सीमावर्ती इलाकों के साथ ही भूटान के भी कुछ हिस्से को चीन का भू-भाग बताया गया था। चूंकि इसी दौरान भारत यात्रा पर आए चाऊ एन लाई नई दिल्ली में पंडित नेहरू के साथ 'हिंदी-चीनी, भाई-भाई' का नारा लगाते हुए शांति के कबूतर उड़ा चुके थे, भावुक भारतीय नेतृत्व को भरोसा था कि सीमा विवाद बातचीत के जरिए निपट जाएगा। 1962 का अक्टूबर महीना भारतीय नेतृत्व के भावुक सपनों के ध्वस्त होने का रहा, जब चीन की सेना ने पूरी तैयारी के साथ भारत पर हमला बोल दिया। हमारी सेना के पास मौजूं सैन्य साज-ओ-सामान का अभाव था, लिहाजा भारत को पराजय का कड़ुवा घूंट पीना पड़ा और चीन ने हमारी हजारों वर्ग मील जमीन हथिया ली। इस तरह तिब्बत पर चीनी कब्जे के वक्त लोहिया द्बारा जताई गई आशंका सही साबित हुई।
चीन से मिले इस गहरे ज़ख्म के बाद दोनों देशों के रिश्तों पर लगभग डेढ़ दशकों तक बर्फ जमी रही, जो 1970 के दशक के उत्तरार्ध में केंद्र में पहली गैर कांग्रेसी सरकार बनने पर कुछ हद तक हटी। दोनों देशों के बीच एक बार फिर राजनयिक रिश्तों की बहाली हुई। तब से लेकर अब तक दोनों देशों के बीच राजनयिक रिश्ते भी बने हुए हैं और पिछले दो दशकों के दौरान दोनों देशों के बीच व्यापार में 25 गुना से भी ज्यादा इजाफा हुआ है। अब वह 100 अरब डॉलर तक पहुंच गया है। इस सबके बावजूद चीन के विस्तारवादी इरादों में कोई तब्दीली नहीं आई है। उसके इस रवैये की सबसे बड़ी वजह भारत के राजनीतिक नेतृत्व की कमजोरी है, जो कभी भारतीय सीमा में चीन की घुसपैठ होने से इनकार कर देता है तो कभी कहता है कि चीन के मुकाबले हमारी अर्थव्यवस्था छोटी है, इसलिए उससे नहीं लड़ा जा सकता। अलबत्ता वह कभी-कभी चीनी सामान का बहिष्कार करने और आत्मनिर्भर बनने जैसे शगूफे भी छोड़ता रहता है, जिसे चीनी नेतृत्व खूब समझता है। इस समय भी यही सब हो रहा है।
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)


