Top
Begin typing your search above and press return to search.

भागवत कथा: न विदेश ने सुनी न देश ने!

आरएसएस के साथ एक मंच पर आकर, उसकी गतिविधियों को जाने-अनजाने वैधता प्रदान करने को अपनी गलती मानकर, बाकायदा इस पर पछतावा जताया था।

भागवत कथा: न विदेश ने सुनी न देश ने!
X

विभिन्न धर्मों के नेताओं के बीच 'संवाद' कहकर प्रचारित की गयी इस बैठक के बाद, इसमें ईसाइयों के प्रतिनिधि के रूप में शामिल हुईं एक ईसाई चर्च की नेता और एक मुस्लिम धर्मगुरु ने, बाद में सार्वजनिक बयान जारी कर, आरएसएस के साथ एक मंच पर आकर, उसकी गतिविधियों को जाने-अनजाने वैधता प्रदान करने को अपनी गलती मानकर, बाकायदा इस पर पछतावा जताया था।

आरएसएस प्रमुख, मोहन भागवत क्या अपने करीब दस दिन के अमेरिका-कनाडा-इंग्लैंड दौरे में, आरएसएस की एक सांप्रदायिक, फासीवादी संगठन की छवि को बदलने में कामयाब रहे या उनकी इस कोशिश का उल्टा ही असर हुआ, इस पर बहस हो सकती है। अगर यह सच है कि उल्लेखनीय भारतीय आबादी और जाहिर है कि भारतीय हिंदू आबादी वाले भी इन तीनों देशों में, संघ-भाजपा से जुड़े भारतीय प्रवासियों के पूरे ताने-बाने को सक्रिय कर, आरएसएस अपने शताब्दी वर्ष के मौके पर हुए इन आयोजनों में प्रवासी हिंदुओं की अच्छी-खासी संख्या को इकठ्ठा करने में सफल रहा है और इससे भविष्य के लिए उनके बीच संघ-भाजपा का संबंध बढ़ाने में मदद भी मिल सकती है। वहीं यह भी उतना ही सच है कि इन तीनों ही देशों में भागवत का 'स्वागत' प्रभावशाली विरोध प्रदर्शनों से हुआ है, जिनमें भी प्रवासी भारतीयों की अच्छी संख्या शामिल रही है। याद रहे कि पश्चिमी दुनिया में इससे पहले आरएसएस को शायद ही कभी ऐसे सार्वजनिक तथा मुखर विरोध का सामना करना पड़ा होगा।

आरएसएस की छवि 'सुधारने' के इस प्रयास और एक सांप्रदायिक, फासीवादी संगठन के रूप में उसके मुखर विरोध की इस टक्कर के नतीजों के संकेतक के रूप में, भागवत के अमेरिका के कार्यक्रम के बाद आयी दो खबरों की ओर जरूर हम अपने पाठकों का ध्यान खींचना चाहेंगे। पहली खबर का संबंध, न्यूयार्क में मेडिसन स्क्वायर गार्डन के भागवत के व्याख्यान की पूर्व-पीठिका के रूप में आयोजित, अनेक धर्मों के नेताओं की बैठक से है, जिसमें भागवत ने एक प्रकार से स्वामी विवेकानंद के करीब डेढ़ सदी पहले के प्रसिद्घ संबोधन की फीकी नकल पेश करने की कोशिश की थी। यहीं भागवत ने, बाद में विशेष रूप से भारत में गोदी मीडिया में सुर्खियां बने इस आशय के सदुपदेश भी दिए थे कि, 'जो कहे कि भारत में मुसलमान रहें ही नहीं, वह हिंदू ही नहीं है' और 'सब मनुष्य बराबर हैं, सब की अपनी गरिमा है' तथा 'अनेकता में एकता हमारे डीएनए में है', आदि आदि।

विभिन्न धर्मों के नेताओं के बीच 'संवाद' कहकर प्रचारित की गयी इस बैठक के बाद, इसमें ईसाइयों के प्रतिनिधि के रूप में शामिल हुईं एक ईसाई चर्च की नेता और एक मुस्लिम धर्मगुरु ने, बाद में सार्वजनिक बयान जारी कर, आरएसएस के साथ एक मंच पर आकर, उसकी गतिविधियों को जाने-अनजाने वैधता प्रदान करने को अपनी गलती मानकर, बाकायदा इस पर पछतावा जताया था। आरएसएस की वास्तविक भूमिका के संबंध में खास जानकारी नहीं होने पर खेद जताने के अलावा उन्होंने इसकी शिकायत भी की थी कि अमेरिका में आरएसएस के शताब्दी समारोहों के आयोजनकर्ताओं ने, जो जाहिर है कि आरएसएस से जुड़े हुए थे, उन्हें धोखे में रखकर इस आयोजन का हिस्सा बनने के लिए भ्रमित किया था। इसमें इस संबंध में धोखे में रखा जाना भी शामिल था कि आरएसएस प्रमुख, इस आयोजन के केंद्र में होंगे।

आरएसएस के इस 'प्रयोग' का दूसरा नतीजा और भी चौंकाने वाला था। भागवत के अमेरिका दौरे के बाद, अमेरिका के करीब सौ राजनीतिक नेताओं ने, जिनमें बड़ी संख्या में सांसद, पूर्व-सांसद तथा संभावित (उम्मीदवार) सांसद शामिल हैं, एक संयुक्त बयान जारी कर इसका ऐलान किया कि वे अपने चुनाव अभियान के लिए, आरएसएस से किसी भी तरह जुड़ा एक पैसा भी स्वीकार नहीं करेंगे। यह एक प्रकार से पक्के आरएसएस-विरोधी रुख का ही ऐलान था। सभी जानते हैं कि अमेरिका में, चुनाव अभियान के लिए चंदा, राजनीतिक प्रतिनिधियों के संबंधित लाबी या तबके के प्रति समर्थन या विरोध को प्रदर्शित करता है। इस सिलसिले में यह याद दिलाना भी अप्रासांगिक नहीं होगा कि आरएसएस ने, अमेरिका में अपनी कोई सांगठनिक गतिविधियां न होने की मुद्रा अपनाने के बावजूद, अमरीकी नीति-निर्धारक हलकों में अपने पक्ष में लॉबी करने के लिए, पिछले वर्षों में करोड़ों रुपए खर्च कर के लॉबीइंग फर्मों की सेवाएं ली थीं। कुल मिलाकर, ऐसा लगता है कि भागवत का पश्चिम का दौरा, मोदीशाही से आरएसएस के प्रकट संबंध और भागवत के सारे समावेशी तथा उदार मुखौटा ओढ़ने के बावजूद, आरएसएस के संबंध में पश्चिमी जनमत की आशंकाओं को बढ़ाने वाला ही साबित हुआ है। और यह हुआ है, आरएसएस द्वारा नियंत्रित मोदीशाही के भारत में वास्तविक आचरण और इस दौरे के क्रम में भागवत द्वारा किए जा रहे स्वांग के बीच की चौड़ी खाई के, पश्चिम में जनमत के बढ़ते हिस्से द्वारा पहचाने जाने की वजह से।

कहने की जरूरत नहीं है कि आरएसएस की असलियत के इस ज्यादा से ज्यादा पहचाने जाने का संबंध, भागवत के इस दौरे के समय में भी, संघ-भाजपा के राज में भारत में वास्तव में जो कुछ हो रहा था, उससे भी था। आखिर कहा गया है—प्रत्यक्ष के लिए प्रमाण जरूरत क्या है? मसलन, भागवत जब तक अमेरिका का अपना दौरा पूरा कर कनाडा पहुंचते, तब तक उनके आरएसएस के धार्मिक समावेशीपन के दावों की चिंदियां बिखेरने वाले राज्यों में, बंगाल शामिल हो चुका था, जहां भाजपा अपने राज के सौ दिन पूरे करने का जश्न मना रही थी। जैसे इसी जश्न के हिस्से के तौर पर, इस राज्य में पहली बार देखने को मिल रहे ईसाई पादरियों, गिरजों तथा धर्मावलंबियों पर हमलों के सिलसिले में, एक बिल्कुल नया अध्याय जोड़ दिया गया। भाजपा द्वारा ही शासित छत्तीसगढ़ में हुई इसी प्रकार की घटनाओं को दुहराते हुए, हिंसा तथा जोर-जबर्दस्ती के जरिए बजरंग दल के गुंडों ने एक मुर्दे को कब्र में उतारे जाने के बाद, वापस बाहर निकालने के लिए मजबूर कर दिया। उनके अनुसार ईसाई कब्रिस्तान के कागजात ही पक्के नहीं थे, इसलिए वहां किसी को दफ़न नहीं करने दिया जाएगा। बाद में मृतक के परिजनों को दूर की किसी जगह पर ईसाई कब्रिस्तान में मृतक को दफ़न करना पड़ा!

और जैसे भागवत का उदारता का मुखौटा नोचने के लिए इतना ही काफी नहीं हो, उनके इंग्लैंड का अपना दौरा पूरा कर के वापस भारत के लिए निकलने से पहले ही, युद्घ की सी तैयारियों के साथ संघ-भाजपा शासित उत्तर प्रदेश में सहारनपुर से, डेढ़ सौ साल पुरानी मस्जिद के सुबह मुंह-अंधेरे बुलडोजर से पूरी तरह से ध्वस्त किए जाने की खबर आ चुकी थी। इस महान काम में कोई रोक-टोक न होने देना सुनिश्चित करने के लिए, इस मस्जिद ध्वंस के लिए विशाल संख्या में पुलिस बल तो लगाया ही गया था, आस-पास के इलाके के विपक्षी सांसदों, विधायकों समेत, अधिकांश राजनीतिक नेताओं को उनके घरों पर नजरबंद कर दिया गया था। वास्तव में यह कार्रवाई मुंह अंधेरे की भी इसीलिए गयी थी कि मस्जिद पक्ष, जिला अदालत के मस्जिद ध्वस्त करने के फैसले को, ऊपर की अदालत में चुनौती दे ही नहीं सके।

संघ-भाजपा के राज में आम तौर पर सभी राज्यों में और खासतौर पर योगी राज में उत्तर प्रदेश में, मस्जिदों-मजारों पर बुलडोजर चलाया जाना आए दिन की बात हो गई है। वास्तव में योगी राज ने तो पश्चिमी उत्तर प्रदेश की संभल की साढ़े चार सौ साल पुरानी मस्जिद को भी, जो भारतीय पुरातत्व द्वारा संरक्षित इमारत है, एक नये 'मस्जिद के नीचे मंदिर के दावे' का मैदान बनाने का भी कारनामा कर दिखाया है। फिर भी सहारनपुर की मस्जिद के ध्वंस की सांप्रदायिक मनमानी इसलिए और भी बड़ी है कि यह मस्जिद, जिला कलेक्टरी के परिसर में स्थित थी। मस्जिद, कलेक्टरी से पुरानी थी। और पुराने रिकार्डों के अनुसार, सरकारी कार्यालय के लिए जमीन दान करने वाले मुस्लिम भाइयों ने ही, इस मस्जिद के लिए जमीन दी थी। भूमि रिकार्ड में यह जमीन अब भी मुस्लिम भाइयों के नाम है, हालांकि प्रशासन उसे सरकारी जमीन बताता है और मस्जिद को सरकारी जमीन पर अतिक्रमण कर बना होने के नाम पर ही तोड़ा गया है।

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने एक प्रकार से मुस्लिम धार्मिक व अन्य सार्वजनिक स्थलों को निशाना बनाने के लिए ही, अपने दूसरे कार्यकाल में कथित रूप से अतिक्रमण-विरोधी अभियान छेड़े रखा है, जिसके दायरे को शहरों से बढ़ाकर ग्रामीण इलाकों तक पहुंचा दिया गया है। इस क्रम में सरकारी जमीन खाली कराने के नाम पर, राज्य भर में दर्जनों मस्जिदों, दरगाहों, ईदगाहों आदि पर बुलडोजर चलाया गया है। इसी तरह गरीबों की बस्तियों को भी बुलडोजर का निशाना बनाया गया है। हैरानी की बात नहीं है कि योगी राज में बुलडोजर को आम तौर पर कमजोर तबकों और खासतौर पर अल्पसंख्यकों के खिलाफ शासन की कठोरता का प्रतीक बना दिया गया और बुलडोजर राज, योगी राज का पर्याय हो गया है।

फिर भी, सहारनपुर की मस्जिद को एक प्रकार से कानून के राज को, जिसमें 1991 का धार्मिक स्थल कानून भी आता है, जो सभी धार्मिक स्थलों का 1945 के 15 अगस्त तक जो स्वरूप था, उसे सुरक्षित रखने का प्रावधान करता है, धता बताते हुए ध्वस्त किए जाने का खास कारण भी है। इसका संबंध उत्तर प्रदेश के विधानसभाई चुनावों से है, जो अगले वर्ष की पहली तिमाही में होने हैं। योगी सरकार ने, जो अपने मुस्लिमविरोधी होने को किसी पदक की तरह अपने गले में पहनना पसंद करती है, इसके साथ खासतौर पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में, एक प्रकार से अपने चुनाव प्रचार की शुरूआत ही कर दी है। याद रहे कि इससे पहले योगी सरकार ने सपा नेता आजम खान द्वारा रामपुर में बनायी अली जौहर यूनिवर्सिटी की लगभग सभी इमारतों (संख्या में करीब ढाई दर्जन) पर बुलडोजर चलवाने का मन बना लिया था। लेकिन, अदालती आदेश बीच में आ गए। इसके ऊपर से, छात्रों के देशव्यापी आंदोलन के असर को देखते हुए, योगी राज को भी इस मामले में पांव पीछे खींचने में ही समझदारी लगी। सहारनपुर की मस्जिद के ध्वंस के साथ, योगी राज ने अपना हिंदुत्ववादी सांप्रदायिक चेहरा चमकाने का, दूसरा रास्ता निकाल लिया है।

इसीलिए, अगर पश्चिम में भागवत के बदले हुए बोलों से भक्तों के अलावा और कोई खास प्र्रभावित हुआ नहीं लगता है, तो देश में तो गोदी मीडिया के सारे शोर-शराबे के बावजूद, शायद ही किसी ने उनके बोलों को गंभीरता से लिया होगा। उधर देश के राजनीतिक परिदृश्य में युवतर पीढ़ी के हस्तक्षेप ने और उससे पहले हुए मजदूरों के तथा किसानों के आंदोलनों ने, यह साफ कर दिया है कि हिंदुत्ववादी सांप्रदायिकता के सहारे, शिक्षा-रोजगार-स्वास्थ्य-समुचित आय, जैसी लोगों की वास्तविक समस्याओं की ओर से ध्यान बंटाने और इसके जरिए शासन की विफलताओं को ढांपने की रणनीति, अब और काम नहीं कर रही है। इसी की बौखलाहट में मोदी-योगी की जोड़ी, हिंदुत्ववादी सांप्रदायिकता का चेहरा और ज्यादा चमका रही है और अपनी विफलता को और पक्का कर रही है। सहारनपुर की मस्जिद के ध्वंस से लेकर, बंगाल में दुर्गा पूजा के वैष्णवीकरण की कोशिशें तक, इसी का इशारा कर रही हैं।

(लेखक साप्ताहिक पत्रिका लोक लहर के संपादक हैं।)


Next Story

Related Stories

All Rights Reserved. Copyright @2019
Share it