चीन कई मोर्चों पर भारत के लिए मुश्किल खड़ी करता है
हाई टेक्नालॉजी जैसे क्षेत्रों को छोड़कर सामान्य चीजों पर कर की दरें बढ़ाने से भारत में इन्हें बनाने का प्रोत्साहन मिलेगा।

राजेश पांडेय
हाई टेक्नालॉजी जैसे क्षेत्रों को छोड़कर सामान्य चीजों पर कर की दरें बढ़ाने से भारत में इन्हें बनाने का प्रोत्साहन मिलेगा। चीन की कम्युनिस्ट सरकार मैन्युफैक्चरिंग, इनोवेशन के लिए चीनी कंपनियों को भारी सब्सिडी देती है, भारत भी ऐसा कर सकता है। हमें चीन का रास्ता आसान बनाने और ज्यादा व्यापार करके उसकी ताकत बढ़ाने की बजाय दूसरा रास्ता अपनाने की जरूरत है।
छले कुछ दिनों से भारत-चीन के बीच सीमा विवाद सतह पर नजर आ रहा है। चीन ने अपनी पुरानी रणनीति के तहत अरुणाचल प्रदेश पर दावा जताने के लिए कुछ स्थानों के नए नाम घोषित किए हैं। ऐसा वह 2017 से बार-बार कर रहा है। भारत ने इसका विरोध किया है। चीन अहम मौकों पर सीमा के मुद्दे को गर्म रखने की कोशिश करता है। 2014 में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच अहमदाबाद में बातचीत हो रही थी तब चीनी सैनिकों ने चुमार और डेमचोक में घुसपैठ की थी। उस समय मोदी ने शी के सामने यह मुद्दा उठाया था। अब सितंबर में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के ब्रिक्स सम्मेलन में भारत आने की संभावना है। भारत को सीमा विवाद में उलझाने के साथ चीन आर्थिक और कूटनीतिक मोर्चे पर भी उसके लिए रास्ते में बाधा डालता है।
अप्रैल में चीन ने अरुणाचल प्रदेश में 27 स्थानों के चीनी नाम घोषित किए। उस समय भारतीय विदेश मंत्रालय ने कहा था, काल्पनिक नाम रखने से हकीकत नहीं बदल जाएगी। अरुणाचल प्रदेश भारत का अभिन्न हिस्सा था और हमेशा रहेगा। भारत ने अपने अधिकार को और स्पष्ट करते हुए 7 अगस्त को अरुणाचल के 27 स्थानों को सर्वे ऑफ इंडिया के नक्शे में दिखाया है। भारत की यह कार्रवाई अरुणाचल में चीनी सेना की घुसपैठ की अपुष्ट खबरों के बाद की गई है। हालांकि, अरुणाचल के मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने चीनियों की घुसपैठ से इंकार किया है।
चीन अरुणाचल को दक्षिण तिब्बत कहता है। वह उस पर भारत के अधिकार को मान्यता नहीं देता है। वह भारत-चीन सीमा तय करने वाली मैकमोहन रेखा को स्वीकार नहीं करता है। मार्च 1914 में शिमला कांफ्रेंस में ब्रिटिश भारत के विदेश मंत्री हेनरी मैकमोहन और तिब्बत के बीच मैकमोहन रेखा पर समझौता हुआ था। चीन का तर्क है चूंकि तिब्बत स्वायत्त नहीं था इसलिए उसे अंतरराष्ट्रीय समझौते करने का अधिकार नहीं था। चीन अकेले अरुणाचल नहीं बल्कि लद्दाख, अक्साई चिन सहित कई भारतीय इलाकों को अपना क्षेत्र बताता है। अपने दावे को मजबूत बनाने के लिए चीन समय-समय पर भारतीय सीमा में घुसपैठ करता है। पिछले दस-बारह वर्षों में उसने कई बार ऐसा किया है। 2020 में तो भारतीय-चीनी सैनिकों के बीच गलवान में हिंसक झड़प हो गई थी।
चीन कई अन्य तरीकों से भारत के खिलाफ आक्रामक रवैया अपनाता है। वह जम्मू-कश्मीर और अरुणाचल निवासियों के लिए स्टेपल्ड वीसा जारी करता है। स्टेपल्ड वीसा पासपोर्ट का हिस्सा नहीं होते हैं बल्कि उसके साथ अलग कागज पर अटैच किए जाते हैं। ऐसा संंबंधित क्षेत्र पर किसी देश की संप्रभुता को मान्यता न देने के लिए करते हैं। चीन यारलंग सांगपो नदी (भारत में इसका नाम ब्रह्मपुत्र है।) पर विराट बांध बना रहा है। उससे 60 हजार मेगावाट बिजली पैदा करने की योजना है। बांध के मामले में उसने भारत को भरोसे में लेेने की जरूरत नहीं समझी है। भारत ने 6 अगस्त को सीमायी मामलों पर समन्वय की 36वीं बैठक में सीमा विवाद के साथ बांध का मुद्दा भी उठाया है।
चीन ने भारत के साथ दुश्मनी रखने वाले पाकिस्तान से गहरे आर्थिक और सामरिक संबंध कायम किए हैं। उसने 1955 से पाकिस्तान को अपने खेमे में शामिल करने की शुरुआत कर दी थी। चीन ने मई 2025 में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान अपने उपग्रहों से भारतीय सैनिक हलचल की जानकारी दी थी। वह संयुक्त राष्ट्र में भारत विरोध का एजेंडा चलाए रखता है। चीन ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में पाकिस्तान समर्थक आतंकवादी संगठनों पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव वीटो से रोका है। उसने सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता का विरोध किया है। वह परमाणु सप्लायर ग्रुप में भारत को शामिल करने के खिलाफ है।
चीन वैश्विक राजनीति खासकर एशिया में भारत को अपना प्रमुख प्रतिद्वंद्वी मानता है। भारत अपनी बड़ी आबादी, विशाल क्षेत्रफल, प्राकृतिक संसाधनों और मजबूत सेना के कारण कम्युनिस्ट देश के लिए कड़ी चुनौती पेश करता है। उसके पास साइंस, टेक्नालॉजी, मेडिकल साइंस और विशेषज्ञता के कुछ अन्य क्षेत्रों में बड़ी मानव शक्ति है। अलबत्ता टेक्नालॉजी के कुछ क्षेत्रों में वह चीन से पीछे है। भारत की अर्थव्यवस्था का आकार चीन की तुलना में लगभग चार गुना कम है। भारत की ताकत चीन के विस्तारवाद को रोकने का हथियार बन सकती है। इसलिए पिछले कुछ अमेरिकी राष्ट्रपतियों ने एशिया में उसे चीन के मुकाबले खड़ा करने की कोशिश की है। लेकिन डोनाल्ड ट्रम्प के दोबारा राष्ट्रपति बनने के बाद स्थितियां बदल गई हैं।
ट्रम्प अस्थिर मिजाज के नेता हैं। वे जब चाहे अपना रुख बदल लेते हैं। उनके अप्रत्याशित रवैये को ध्यान में रखकर यूरोप और एशिया में अमेरिका के सहयोगी देश अपना रास्ता खुद बना रहे हैं। वे चीन, रुस के हमले की स्थिति में अमेरिका पर निर्भर रहने की बजाय अपनी सैनिक क्षमता में इजाफा कर रहे हैं। ताइवान भी चीनी हमले से निपटने की पूरी तैयारी कर चुका है। पहले वह अमेरिका पर बहुत कुछ निर्भर था। इस बदलाव के प्रकाश में भारत को भी अपनी रणनीति तय करना चाहिए। भले ही चीन से उसका अरबों रुपए का व्यापार है। लेकिन, उसकी तरफ से पूरी तरह निश्चिंत रहना बड़ी भूल होगी। भारत ने 1962 में चीन पर भरोसा करके बहुत बड़ी कीमत चुकाई थी।
चीन अपने कूटनीतिक और सामरिक उद्देश्यों को पूरा करने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। भारत इस भरोसे में नहीं रह सकता कि चीन से बड़े पैमाने पर कारोबार करने के कारण वह पूरी तरह सुरक्षित है। चीन से भारत का कारोबार लगभग एकतरफा है। उसे बीते कई साल से आयात, निर्यात कारोबार में चीन से 100 अरब डॉलर से अधिक (9 से 10 लाख करोड़ रुपए) का घाटा उठाना पड़ रहा है। 2026 के पहले छह महीनों में भारत ने चीन से सात लाख करोड़ रुपए से अधिक का सामान मंगवाया है। जबकि उसने चीन को सिर्फ 1.17 लाख करोड़ रुपए का माल भेजा है। छह माह के आंकड़ों को देखते हुए लगता है कि भारत इस साल चीन से आयात का रिकॉर्ड तोड़ देगा।
एकतरफ तो चीन हर बिंदु पर भारत को नीचा दिखाता है। उसे कमजोर करने की कोशिश करता है। विश्व में उसकी प्रतिष्ठा को आघात पहुंचाता है। वहीं हम अंधाधुंध माल खरीदकर उसकी ताकत बढ़ा रहे हैं। भारत चीन से इलेक्ट्रॉनिक्स उपकरण और मैन्युफैक्चरिंग के लिए जरूरी सामान मंगवाता है। हम चीन को केमिकल्स, अयस्क, धातुएं, आभूषण, रत्न और सीफूड भेजते हैं। भारत दवाइयों का बड़ा निर्यातक हो सकता है। वह अमेरिका सहित पश्चिमी देशों को काफी दवाइयों की सप्लाई करता है। चीन में भारत के राजदूत विक्रम दोराईस्वामी ने अभी हाल में कहा है कि भारत ऐसे क्षेत्रों में चीन को माल की सप्लाई कर सकता है जिनमें वह आगे है। बीजिंग में विश्व शांति फोरम की बैठक मेें उन्होंने कहा, जरूरी नहीं है कि आयात-निर्यात बराबर हो लेकिन फार्मास्युटिकल्स जैसे सामान भेजे जा सकते हैं।
चीन से सस्ते सामान के आयात में भारतीय व्यवसायियों की दिलचस्पी रहती है। वे कई किस्म के उपभोक्ता सामान सस्ती दरों पर चीन से मंगवाते हैं, उनका लेबल बदलते हैं, अपना लेबल लगाकर ऊंची कीमतों पर भारत में बेचते हैं। इससे भारत को कई नुकसान हैं। उसकी मैन्युफैक्चरिंग क्षमता में वांछनीय बढ़ोतरी नहीं हो रही है। अमेरिका-चीन के बीच व्यापार युद्ध छिड़ने के बाद कई अमेरिकी कंपनियों ने चीन में अपनी मैन्युफैक्चरिंग बंद कर दी है। उम्मीद की जा रही थी कि मैन्युफैक्चरिंग का बड़ा हिस्सा भारत में आएगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ है। मेक्सिको, वियतनाम, इंडोनेशिया जैसे देशों को ज्यादा फायदा मिल गया। मैन्युफैक्चरिंग कम होने से इनोवेशन पर भी ज्यादा गौर नहीं किया जा रहा है।
भारतीय आईटी कंपनियों की दुनिया में अच्छी साख है। उन्हें अमेरिका और यूरोपीय देशों से इंटरनेट पर आधारित सेवाओं का बिजनेस मिलता है। लेकिन वे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के क्षेत्र में अमेरिका, चीन से पिछड़ गई हैं। शायद नई चीज खोजने की जरूरत और उससे संबंधित ढांचा कमजोर होने की वजह से भारत एआई में बहुत आगे नहीं बढ़ सका है। इस तरह हम अप्रत्यक्ष रूप से चीन की मदद करते हैं। दरअसल, भारत सरकार और कॉरपोरेट जगत को कारोबार में चीन का दबदबा कम करने की रणनीतिक जरूरत को ध्यान में रखकर उससे आयात कम करना चाहिए। हमारे यहां चीन से बच्चों के खिलौने, सजावट के सामान, भगवानों की मूर्तियों सहित कई बहुत साधारण किस्म के सामान बड़े पैमाने पर मंगवाए जा रहे हैं। यह वस्तुएं ऐसी नहीं हैं कि इन्हें बनाने के लिए हाई टेक्नालॉजी की जरूरत पड़े। सस्ते होने की वजह से ऐसी वस्तुएं चीन से आयात की जा रही हैं। इनका आयात कम करने के लिए सरकार ज्यादा टैक्स लगा सकती है। हाई टेक्नालॉजी जैसे क्षेत्रों को छोड़कर सामान्य चीजों पर कर की दरें बढ़ाने से भारत में इन्हें बनाने का प्रोत्साहन मिलेगा। चीन की कम्युनिस्ट सरकार मैन्युफैक्चरिंग, इनोवेशन के लिए चीनी कंपनियों को भारी सब्सिडी देती है, भारत भी ऐसा कर सकता है। हमें चीन का रास्ता आसान बनाने और ज्यादा व्यापार करके उसकी ताकत बढ़ाने की बजाय दूसरा रास्ता अपनाने की जरूरत है। आत्मनिर्भर भारत के नारे को वास्तविकता की जमीन पर उतारने के लिए कारगर रणनीति और फैसले लेना समय का तकाजा है।


