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संघ को चंपत राय की चपत

भाजपा तथा उसके नेताओं ने राममंदिर की राजनीति का चाहे जितना उपयोग किया हो सीधे फंसने वाले सारे तार संघ से ही जुड़े दिखते हैं।

संघ को चंपत राय की चपत
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भाजपा और केंद्र सरकार की चुप्पी के बीच आरएसएस की तरफ से आया बयान कई मायने में ज्यादा महत्वपूर्ण है क्योंकि सौ साल के इतिहास में वह पहली बार इस तरह से किसी बड़े और चर्चित हिन्दू मामले में 'फंसा' दिखता है। भाजपा तथा उसके नेताओं ने राममंदिर की राजनीति का चाहे जितना उपयोग किया हो सीधे फंसने वाले सारे तार संघ से ही जुड़े दिखते हैं।

जिस दिन सुप्रीम कोर्ट ने चढ़ावा चोरी से जुड़ी चार याचिकाओं को साथ जोड़कर विचार करते हुए केंद्र सरकार, उत्तर प्रदेश राज्य सरकार और राम मंदिर ट्रस्ट की चोरी संबंधी जांच ट्राइब्यूनल से रिपोर्ट की मांग की उससे ठीक एक दिन पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने चढ़ावा चोरी पर 'दुख' जाहिर किया और तीर्थ क्षेत्र न्यास की शिकायत पर हो रही जांच पर संतोष जताया। तुषार मेहता उस दिन भी अदालत में यही गुहार लगाते रहे कि वह केंद्र को बयान का निर्देश न दे। हम जानते हैं कि चढ़ावा चोरी मामले के सवा महीने पहले हुए खुलासे के बाद से केंद्र सरकार और उसके मुखिया नरेंद्र मोदी ने, जिन्होंने मंदिर का उद्घाटन करने से लेकर न्यास के लिए खास कानून बनवाने में विशेष रुचि दिखाई थी, इस बारे में एक शब्द भी नहीं बोला है। इस मामले पर भाजपा टीवी डिबेट में अपने प्रवक्ता भेजने से भी बचती रही है और कुछ संघ विचारकों और राजनीतिक विचारकों के सहयोग से ही उसका पक्ष आता रहा है।

भाजपा और केंद्र सरकार की चुप्पी के बीच आरएसएस की तरफ से आया बयान कई मायने में ज्यादा महत्वपूर्ण है क्योंकि सौ साल के इतिहास में वह पहली बार इस तरह से किसी बड़े और चर्चित हिन्दू मामले में 'फंसा' दिखता है। भाजपा तथा उसके नेताओं ने राममंदिर की राजनीति का चाहे जितना उपयोग किया हो सीधे फंसने वाले सारे तार संघ से ही जुड़े दिखते हैं। बात सिर्फ चंपत राय, अनिल मिश्र और गोपाल राव जैसों का ही नहीं है, जिन आठ लोगों को आरोपी बनाया गया है उनमें से ज्यादातर के तार संघ के लोगों या उनके द्वारा बनाई संस्थाओं से जुड़े हैं और वहां से उनको ठेके पर चोरी वाले धंधे में लगाया गया था। कंबल ओढ़कर घी पीने के अभ्यस्त संघी नेताओं की ऐसी सीधी भागीदारी प्राय: किसी घोटाले में नहीं दिखती। वह सब मंत्रियों, संतरियों, सांसदों, विधायकों के मत्थे चला जाता था। इसीलिए संघ के शताब्दी वर्ष पर हुए तीन दिवसीय बेलगावी चिंतन बैठक के बाद संघ विस्तार योजना, दैनिक शाखा, संघ कार्यपद्धति, ग्राम विकास, कुटुंब प्रबोधन, आपदा प्रबंधन और पर्यावरण के सवाल पर क्या चर्चा हुई या शाखा विस्तार योजना में क्या कुछ तैयारी हुई, इसकी बात से ऊपर चढ़ावा चोरी पर आधिकारिक लाइन लेने और बताने की जरूरत महसूस की गई।

संघ क्या है, क्या करता है अब सेवा का कितना और कैसा काम करता है और भाजपा तथा मोदी जी को सत्ता में लाने के काम में उसने क्या मदद की है, इसकी चर्चा यहां नहीं होगी। एक लाइन में बताना जरूरी है कि इधर संघ ने कोविड या बाढ़ या किसी प्राकृतिक आपदा में कोई काम किया हो यह नहीं मालूम पर भाजपा की सभाओं में ट्रैफिक संचालन से लेकर मतदान केंद्रों पर वोट डलवाने जैसे कामों में उसके स्वयंसेवक हर किसी को नजर आते हैं। फिर यह भी हुआ है कि घोषित रूप से किसी राम जी, किसी कृष्ण जी, किसी शिव जी की जगह उसे अपना ध्वज अपनी श्रद्धा का सबसे प्रमुख केंद्र लगता है और भारत माता ही उसके लिए सबसे बड़ी देवी रही हैं। राम मंदिर आंदोलन से लेकर नामांतरण और बूथ स्तर पर मतदाता सूची के संशोधन से लेकर केंद्र सरकार के गठन, राज्यपाल से लेकर विश्वविद्यालयों और मीडिया हाउसों की नियुक्ति-प्रोन्नति में उसका हाथ रहा है। बार-बार हुए पेपर लीक प्रकरण में साफ हुआ कि जिस संस्था को परीक्षा कराने का ठेका दिया जाता है उसके संचालन से लेकर प्राइवेट सिक्युरिटी एजेंसी और हर ठेके के काम के पीछे प्रकट और अप्रकट रूप में असली लाभार्थी उसके लोग ही हैं।

राम मंदिर मामले में उसकी हर स्तर की भागीदारी और नियंत्रण ही नहीं भाजपा के साथ खेले जाने वाले खेल की हर परत साफ ढंग से सामने आ गई है और अगर उसमें चंदे की गड़बड़ से लेकर जमीन की रजिस्ट्री और चढ़ावा चोरी जैसा खुलासा हुआ है तो अब संघ न चंपत राय को पराया बता सकता है न अनिल मिश्र और दूसरे सभी महत्वपूर्ण आरोपियों को। कोई ज्यादा ऊंची कल्पना करता है तो नरेंद्र मोदी, अमित शाह, योगी, नृपेन्द्र मिश्र जैसे लोगों को असली सूत्रधार बताने तक पहुंचता है लेकिन मंदिर बनवाने से लेकर अभी तक संचालन के काम में चंपत राय जैसों की भूमिका को कौन अनदेखा कर सकता है। दिलचस्प यह है कि जो संघ खुलकर हिन्दू होने की बात भी करने से परहेज करता है वह उसके रामानुज पंथ के मंदिर निर्माण और संचालन में अपने 'तपे-तपाए' लोगों को लगाने में भी हिचक नहीं दिखाता। हजार नाम से काम करने वाले संगठनों के काम पर उंगली उठने से वह सीधे अपनी भूमिका से इनकार कर देता था। बीच दिल्ली में विशाल दफ्तर बनाने और कायदे कानून की परवाह न करने जैसे अपराध की कोई माफी और अनदेखी हो सकती है राम के नाम पर घपले में यह संभव नहीं है।

संयोग से राम मंदिर वह पहला सार्वजनिक मसला है जो अब साफ तौर से संघ के हाथ की चीज दिखता है। और सौ साल लाठी भांजने और न जाने क्या-क्या करने के बाद मिली इस पहली ही जिम्मेदारी में संघ इस बुरी तरह असफल हुआ है तो उसे भाजपा से भी पहले बयान देना जरूरी लगे इसमें हैरानी की कोई बात नहीं है। संघ प्रमुख को अकेले इसी एक मामले को नहीं देखना चाहिए। उनको ध्यान देना चाहिए कि वे हिन्दू-मुसलमान सवाल पर पिछले काफी समय से क्या राय जाहिर करते हैं, हर मस्जिद के नीचे मंदिर के अवशेष न तलाशने की सलाह देते हैं तो उस पर संघियों ने ही कितना अमल किया है। और जिस भाजपा को सत्ता दिलाने में उसके स्वयंसेवक जी जान लगाते हैं उसके नेता संघ की कितनी परवाह करते हैं। एक भाजपा अध्यक्ष ने घोषित ही कर दिया की अब हमें संघ की जरूरत नहीं है तो संघ के लोगों को बुरा लगा लेकिन जब उससे पूछे या बताए बगैर लिटिल नवीन को अध्यक्ष बना दिया आज्ञा तो संघ को सिगनल समझना चाहिए था। और अब तो लगता है कि संघ भी उनकी कम ही सुन रहा है। ऐसे में केंद्र और राज्य सरकार चढ़ावा चोरी मामले में जो रुख अपनाए संघ को ऐसा उदाहरण पेश करना चाहिए जिससे लगे कि उसकी सौ साल की कवायद व्यर्थ न थी। इस मामले में सार्वजनिक धन की चोरी पर गांधी द्वारा दी गई सजायें नजीर बन सकती हैं जिसकी चर्चा फिर कभी।


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