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ललित सुरजन की कलम से छत्तीसगढ़: वर्तमान सांस्कृतिक परिदृश्य

सर्वविदित है कि मल्हार में प्राप्त विष्णु प्रतिमा लगभग इतनी ही पुरानी है।

ललित सुरजन की कलम से छत्तीसगढ़: वर्तमान सांस्कृतिक परिदृश्य
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'छत्तीसगढ़ का चालीस प्रतिशत से अधिक भूभाग यद्यपि वनों से आच्छादित है, किन्तु यहां विकसित नागर सभ्यता होने के चिन्ह लगभग दो हजार वर्ष पूर्व से मिलते हैं। सर्वविदित है कि मल्हार में प्राप्त विष्णु प्रतिमा लगभग इतनी ही पुरानी है। इसके बाद सिरपुर, रतनपुर, बारसूर आदि स्थान हैं, जो छत्तीसगढ़ के प्राचीन सांस्कृतिक वैभव के साक्ष्य हैं। यहां हम सिर्फ उदाहरण के लिए कुछ नाम दे रहे हैं ताकि पाठकों के सामने एक रूपरेखा रखी जा सके। ये प्राचीन मंदिर किस राजा ने बनवाए थे, इनके स्थपति कौन थे, इन मूर्तियों को किन्होंने गढ़ा था, यह सब विशद विवेचन का विषय है। फिलहाल इतना जान लेना रोचक है कि दो हजार वर्ष से छत्तीसगढ़ में सभ्यता का विकास व प्रकृति का संरक्षण समानांतर होते आया है। इस मायने में छत्तीसगढ़ की स्थिति अन्य प्रदेशों से भिन्न कही जा सकती है।'

'यह अनुभव अपने आप में मुग्ध कर देने वाला है कि आप प्रदेश के उत्तरी भाग में याने सरगुजा अंचल में घने जंगलों के बीच किसी निर्जन सी सड़क पर प्रकृति की शोभा निहारते चले जा रहे हैं और अचानक आपके सामने कहीं महेशपुर तो कहीं डीपाडीह के ध्वंसावशेष सामने आ गए हैं। ऐसा अनुभव आपको बस्तर में भी हो सकता है या कवर्धा, राजनांदगांव, महासमुंद, सारंगढ़, धमतरी या गरियाबंद में भी। फिंगेश्वर के प्राचीन फणेश्वर महादेव मंदिर को देखकर मेरे मित्र त्रिभुवन पांडेय ने अनुमान लगाया था कि प्राचीन समय में मंदिर शिल्पियों का कोई बड़ा कुनबा रहा होगा, जिसने देशाटन करते हुए राजाओं के आदेश-अनुग्रह से इन मंदिरों का निर्माण किया होगा। बड़े राजा के यहां बड़ा मंदिर, छोटे राजा के यहां छोटा। भाई त्रिभुवन के अनुसार ये उस समय के मंदिर 'कांट्रेक्टर' रहे होंगे। है न बात विचार करने योग्य!'

(अक्षर पर्व नवंबर 2014 अंक की प्रस्तावना)

https://lalitsurjan.blogspot.com/2014/11/blog-post_9.html


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