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किताबों और फिल्मों पर रोक से विचार नहीं रुकते

सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी का कहना था कि कोई भी संगठन कानून से परे नहीं है।

किताबों और फिल्मों पर रोक से विचार नहीं रुकते
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  • राजेश पांडेय

सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी का कहना था कि कोई भी संगठन कानून से परे नहीं है। आयकर विभाग स्वतंत्र रूप से कार्रवाई करता है। दूसरी ओर मीडिया संगठनों और विपक्षी पार्टियों ने इसे प्रेस की आजादी से जोड़ते हुए राजनीतिक प्रतिशोध करार दिया था। विचारों, जानकारी के प्रसार को सीमित करने का सिलसिला किताबों तक सीमित नहीं है। सरकार ने सोशल मीडिया कंपनियों पर नियंत्रण के लिए कड़े कानून बनाए हैं।

न दिनों पेंगुइन रैंडम हाउस द्वारा कांग्रेस नेता सोनिया गांधी के संस्मरण-'बिलॉन्गिंग:ए जर्नी ऑफ लव' के भारत में प्रकाशन पर आ रही मुश्किलों की खबर सुर्खियों में हैं। लगता है, यह किताब भारत में अप्रत्यक्ष रोक के दायरे में है। यहां एक विवादास्पद पुस्तक पर महात्मा गांधी के रुख को याद कर सकते हैं। 1927 में प्रकाशित अमेरिकी लेखक कैथरीन मेयो की किताब 'मदर इंडियाÓ में भारत की सामाजिक व्यवस्था की कड़ी आलोचना की गई थी। देशभर में किताब का जबर्दस्त विरोध हुआ। सभी नेताओं ने प्रतिबंध लगाने की मांग की। लेकिन महात्मा गांधी ने पाबंदी का समर्थन नहीं किया। उन्होंने इतना जरूर कहा, 'यह पुस्तक देश की बुराइयों (नाले, नालियों, गंदगी) को खोलने और जांच करने के इरादे से लिखी गई एक ड्रेन इंसपेक्टर की रिपोर्ट है। सेंसरशिप की बजाय इस पर खुली बहस की जरूरत हैÓ। अंग्रेज हुकूमत भारत को गुलाम बनाए रखने के गलत कारणों और थोथी दलीलों को मजबूत करने के लिए किताब पर रोक के पक्ष में नहीं थी। किताब के प्रसार में अंग्रेजों का निहित स्वार्थ था। लेकिन आजादी के बाद भी भारत में पुस्तकों और फिल्मों पर रोक का सिलसिला जारी है।

पेंगुइन ने सोनिया गांधी से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, आरएसएस और सीमा पर चीन की घुसपैठ से जुड़े संदर्भों में बदलाव करने या उन्हें हटाने के लिए कहा था। लेकिन सोनिया ने इंकार कर दिया। यह जानकारी किसी अन्य ने नहीं बल्कि पेंगुइन ने ही दी है। वैसे, पेंगुइन का सहयोगी प्रकाशन अल्फ्रेड ए नॉफ अमेरिका में पुस्तक प्रकाशित कर रहा है। नवंबर में जारी होने वाली किताब की एक लाख प्रतियां छापने की खबर है। संस्मरणों में दिलचस्पी रखने वाले लोगों को देर-सबेर किताब मिल ही जाएगी। खबर आने के बाद लोगों का ध्यान इस तरफ गया है। संभव है किताब आसानी से प्रकाशित हो जाती तो शायद उसे इतना प्रचार नहीं मिल पाता। लोकप्रिय हैरी पॉटर सीरीज की लेखक जे के रॉलिंग ने कुछ साल पहले एक इंटरव्यू में कहा था, बहुत कम चीजों में वर्जित ज्ञान के समान शक्तिशाली आकर्षण होता है।

सोनिया गांधी के संस्मरणों के समान जनरल नरवणे की पुस्तक 'फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनीÓ में भी चीन की घुसपैठ का जिक्र है। जनरल नरवणे 2019 से 2022 के बीच सेना प्रमुख रहे। उनके कार्यकाल में 2020 में गलवान में भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच खूनी झड़प में बीस भारतीय और चार चीनी सैनिक मारे गए थे। फरवरी 2026 में कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने संसद में नरवणे की अप्रकाशित किताब की पांडुलिपि का हवाला दिया था। उन्होंने एक पत्रिका में छपे लेख के हवाले से दावा किया कि जब चीनी सेना सीमा भारतीय सीमा में दाखिल हुई तो सेना प्रमुुख को इंतजार कराया गया। बाद में सरकार ने उनसे कहा कि वे जो उचित समझें करें।

लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने सदन में मामले पर बहस की अनुमति नहीं दी। सरकार की ओर से कहा गया कि जब किताब ही प्रकाशित नहीं हुई है तो फिर किस पर चर्चा कराई जाए। गलवान झड़प के संबंध में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जून 2020 में सर्वदलीय बैठक में कहा था कि न कोई हमारी सीमा में घुस आया है, न ही कोई घुसा हुआ है और न ही हमारी कोई चौकी किसी के कब्जे में है। जनरल नरवणे ने इस मुद्दे पर कोई टिप्पणी नहीं की है। खबर है कि उन्होंने 2024 में प्रकाशन की अनुमति के लिए किताब की पांडुलिपि सरकार को भेजी थी। सेना और देश की सुरक्षा से जुड़े मुद््दों पर किसी भी किताब के प्रकाशन के लिए सरकार की अनुमति जरूरी है। इस किताब का प्रकाशन पेंगुइन इंडिया द्वारा प्रस्तावित था।

अक्सर वे सरकारें किताबों, फिल्मों पर पाबंदी लगाती हैं जो स्वयं को असुरक्षित महसूस करती हैं या उनके पास छिपाने के लिए बहुत कुछ होता है या उन्हें कुछ तथ्य असुविधाजनक लगते हैं या संबंधित रचना के कुछ अंश आपत्तिजनक हो सकते हैं। भारत में आजादी के बाद कई पुस्तकों पर रोक लगाई जा चुकी है। महात्मा गांधी की हत्या, भारत की कश्मीर नीति सहित धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक विषयों पर आई कई किताबें इसमें शामिल हैं। भारत पर वीएस नैपाल की तीन किताबों की श्रृंखला की पहली कड़ी एन एरिया ऑफ डार्कनैस, सलमान रूश्दी की सैटेनिक वर्सेज और तस्लीमा नसरीन की लज्जा का जिक्र लंबे समय तक होता रहा है।

बीते कुछ वर्षों से देश में सरकार और सत्ताधारी दल की आलोचना और खामियों की तरफ ध्यान देने वाले स्रोतों और साधनों को खामोश करने का अभियान जारी है। इलेक्ट्रॉनिक, डिजिटल और प्रिंट मीडिया पर अघोषित दबाव है। मीडिया की दुर्दशा और दयनीय स्थिति का मजाक उड़ाने के लिए कई उपमाओं का इस्तेमाल होने लगा है। इनमें एक गोदी मीडिया है। नाम से स्पष्ट है, यह ऐसा मीडिया है जो अपनी मर्जी से आंख बंद करके सरकार की गोद में जा बैठा है। इसमें ज्यादातर टीवी चैनल शामिल हैं। हालांकि, गोद में बैठने का नतीजा है कि बहुत लोगों ने न्यूज चैनल देखना बंद कर दिया है। झूठी टेलीविजन रेटिंग तक जनता के बीच इनकी जगह नहीं बना सकी है। रेटिंग में गिरावट का एक कारण डिजिटल मीडिया है। सोशल मीडिया के चैनल लोगों तक खबरें और विचार पहुंचाते हैं। इस माध्यम से बड़े पैमाने पर झूठ, नफरत, हिंसा, सामाजिक, जाति विभाजन को बढ़ावा देने वाली खबरों, विचारों, काल्पनिक किस्सों, कहानियों का फैलाव हो रहा है।

जहां तक प्रतिबंध और रोक का सवाल है इसके दायरे में कई फीचर और डॉक्यूमेंट्री फिल्में आई हैं। दिल्ली के निर्भया कांड, श्रीलंका के गृहयुद्ध, दंगों, हिंसा, समलैंगिक संबंधों से जुड़ी फिल्में, डॉक्यूमेंट्री सेंसर की मार से नहीं बच सकी हैं। फरवरी 2023 में बीबीसी की एक डॉक्यूमेंट्री द मोदी क्वश्चन की रिलीज पर रोक लगा दी गई। इसके साथ बीबीसी के दिल्ली और मुंबई दफ्तरों पर तीन दिन तक आयकर विभाग की तलाशी चलती रही। सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी का कहना था कि कोई भी संगठन कानून से परे नहीं है। आयकर विभाग स्वतंत्र रूप से कार्रवाई करता है। दूसरी ओर मीडिया संगठनों और विपक्षी पार्टियों ने इसे प्रेस की आजादी से जोड़ते हुए राजनीतिक प्रतिशोध करार दिया था।

विचारों, जानकारी के प्रसार को सीमित करने का सिलसिला किताबों तक सीमित नहीं है। सरकार ने सोशल मीडिया कंपनियों पर नियंत्रण के लिए कड़े कानून बनाए हैं। वर्ष 2000 में पास आईटी एक्ट में 2008, 2011 और बाद के वर्षों में लगातार संशोधन होते रहे हैं। अब सोशल मीडिया कंपनियों के लिए तीन घंटे के भीतर कंटेंट हटाना जरूरी कर दिया गया है। इंडियन एक्सप्रेस में 17 अगस्त को प्रकाशित एक खबर के अनुसार मार्च से जुलाई के बीच सिर्फ पांच महीनों में सोशल मीडिया कंपनियों को औसतन प्रति 68 सेकंड पर कंटेंट ब्लॉक करने का आदेश दिया गया। इस दरम्यान लगभग 1.95 लाख ब्लॉकिंग आदेश जारी किए गए। सबसे ज्यादा एक लाख आदेश इंस्टाग्राम के लिए थे। गौरतलब है कि इस समय जंतर-मंतर, दिल्ली पर छात्रों का आंदोलन चल रहा था। जून में शुरू हुआ आंदोलन जुलाई के अंतिम सप्ताह में शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे के बाद खत्म हुआ था। इंस्टाग्राम के लिए ज्यादा आदेश की वजह साफ है। छात्र और युवा इस साइट का अधिक उपयोग करते हैं।

किताबों, फिल्मों और सोशल मीडिया माध्यम पर रोक स्थायी साबित नहीं होती है। सूचना क्रांति के दौर में खबरों, विचारों और जानकारियों को रोकना लगभग नामुमकिन है। चीन जैसे एक पार्टी शासित देश को छोड़िए जहां कम्युनिस्ट सत्ता ने विदेशी सोशल मीडिया पर पूरी पाबंदी लगा रखी है। फिर भी, देश की तस्वीर सामने आती रहती है। तानाशाह व्लादिमीर पुतिन ने रूस में खबरों के स्रोतों पर पहरा बिठा रखा है। वे दिखावे के लिए चुनाव कराते हैं। इससे वे अर्थव्यवस्था में गिरावट को नहीं संभाल पाए हैं। रूस अब भी पूर्व सोवियत संघ के दौर की वैज्ञानिक तरक्की के बूते चल रहा है।

मानव जब उन्मुक्त आकाश में उड़ान भरता है तब ही उसकी वास्तविक तरक्की होती है। सीमित समय के लिए लोगों पर काबू पाया जा सकता है। सरकारी एजेंसियों के दुरुपयोग और दमन के जरिये लोगों की भावनाओं, दृष्टिकोण और विचारों को हमेशा के लिए नहीं कुचलना संभव नहीं है। भारत को इमरजेंसी में सेंसरशिप का कड़वा अनुभव हो चुका है। इसलिए भी सरकार को स्वस्थ आलोचना रोकने की प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष कोशिश नहीं करनी चाहिए। ऐसी किसी भी कोशिश से उसकी कमजोरी और डर ही जाहिर होता है। जैसा कि महान चिंतक जार्ज बर्नार्ड शा ने कहा है, सेंसरशिप का खात्मा तरक्की की पहली शर्त है। इसलिए 2047 में भारत को समृद्ध बनाने और उसे दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र साबित करने के लिए विचारों पर किसी भी तरह की रोक नहीं होनी चाहिए।


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