ब्रिक्स सम्मेलन : भारत-चीन रिश्तों की अब असली परीक्षा
चीन के साथ रिश्तों में नरमी आने से अमेरिका, यूरोप, जापान या क्वाड के साथ भारत के संबंधों पर असर नहीं पड़ना चाहिए।

- डॉ.अजीत रानाडे
चीन के साथ रिश्तों में नरमी आने से अमेरिका, यूरोप, जापान या क्वाड के साथ भारत के संबंधों पर असर नहीं पड़ना चाहिए। भारत को ब्रिक्स, एससीओ, क्वाड, जी-20 और अन्य उपयोगी समूहों में एक साथ सक्रिय रहना चाहिए। भारत के भविष्य के फैसले इनमें से किसी भी रिश्ते के बंधक नहीं हो सकते। यही रणनीतिक स्वायत्तता है। अगले साल चीन ब्रिक्स की अध्यक्षता संभालेगा।
दिल्ली में हाल ही में हुए ब्रिक्स समिट को शायद किसी बहुत दमदार घोषणा के लिए याद न किया जाए लेकिन इस सम्मेलन की वजह से भारत को होने वाले ज़्यादा अहम नतीजे पर ध्यान नहीं जा पाएगा। क्या ब्रिक्स ने भारत-चीन रिश्तों में सुधार की रफ़्तार बढ़ाने में मदद की?
भारत की कूटनीतिक कामयाबी यह नहीं थी कि उसने समिट का आयोजन किया क्योंकि वैसे भी ब्रिक्स की अध्यक्षता भारत के पास ही थी। असल कामयाबी यह थी कि वह ऐसे देशों के बीच एक साझा घोषणापत्र तैयार करवा पाया जिनके हित अक्सर टकराते हैं। तनाव के बावजूद ईरान और यूएई एक ही मेज़ पर बैठ सके, चीन पहलगाम आतंकी हमले की निंदा करने वाली भाषा पर सहमत हो सका और सदस्य देश पश्चिम एशिया में बातचीत पर सहमत हो सके जबकि उनके गुट और झुकाव बिल्कुल अलग-अलग थे। भारत ने 2023 में अपनी जी-20 अध्यक्षता के दौरान भी कुछ ऐसा ही किया था जब उसने यूक्रेन मुद्दे पर गहरे मतभेदों के बावजूद आम सहमति वाली भाषा तैयार की थी।
यहां हमारे अपने देश के लिए भी एक सबक है। अगर भारत ब्रिक्स के भीतर विरोधाभासों को संभाल सकता है तो वह चीन के साथ अपने कई तरह के रिश्तों में मौजूद विरोधाभासों को क्यों नहीं संभाल सकता?
समिट के दौरान मोदी और शी की मुलाक़ात साझा बयान से कहीं ज़्यादा अहम थी। शी सात साल में पहली बार भारत के दौरे पर आए थे। दोनों नेताओं ने सीमा पर शांति, व्यापारिक संबंधों, बाज़ार तक पहुंच, व्यापार में संरचनात्मक असंतुलन और आपसी आदान-प्रदान बढ़ाने पर चर्चा की। इसे सुलह कहना बेवकूफी होगी लेकिन यह निश्चित से एक मौका है।
भारत और चीन पड़ोसी हैं और दोनों मिलकर दुनिया की एक-तिहाई से ज़्यादा आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं। भूगोल को बदला नहीं जा सकता और न ही दोनों के बीच का सीमा विवाद जल्द खत्म होने वाला है। 1988 में डेंग ज़ियाओपिंग ने राजीव गांधी को जो मशहूर सलाह दी थी वह आज भी प्रासंगिक है-'अगर हमारी पीढ़ी में सीमा विवाद को सुलझाने की समझ नहीं है तो इसे आने वाली ज़्यादा समझदार पीढ़ी पर छोड़ देना चाहिए।Ó
इसका मतलब गलवान को भूलना नहीं है जहां 2020 में 20 भारतीय सैनिक शहीद हुए थे। सीमा की मज़बूती से रक्षा की जानी चाहिए लेकिन पूरे रिश्ते को ठप किए बिना सीमा पर तनाव को सीमित रखा जा सकता है।
असल में, भारत और चीन पहले से ही अलग-अलग मुद्दों को अलग-अलग रखकर काम कर रहे हैं। बिश्केक में शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) शिखर सम्मेलन में उन्होंने पाकिस्तान, रूस और अन्य देशों के साथ मिलकर आतंकवाद से निपटने में दोहरे मापदंडों को खारिज करने वाले एक घोषणापत्र का समर्थन किया। अगर एससीओ और ब्रिक्स के भीतर ऐसे विरोधाभासों को संभाला जा सकता है तो उन्हें द्विपक्षीय स्तर पर भी संभाला जा सकता है।
इस तरह की यथार्थवादी सोच के पीछे मज़बूत आर्थिक कारण हैं। चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा लगभग 112 अरब डॉलर है। फिर भी हमारी निर्भरता मुख्यरूप से सस्ते खिलौनों पर नहीं है। चीन ज़रूरी एपीआई, इलेक्ट्रॉनिक पुज़ेर्, मशीनरी, सोलर इनपुट और प्रोसेस किए गए अहम खनिज सप्लाई करता है। गलवान के बाद भारत ने चीनी निवेश और तकनीक तक पहुंच को कड़ा कर दिया। फिर भी आयात बढ़ता रहा। राजनीतिक जुड़ाव कम करने की कोशिश से आर्थिक निर्भरता खत्म नहीं हुई।
चीन के प्रति भारत का नज़रिया किसी याचक जैसा नहीं है। चीन की आर्थिक ताक़त ज़बरदस्त है लेकिन उसमें कुछ गंभीर कमज़ोरियां भी हैं। वहां की आबादी बूढ़ी हो रही है, वर्कफ़ोर्स कम हो रहा है, प्रॉपर्टी सेक्टर मुश्किलों में है, कज़र् ज़्यादा है, घरेलू खपत कमज़ोर है और ज़रूरत से ज़्यादा इंडस्ट्रियल कैपेसिटी के लिए बाहरी बाज़ारों की ज़रूरत बढ़ रही है। अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष को उम्मीद है कि मध्यम अवधि में विकास दर धीमी रहेगी क्योंकि डेमोग्राफ़िक्स, कमज़ोर प्रोडक्टिविटी और निवेश पर घटता रिटर्न असर डालेंगे। इसलिए चीन को भी भारत की ज़रूरत है।
भारत दुनिया के सबसे बड़े और तेज़ी से बढ़ते बाज़ारों में से एक है। यहां युवा वर्कफ़ोर्स है और यह चीनी पूंजी के लिए एक विकल्प है जिसे दूसरी जगहों पर बढ़ती रुकावटों का सामना करना पड़ रहा है। सही प्रतिक्रिया यह नहीं है कि 'चीन को बाहर रखोÓ, बल्कि यह है कि अगर आप भारतीय बाज़ार तक पहुंच चाहते हैं तो यहां मैन्युफ़ैक्चरिंग करें, यहां लोगों को रोज़गार दें, यहां से ज़्यादा सामान खरीदें और यहीं से एक्सपोर्ट करें।
प्रेस नोट 3 प्रतिशत पर बिना सोचे-समझे शक करने के बजाय जोखिम के आधार पर जांच की ओर बढ़ना चाहिए। टेलीकॉम नेटवर्क में चीन की भागीदारी, हाईवे, वेयरहाउस, पानी या सिंचाई प्रोजेक्ट में चीन की सिर्फ़ पूंजी (कैपिटल) लगाने से साफ़ तौर पर और अलग है। इसे अलग-थलग रहकर जुड़ाव (क्वारंटीन्ड एंगेजमेंट) कहा जा सकता है।
चीनी पर्यटकों, बिज़नेस के लिए आने वालों, शिक्षाविदों और इंजीनियरों के लिए वीज़ा प्रक्रिया आसान बनाई जाए। ज़्यादा सीधी उड़ानें फिर से शुरू की जाएं। चीनी पर्यटकों के लिए एक खास तौर पर प्रमोट किया जाने वाला बौद्ध सर्किट- बोधगया, सारनाथ, कुशीनगर और नालंदा- बनाया जाए। संवेदनशील न माने जाने वाले विषयों में यूनिवर्सिटी पार्टनरशिप को फिर से शुरू किया जाए। सिनेमा, खेल और सांस्कृतिक आदान-प्रदान को बढ़ावा दिया जाए। मानवता का इतना बड़ा हिस्सा होने वाली दो सभ्यताओं के बीच बातचीत मुख्यरूप से सैनिकों, कस्टम अधिकारियों और राजनयिकों के ज़रिए ही नहीं होनी चाहिए।
साथ ही, भारत को चीन के विशाल कंज्यूमर मार्केट तक पहुंच पाने पर कहीं ज़्यादा ज़ोर देना चाहिए। ट्रेड डेफिसिट (व्यापार घाटे) का समाधान सिफ़र् चीनी आयात कम करना नहीं हो सकता। इसके बजाय चीन में भारतीय फार्मास्यूटिकल्स, खाद्य उत्पादों, सेवाओं, मनोरंजन और अन्य सामानों की पहुंच बढ़नी चाहिए।
'ईज़ ऑफ़ डूइंग बिज़नेस' रैंकिंग खराब होने और पाश्चात्य शैली के लोकतांत्रिक संस्थानों की कमी के बावजूद चीन की ज़बरदस्त ग्रोथ यह याद दिलाती है कि उसे वैसा ही समझा जाना चाहिए जैसा वह है, न कि वैसा जैसा थ्योरी कहती है कि उसे होना चाहिए। भारत को न तो चीन की नकल करनी चाहिए और न ही उससे डरना चाहिए। उससे सीखना चाहिए, मुकाबला करना चाहिए और अपनी क्षमताएं विकसित करनी चाहिए- एयरोस्पेस, डिफेंस, सेमीकंडक्टर, ज़रूरी मिनरल्स, फार्मास्यूटिकल्स और खासकर कृत्रिम बुद्धिमत्ता (आर्टिफिशयल इंटलिजेन्स- एआई) के क्षेत्र में।
चीन के साथ रिश्तों में नरमी आने से अमेरिका, यूरोप, जापान या क्वाड के साथ भारत के संबंधों पर असर नहीं पड़ना चाहिए। भारत को ब्रिक्स, एससीओ, क्वाड, जी-20 और अन्य उपयोगी समूहों में एक साथ सक्रिय रहना चाहिए। भारत के भविष्य के फैसले इनमें से किसी भी रिश्ते के बंधक नहीं हो सकते। यही रणनीतिक स्वायत्तता है।
अगले साल चीन ब्रिक्स की अध्यक्षता संभालेगा। अगले बारह महीने एक अनोखा मौका देते हैं।
रिश्तों में नरमी के लिए दोस्ती या भरोसे की ज़रूरत नहीं होती। इसके लिए आपसी हित और थोड़ी दूरदर्शिता की ज़रूरत होती है। जहां ज़रूरी हो, वहां सुरक्षा करें। जहां उचित हो, वहां मुकाबला करें। जहां संभव हो, वहां सहयोग करें तथा जुड़ाव से बने समय और मौके का इस्तेमाल मज़बूत बनने के लिए करें।
ब्रिक्स ने शायद रिश्तों की बर्फ़ पिघलाने का काम किया है। भारत और चीन को अब यह देखना चाहिए कि क्या वे उस पल को एक काम के रिश्ते में बदल सकते हैं।
(लेखक प्रसिद्ध अर्थशास्त्री हैं। सिंडिकेट: द बिलियन प्रेस)


