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प्रतिभा पलायन: क्या भारत अपनी वैज्ञानिक पूंजी सहेज पाएगा?

राष्ट्र केवल प्रक्षेपण यानों से अंतरिक्ष शक्ति नहीं बनते, वे उन वैज्ञानिकों के विश्वास से बनते हैं जो अपना सर्वश्रेष्ठ ज्ञान अपने ही देश को समर्पित करने का निर्णय लेते हैं।

प्रतिभा पलायन: क्या भारत अपनी वैज्ञानिक पूंजी सहेज पाएगा?
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  • अरुण कुमार डनायक

राष्ट्र केवल प्रक्षेपण यानों से अंतरिक्ष शक्ति नहीं बनते, वे उन वैज्ञानिकों के विश्वास से बनते हैं जो अपना सर्वश्रेष्ठ ज्ञान अपने ही देश को समर्पित करने का निर्णय लेते हैं। विज्ञान में प्रतिभा पलायन केवल मानव संसाधन का नुकसान नहीं होता; उसके साथ वर्षों का संस्थागत अनुभव, तकनीकी स्मृति और भविष्य की अनेक संभावनाएं भी चली जाती हैं। यदि भारत 21वीं सदी में वैज्ञानिक महाशक्ति बनना चाहता है, तो उसे वैज्ञानिकों को रोकने की नहीं, बल्कि ऐसा वातावरण बनाने की आवश्यकता है जहां प्रतिभाएं लौटना भी चाहें और जीवन भर योगदान देना भी।

स्वतंत्र भारत के सामने वैज्ञानिक प्रतिभाओं का अभाव सबसे बड़ी चुनौती थी। नेहरू ने विदेशों में कार्यरत भारतीय वैज्ञानिकों को यह भरोसा दिलाया कि देश उन्हें उनकी क्षमता के अनुरूप अवसर देगा। परिणामस्वरूप अनेक प्रतिभाएं लौटीं और भारत के वैज्ञानिक भविष्य की नींव रखी। प्रो. यू. आर. राव ने अमेरिका का शोध-कॅरियर छोड़ भारत लौटकर उपग्रह कार्यक्रम को दिशा दी और इसरो को विश्वसनीय संस्थान बनाया।

लगभग सात दशक बाद परिदृश्य चिंताजनक रूप से बदलता दिखाई देता है। कभी जिस इसरो ने विदेशों में कार्यरत भारतीय वैज्ञानिकों को स्वदेश लौटने के लिए प्रेरित किया था, आज वही संगठन अपने अनुभवी वैज्ञानिकों को संस्थान में बनाए रखने की चुनौती से जूझ रहा है। हाल के महीनों में इसरो के लगभग एक सौ से अधिक वैज्ञानिकों और तकनीकी अधिकारियों के त्यागपत्रों ने यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि क्या भारत फिर से अपनी वैज्ञानिक पूंजी खोने लगा है? क्या यह केवल सामान्य कर्मचारी परिवर्तन है, या इसके पीछे विज्ञान प्रशासन और नौकरशाही की संरचनात्मक समस्या है?

यह प्रश्न इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब भारत अपने अंतरिक्ष कार्यक्रम के सबसे महत्वाकांक्षी दौर में प्रवेश कर चुका है। गगनयान मानव अंतरिक्ष मिशन, भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन की स्थापना, चंद्रयान-4, मंगलयान-2, पुन: प्रयोज्य प्रक्षेपण यान, अगली पीढ़ी के संचार एवं पृथ्वी अवलोकन उपग्रह— इन परियोजनाओं की सफलता केवल धन से नहीं, बल्कि अनुभवी वैज्ञानिकों पर निर्भर है। वरिष्ठ वैज्ञानिकों का अनुभव और संस्थागत ज्ञान तत्काल प्रतिस्थापित नहीं किया जा सकता।

डॉ. जितेन्द्र सिंह का यह कथन—'बहुत लोग जाते हैं, बहुत लोग आते हैं'—सामान्य प्रशासनिक दृष्टि से भले स्वाभाविक लगे, किंतु अंतरिक्ष विज्ञान में वैज्ञानिक विशेषज्ञता का महत्व इससे कहीं अधिक है। इसरो अध्यक्ष वी. नारायणन की प्रतिक्रिया अपेक्षाकृत संतुलित रही, फिर भी दोनों वक्तव्य त्यागपत्रों के मूल कारणों पर मौन हैं।

वैज्ञानिकों के बढ़ते त्यागपत्रों के बीच 14 जुलाई 2026 को अंतरिक्ष विभाग ने गगनयान सहित राष्ट्रीय महत्व की परियोजनाओं से जुड़े वैज्ञानिकों के त्यागपत्रों पर अंतिम निर्णय का अधिकार अपने हाथ में ले लिया। यदि स्थिति सामान्य होती, तो ऐसी असाधारण व्यवस्था की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। स्पष्ट है कि प्रशासनिक आश्वासनों से अधिक आवश्यकता इसके वास्तविक कारणों की निष्पक्ष समीक्षा की है।

निजी अंतरिक्ष उद्योग का विस्तार वैज्ञानिकों के त्यागपत्रों का एक महत्वपूर्ण कारण हो सकता है। वर्ष 2020 में अंतरिक्ष क्षेत्र को निजी भागीदारी के लिए खोलने और 2023 की भारतीय अंतरिक्ष नीति लागू होने के बाद देश में चार सौ से अधिक अन्तरिक्ष स्टार्टअप विकसित हुए हैं। बेहतर वेतन, नेतृत्व के अवसर, स्टॉक विकल्प और अपेक्षाकृत तेज़ निर्णय-प्रक्रिया स्वाभाविक रूप से अनुभवी वैज्ञानिकों को आकर्षित करती है, जिसे भारतीय अंतरिक्ष पारिस्थितिकी तंत्र के विस्तार का सकारात्मक संकेत भी माना जा सकता है। किंतु प्रतिभा पलायन को केवल आर्थिक दृष्टि से नहीं देखा जा सकता। यदि इसके पीछे संस्थागत असंतोष, वैज्ञानिक स्वायत्तता में कमी, निर्णय-प्रक्रिया में घटती भागीदारी और सीमित कॅरियर अवसर जैसे कारण भी हैं, तो यह भारत की विज्ञान नीति के लिए गंभीर चेतावनी है।

भारतीय वैज्ञानिक संस्थानों में लंबे समय से यह चिंता व्यक्त की जाती रही है कि अनेक महत्वपूर्ण तकनीकी निर्णयों में वैज्ञानिक नेतृत्व की अपेक्षा सामान्य प्रशासनिक तंत्र का प्रभाव अधिक होता जा रहा है। विज्ञान और अंतरिक्ष जैसे अत्यधिक विशिष्ट क्षेत्रों में भी कई बार अंतिम निर्णय ऐसे अधिकारियों के हाथों में होता है, जिनकी विशेषज्ञता प्रशासनिक प्रबंधन में होती है, वैज्ञानिक अनुसंधान में नहीं। फलस्वरूप वर्षों के शोध और तकनीकी अनुभव से तैयार वैज्ञानिक अनुशंसाएं फाइलों और प्रशासनिक प्रक्रियाओं में अपना मूल स्वरूप खो बैठती हैं। निस्संदेह किसी भी संस्थान के सुचारु संचालन के लिए प्रशासन अनिवार्य है, किंतु जब वह वैज्ञानिक विवेक का विकल्प बनने लगे, तो शोध, नवाचार और निर्णय-प्रक्रिया प्रभावित होना स्वाभाविक है। प्रश्न यह नहीं कि प्रशासनिक अधिकारी सक्षम हैं या नहीं, बल्कि यह है कि अत्यधिक विशिष्ट वैज्ञानिक निर्णयों में अंतिम प्राथमिकता वैज्ञानिक विशेषज्ञता को मिले या सामान्य प्रशासनिक दृष्टिकोण को। विज्ञान प्रशासन का उद्देश्य वैज्ञानिक निर्णयों को सुगम बनाना होना चाहिए, उनका विकल्प बनना नहीं।

नासा, यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी और जापान की जाक्सा जैसी संस्थाओं में वैज्ञानिकों का उद्योग, विश्वविद्यालय और सरकारी अनुसंधान संस्थानों के बीच आवागमन सामान्य है। इस गतिशीलता को प्रतिभा पलायन नहीं, बल्कि ज्ञान परिसंचरण माना जाता है। चीन ने विदेशों में प्रशिक्षित अपने वैज्ञानिकों को योजनाबद्ध ढंग से स्वदेश लौटाया और उन्हें विश्वस्तरीय अनुसंधान वातावरण उपलब्ध कराया। यही नीति आज उसकी वैज्ञानिक प्रगति की प्रमुख आधारशिलाओं में से एक है। इसके विपरीत भारत अब तक विदेशों में कार्यरत अपनी वैज्ञानिक प्रतिभाओं को बड़े पैमाने पर वापस लाने की कोई प्रभावी और दीर्घकालिक नीति विकसित नहीं कर पाया है। यद्यपि समय-समय पर रामानुजन फेलोशिप, रामालिंगास्वामी री-एंट्री फेलोशिप, वज्र तथा हाल में वैभव जैसे कार्यक्रम प्रारम्भ किए गए हैं, जिनसे अनेक प्रतिष्ठित वैज्ञानिक भारतीय संस्थानों से जुड़े भी हैं, किंतु इन्हें अभी तक व्यापक राष्ट्रीय प्रतिभा-वापसी नीति का रूप नहीं मिल सका है।

त्यागपत्रों पर प्रशासनिक रोक अल्पकालिक समाधान हो सकती है, किंतु दीर्घकालीन नहीं। प्रतिभा को आदेश से रोका जा सकता है, लेकिन उत्कृष्टता केवल विश्वास और सम्मान से ही अर्जित की जा सकती है। भारत के सामने बड़ा प्रश्न यह है कि पिछले एक दशक में विदेशों में कार्यरत कितने भारतीय वैज्ञानिक स्थायी रूप से वापस लौटे? क्या हमारे पास ऐसी कोई व्यापक राष्ट्रीय नीति है जो वैश्विक भारतीय वैज्ञानिक समुदाय को पुन: देश के अनुसंधान संस्थानों से जोड़ सके? प्रतिभा संरक्षण के साथ-साथ प्रतिभा वापसी को भी राष्ट्रीय विज्ञान नीति का अभिन्न भाग बनाना होगा।

इसरो का संकट केवल एक संस्थान का संकट नहीं, बल्कि भारत की वैज्ञानिक नीति की परीक्षा है। यदि भारत 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने का लक्ष्य रखता है, तो उसे केवल रॉकेट, उपग्रह और अंतरिक्ष स्टेशन नहीं बनाने होंगे; उसे ऐसे संस्थान भी बनाने होंगे जहां वैज्ञानिक सम्मान, स्वायत्तता और सृजनात्मक स्वतंत्रता के साथ काम करना चाहें। स्वतंत्र भारत ने कभी यू. आर. राव जैसी प्रतिभाओं को स्वदेश लौटने का विश्वास दिलाया था; आज आवश्यकता उस विश्वास को पुन: स्थापित करने की है। राष्ट्र केवल प्रक्षेपण यानों से अंतरिक्ष शक्ति नहीं बनते, वे उन वैज्ञानिकों के विश्वास से बनते हैं जो अपना सर्वश्रेष्ठ ज्ञान अपने ही देश को समर्पित करने का निर्णय लेते हैं। विज्ञान में प्रतिभा पलायन केवल मानव संसाधन का नुकसान नहीं होता; उसके साथ वर्षों का संस्थागत अनुभव, तकनीकी स्मृति और भविष्य की अनेक संभावनाएं भी चली जाती हैं। यदि भारत 21वीं सदी में वैज्ञानिक महाशक्ति बनना चाहता है, तो उसे वैज्ञानिकों को रोकने की नहीं, बल्कि ऐसा वातावरण बनाने की आवश्यकता है जहां प्रतिभाएं लौटना भी चाहें और जीवन भर योगदान देना भी।

(लेखक एवं समाजसेवी )


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