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बरगढ़ की अनूठी धनु यात्रा

ओडिशा के बरगढ़ शहर में इन दिनों धनु यात्रा चल रही है। यह 11 दिनों तक चलती है। यह भगवान कृष्ण और कंस की कहानी पर आधारित है

बरगढ़ की अनूठी धनु यात्रा
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ओडिशा में ऐसे कई गांव हैं, जहां हथकरघे से संबलपुरी साडियां बनाई जा रही हैं। कुछ समय पहले तक एक ऐसा दौर भी था, तब इन साड़ियों की मांग कम थी, लेकिन अब इनकी बाजार में मांग बढ़ गई है। न केवल ओडिशा में इसकी मांग है, बल्कि देश भर में और दुनिया के बाजार में इन्हें पसंद किया जा रहा है। इससे बुनकरों की आजीविका तो सुनिश्चित हुई है, बल्कि उनके जीवन स्तर में भी सुधार आया है। शिक्षा, स्वास्थ्य व रहन-सहन का स्तर भी अच्छा हुआ है।

ओडिशा के बरगढ़ शहर में इन दिनों धनु यात्रा चल रही है। यह 11 दिनों तक चलती है। यह भगवान कृष्ण और कंस की कहानी पर आधारित है। इस दौरान पूरा बरगढ़ शहर मथुरा बन जाता है और दर्शक स्वयं इसका हिस्सा बन जाते हैं। यह बुराई पर अच्छाई की प्रतीक मानी जाती है। इस यात्रा में ओडिशा की कला संस्कृति की झलक देखने को मिलती है। आज इस कालम में इस यात्रा के बहाने यहां की हैंडलूम की स्थिति पर चर्चा करना चाहूंगा, जिसे काफी पसंद किया जा रहा है।

इस समय धनु यात्रा में भी हैंडलूम के कपड़ों को काफी पसंद किया जा रहा है। यह धनु यात्रा काफी विश्व प्रसिद्ध है। यहां के सामाजिक कार्यकर्ता व किसान नेता लिंगराज भाई ने बताया कि आजादी के बाद यह शुरू हुई थी। राजा कंस के राज की अंग्रेजों के राज से तुलना की गई थी, कंस का राज चलता है, और बाद में कृ ष्ण उसे मार देते हैं। उसके बाद से यह परंपरा चल रही है। मुझे इसी संदर्भ में महाराष्ट्र में गणेशोत्सव की याद भी आई, जिसे आजादी के दौरान ही शुरू किया गया था।

धनु यात्रा में स्थानीय कलाकारों को उनकी कला का प्रदर्शन करने का मौका मिलता है। पूरे शहर को सजाया गया है। दीवारों पर ग्रामीण संस्कृति को दर्शाने के लिए चित्र बनाए गए हैं। राजा कंस का दरबार और कृष्ण लीला आकर्षण का केन्द्र बनते हैं। धनु यात्रा कलाकारों व दर्शकों की दूरी मिटा देती है। पूरा शहर ओपन थियेटर में तब्दील हो जाता है।

इस यात्रा में शामिल होने के लिए गांवों से बड़ी संख्या में लोग आ रहे हैं। जनधारा बह रही है। महिलाएं बड़ी संख्या में आ रही हैं। मौसम ठंडा है, पर लोगों की भीड़ पर इसका असर नहीं दिख रहा है। इस यात्रा के दौरान गांवों से स्वयं सहायता समूहों ने उनके बनाए सामानों की स्टाल लगाई है।

इसे कवर करने के लिए बड़ी संख्या में यू ट्यूवर, पत्रकार, संवाददाता शहर में हैं। इस संबंध में मेरी उनसे बात हुई। वे बताते हैं कि लोग इस यात्रा में कृष्ण लीला व कंस के दरबार की रिपोर्टिंग को काफी पसंद कर रहे हैं। ये पत्रकार देर रात तक इसे कवर कर रहे हैं। सीधा प्रसारण कर रहे हैं। कुछ यू ट्यूब चैनलों ने छात्र-छात्राओं को भी एंकरिंग करने के लिए मौका दिया है,जिसे लोग काफी पसंद कर रहे हैं।

गर्म कपड़ों की दुकानों के साथ हैंडलूम की दूकानें भी हैं। अचार, पापड़, झोले, बच्चों के खिलौने, खाने-पीने की चीजों की दुकानें हैं। मैं यहां ओडिशा के हैंडलूम की विशेष चर्चा करूंगा, क्योंकि ऐसे मेलों में स्थानीय हस्तकला को बढ़ावा मिलता है।

मैंने एक दिन यहां लगी दुकानों का चक्कर लगाया है। यहां मुझे दूरदराज के गांवों से आई स्वयं सहायता समूहों की महिलाओं की सामग्री ने आकर्षित किया। अचार, पापड़, लड्डू, साबुन, झोले, झाडू इत्यादि।

ओडिशा में ऐसे कई गांव हैं, जहां हथकरघे से संबलपुरी साडियां बनाई जा रही हैं। कुछ समय पहले तक एक ऐसा दौर भी था, तब इन साड़ियों की मांग कम थी, लेकिन अब इनकी बाजार में मांग बढ़ गई है। न केवल ओडिशा में इसकी मांग है, बल्कि देश भर में और दुनिया के बाजार में इन्हें पसंद किया जा रहा है। इससे बुनकरों की आजीविका तो सुनिश्चित हुई है, बल्कि उनके जीवन स्तर में भी सुधार आया है। शिक्षा, स्वास्थ्य व रहन-सहन का स्तर भी अच्छा हुआ है।

हमारे गांवों में कृषि के साथ कई तरह के छोटे-छोटे रोजगार हुआ करते थे। लकड़ी और लोहे के खेती के औजार बनाना, लकड़ी के घर बनाना, खपरैल व मिट्टी के घर बनाना, मिट्टी व बांस के बर्तन बनाना, तेल व गुड़ बनाने का काम इत्यादि। इन सभी कामों को करने वाले कारीगर काफी हुनरमंद थे और कुछ अब भी हैं। इसमें बहुत से लोगों की आजीविका जुड़ी रहती थी।

कुछ समय पहले तक देश में हथकरघे का काम खेती-किसानी के बाद सबसे बड़ा रोजगार हुआ करता था पर कई कारणों से इसमें कमी आई है। लेकिन इसके बावजूद भी यह ऐसा महत्वपूर्ण हुनर व कौशल है, जिसकी बाजार में काफी मांग है। इसका सबसे अच्छा उदाहरण संबलपुरी साड़ियां हैं, जिनकी बाजार में काफी मांग है। जो लोग हाथ के काम, सफाई, डिजाइन व श्रम का महत्व समझते हैं, वे हथकरघे से बने कपड़े ही पसंद करते हैं।

ओडिशा में संबलपुरी साड़ियां हथकरघे पर बनाई जाती हैं। सबसे पहले धागों को रंगना, फिर उन्हें करघे पर बुना जाता है। यह साड़ियां बंध तकनीक से बनाई जाती हैं। कारीगर धागों को विशेष पैटर्न में बांधते हैं। यह बांधा, रंग के उस हिस्से में बांध दिया जाता है, जिस पर रंग नहीं लगाना है। उसे बाद में दूसरे रंग से रंगा जाता है। यह एक जटिल प्रक्रिया है, और यह विशेष सावधानी व हुनर की जरूरत होती है। इस तरह रंगीन साड़ियां बनाई जाती हैं। रेशम व सूती दोनों तरह की साड़ियां बनाई जाती हैं।

यहां से सामाजिक कार्यकर्ता सुरेन्द्र मिहिर संबलपुरी साड़ियों के बाजार के विस्तार में महिलाओं के स्वयं सहायता समूहों की विशेष भूमिका है। सरकार ने इन स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से दूसरे राज्यों में प्रदर्शनी लगवाई। वहां भी संबलपुरी साड़ियों की स्टॉल लगाई, प्रचार-प्रसार किया, जिससे इनकी मांग बढ़ी है।

वे आगे कहते हैं कि इसके साथ, जगह-जगह कार्यक्रम और खुले बाजार की नीतियों ने भी इसे बढ़ावा दिया है। संबलपुरी साड़ियों की मांग देश भर में हो गई है, इसलिए बुनकरों की आजीविका भी अच्छी खासी चल रही है। इन साड़ियों की मांग इसलिए भी बढ़ रही है, क्योंकि इनकी डिजाइन, रंग सभी कुछ उपभोक्ताओं को पसंद आते हैं। पावरलूम यहां बहुत कम हैं। क्योंकि उनमें डिजाइन का काम ज्यादा नहीं किया जा सकता।

सामाजिक कार्यकर्ता व किसान नेता लिंगराज का कहना है कि हमें खेती के साथ इन पारंपरिक हस्तकला को भी बचाना जरूरी है। यह न केवल हमारी पारंपरिक धरोहर है,बल्कि इससे बड़ी आबादी की आजीविका भी जुड़ी हुई है। आज खेती भी संकट में है, इसीलिए इस ओर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। वे कहते हैं कि धनुयात्रा जैसे मेला आयोजनों से ग्रामीण हस्तकला को बढ़ावा मिलता है। पर्यटन को बढ़ावा मिलता है। स्थानीय लोगों को रोजगार भी मिलता है। साथ ही ग्रामीण संस्कृति की धीमी गति में उत्साह का भी संचार होता है। इसका लम्बे समय से लोग इंतजार करते हैं। इसलिए खेती किसानी के साथ हस्तशिल्प, हस्तकला को भी बढ़ावा देना चाहिए। क्या हम इस दिशा में आगे बढ़ना चाहेंगे?


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