Top
Begin typing your search above and press return to search.

सिर्फ नाम नहीं है बरकतउल्ला विश्वविद्यालय:इतिहास और पहचान के सवाल

विश्वविद्यालय केवल डिग्री देने वाले संस्थान नहीं होते, वे समाज की ऐतिहासिक स्मृति के भी संरक्षक होते हैं।

सिर्फ नाम नहीं है बरकतउल्ला विश्वविद्यालय:इतिहास और पहचान के सवाल
X
  • राजु कुमार

विश्वविद्यालय केवल डिग्री देने वाले संस्थान नहीं होते, वे समाज की ऐतिहासिक स्मृति के भी संरक्षक होते हैं। इसलिए यह पर्याप्त नहीं कि यह प्रस्ताव फिलहाल ठंडे बस्ते में पड़ा है। कार्यपरिषद को इसे औपचारिक रूप से वापस लेना चाहिए, ताकि भविष्य में इसे फिर जीवित करने की गुंजाइश न रहे। राज्य सरकार को भी स्पष्ट संदेश देना चाहिए कि स्वतंत्रता सेनानियों और शिक्षाविदों की विरासत से किसी प्रकार का समझौता नहीं किया जाएगा।

हाल के दिनों में भोपाल स्थित बरकतउल्ला विश्वविद्यालय का नाम बदलकर 'वाग्देवी भोजपाल विश्वविद्यालय' करने के प्रस्ताव ने मध्यप्रदेश में तीखी बहस छेड़ दी। विश्वविद्यालय की कार्यपरिषद द्वारा पारित इस प्रस्ताव के खिलाफ भोपाल सहित प्रदेश के अनेक हिस्सों में विरोध हुआ। शिक्षकों, छात्रों, इतिहासकारों, सामाजिक संगठनों और विभिन्न राजनीतिक दलों ने इसे एक स्वतंत्रता सेनानी और शिक्षाविद के सम्मान के प्रतिकूल बताया।

नाम परिवर्तन का विरोध लगातार तेज हो रहा था। इस बीच विश्वविद्यालय अन्य प्रशासनिक विवादों में भी चर्चा में आ गया। बाद में कुलपति ने इस्तीफा दे दिया। इसके बाद नाम परिवर्तन के प्रस्ताव को लेकर उठते सवालों पर रजिस्ट्रार ने कहा कि यह पूर्व कुलपति की पहल थी और उनके पद छोड़ने के बाद इस पर आगे नहीं बढ़ा जा रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि उच्च शिक्षा विभाग ने इस प्रस्ताव का समर्थन नहीं किया था। यद्यपि यह केवल रजिस्ट्रार का बयान था। कार्यपरिषद ने अपना प्रस्ताव अब तक औपचारिक रूप से वापस नहीं लिया है और न ही इस संबंध में कोई सार्वजनिक अधिसूचना जारी हुई है। मामला फिलहाल ठंडे बस्ते में चला गया है और विरोध भी धीमा पड़ गया है। लेकिन जब तक प्रस्ताव विधिवत वापस नहीं लिया जाता, तब तक इस विवाद को समाप्त मानना उचित नहीं होगा।

सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि आखिर इसकी आवश्यकता क्या थी? क्या किसी एक महापुरुष का सम्मान दूसरे महापुरुष की पहचान मिटाकर किया जाना चाहिए? विरोध करने वालों का भी यही कहना था कि यदि राजा भोज या वाग्देवी के सम्मान में विश्वविद्यालय स्थापित करना है तो नया विश्वविद्यालय बनाया जाए। लेकिन दशकों से एक स्वतंत्रता सेनानी के नाम से जुड़ी संस्था की पहचान बदलना इतिहास के साथ न्याय नहीं होगा।

मौलाना बरकतउल्ला भोपाली केवल भोपाल के नहीं, बल्कि भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के अंतरराष्ट्रीय चेहरों में से एक थे। 7 जुलाई,1854 में जन्मे बरकतउल्ला उच्च कोटि के शिक्षाविद, बहुभाषाविद और क्रांतिकारी राष्ट्रवादी थे। उन्होंने जापान सहित अनेक देशों में अध्यापन किया और विदेशों में भारत की आजादी के पक्ष में जनमत तैयार किया। प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान उन्होंने विदेशों में सक्रिय भारतीय क्रांतिकारियों के साथ मिलकर ब्रिटिश शासन के खिलाफ अभियान चलाया। 1 दिसंबर, 1915 में काबुल में गठित भारत की निर्वासित अस्थायी सरकार में वे प्रधानमंत्री बने, जबकि राजा महेंद्र प्रताप उसके राष्ट्रपति थे। विदेशी धरती पर भारत की स्वतंत्रता के लिए यह अपने समय का ऐतिहासिक राजनीतिक प्रयास था। स्वतंत्र भारत देखने से पहले ही उनका निधन हो गया, लेकिन उनका योगदान भारतीय इतिहास में हमेशा दर्ज रहेगा।

इसी योगदान के सम्मान में 1988 में भोपाल विश्वविद्यालय का नाम बदलकर बरकतउल्ला विश्वविद्यालय रखा गया था। यह निर्णय किसी धार्मिक पहचान के आधार पर नहीं, बल्कि उस व्यक्ति के सम्मान में लिया गया था जिसने अपना पूरा जीवन भारत की स्वतंत्रता के लिए समर्पित कर दिया। इसलिए यदि आज उसी विश्वविद्यालय से उनका नाम हटाने की कोशिश होती है तो स्वाभाविक है कि समाज सवाल पूछे।

इस पूरे विवाद के दौरान यह प्रश्न भी उठता रहा कि क्या बरकतउल्ला का नाम केवल इसलिए विवाद का विषय बना क्योंकि वे मुस्लिम थे? सरकार और विश्वविद्यालय ने ऐसा कोई कारण नहीं बताया। ऐसे में इस आशंका को पूरी तरह समाप्त करने का सबसे उचित तरीका यही है कि नाम परिवर्तन के प्रस्ताव को औपचारिक रूप से वापस लिया जाए। अन्यथा यह विवाद समय-समय पर फिर उभर सकता है।

दूसरा बड़ा सवाल यह है कि क्या विश्वविद्यालयों की सबसे बड़ी समस्या वास्तव में उनका नाम है? प्रदेश के अधिकांश विश्वविद्यालय आज घटते नामांकन, रिक्त पदों, कमजोर शोध, परीक्षा संबंधी समस्याओं, प्रशासनिक विवादों और गुणवत्ता सुधार जैसी गंभीर चुनौतियों से जूझ रहे हैं। स्वयं बरकतउल्ला विश्वविद्यालय भी समय-समय पर इन्हीं कारणों से चर्चा में रहा है। ऐसे में प्राथमिकता नाम बदलना नहीं, बल्कि शिक्षा की गुणवत्ता सुधारना होनी चाहिए।

राजा भोज भारतीय इतिहास के कुशल शासक, विद्वान और संस्कृ ति पुरुष माने जाते हैं। यदि राज्य सरकार उनके नाम पर नया विश्वविद्यालय, शोध संस्थान, उत्कृष्टता केंद्र या अन्य शैक्षणिक संस्था स्थापित करना चाहे तो वह कर सकती है। लेकिन इसके लिए बरकतउल्ला विश्वविद्यालय की ऐतिहासिक पहचान बदलना न आवश्यक है और न ही न्यायसंगत है।

विश्वविद्यालय केवल डिग्री देने वाले संस्थान नहीं होते, वे समाज की ऐतिहासिक स्मृति के भी संरक्षक होते हैं। इसलिए यह पर्याप्त नहीं कि यह प्रस्ताव फिलहाल ठंडे बस्ते में पड़ा है। कार्यपरिषद को इसे औपचारिक रूप से वापस लेना चाहिए, ताकि भविष्य में इसे फिर जीवित करने की गुंजाइश न रहे। राज्य सरकार को भी स्पष्ट संदेश देना चाहिए कि स्वतंत्रता सेनानियों और शिक्षाविदों की विरासत से किसी प्रकार का समझौता नहीं किया जाएगा। बरकतउल्ला विश्वविद्यालय की पहचान अक्षुण्ण रहनी चाहिए। यही इतिहास, उच्च शिक्षा और स्वतंत्रता संग्राम—तीनों के प्रति सच्चा सम्मान होगा।


Next Story

Related Stories

All Rights Reserved. Copyright @2019
Share it