क्या हम असभ्य और क्रूर होते जा रहे हैं!
जब कोई घटना दो अलग-अलग संप्रदाय या जाति के लोगों के बीच होती है। सवाल ये भी है बल्कि असल सवाल यही है कि हम इतने संकीर्ण, असंवेदनशील और आक्रामक क्यों हो गये हैं।

—पलाश सुरजन
जब कोई घटना दो अलग-अलग संप्रदाय या जाति के लोगों के बीच होती है। सवाल ये भी है बल्कि असल सवाल यही है कि हम इतने संकीर्ण, असंवेदनशील और आक्रामक क्यों हो गये हैं। क्या बीते बरसों में अलग-अलग बहानों से भड़काई गई भावनाओं ने हमारे भीतर सोये हुए राक्षस को जगा दिया है। कहीं ऐसा तो नहीं कि जो आग दूसरों के लिये लगाई गई, वह हमें ही झुलसाने लगी हो और हमें उसका अहसास भी न हो।
न्याय, शिक्षा, सुरक्षा, समानता, शिष्टाचार, परस्पर विश्वास और करुणा- सभ्य कहलाने वाले किसी भी समाज की पहचान होते हैं। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो किसी समाज को सभ्य कहलाने का अधिकार तभी है जब वह इन मूलभूत तत्वों से परिपूर्ण हो। दुर्भाग्य से विश्व गुरु होने के आकांक्षी और अपने संस्कारों पर इतराने वाले भारतीय समाज से ये तत्व विलुप्त होते जा रहे हैं और ऐसा लग रहा है जैसे हम आदिम युग की ओर लौट चले हैं। गौतम बुद्ध, महावीर, गुरुनानक, कबीर और गांधी के देश में चारों तरफ तेजी से बढ़ रही बेहूदा और आपराधिक घटनाएं ये सोचने के लिये मजबूर करती हैं कि क्या हम असभ्य और क्रूर होते जा रहे हैं। चिंता का विषय यह भी है कि आने वाले समय में हमारे देश और समाज की तस्वीर कैसी होगी। हाल के कुछ उदाहरण इस बात को समझने में सहायक हो सकते हैं।
अक्तूबर में गुरुग्राम में एक रात चलती कार की पिछली सीट पर बैठे युवक ने अचानक दरवाज़ा खोलकर सड़क पर पेशाब करना शुरू कर दिया तो फरीदाबाद में भी एक व्यस्त सड़क पर एक शख्स ने अपनी कार रोकी और बीच सड़क पर बिना किसी शर्म या झिझक के लघुशंका निवारण किया। इसी तरह पुणे में भी एक ट्रैफिक सिग्नल पर एक युवक का बीएमडब्ल्यू से उतरकर पेशाब करने का वीडियो वायरल हुआ था। युवक के साथ कार में उसका दोस्त शराब की बोतल लेकर बैठा हुआ था। एक वीडियो ऐसा भी देखने में आया जिसमें एक महिला ने अपने बच्चे को नारियल के खाली खोल में पेशाब करवाया और चलती कार से उसे सड़क पर फेंक दिया। मज़े की बात यह कि वीडियो, महिला के पति ने ही बनाया। नवंबर 2022 में न्यूयॉर्क-नई दिल्ली उड़ान में एक बहुराष्ट्रीय कंपनी के बड़े अधिकारी ने एक वृद्ध महिला पर पेशाब कर दी थी, नतीजतन उसे न केवल अपनी नौकरी गंवानी पड़ी बल्कि जेल की हवा भी खाना पड़ी। लेकिन तीन साल बाद फिर दिल्ली से बैंकॉक जाने वाली उड़ान में वैसी ही घटना हुई।
मार्च की शुरुआत में मुंबई से जयपुर जा रहा एक यात्री ने हवाई अड्डे के प्रतिबंधित क्षेत्र में सिगरेट पीते दिखाई दिया तो वहां मौजूद एक कर्मचारी ने सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए उसे रोकने की कोशिश की। अपनी गलती मानना तो दूर, उस यात्री ने एयरलाइन कर्मचारियों से बहस करना शुरू कर दिया। इस घटना के वायरल वीडियो में वह उन कर्मचारियों पर ही धुआं छोड़ते और बार-बार धूम्रपान निषेध नियम का सबूत मांगते हुए भी दिखाई दे रहा है। उसने सुरक्षा कर्मियों को भी अपशब्द कहे और अपनी कमाई को लेकर शेखी बघारी। इससे पहले फरवरी में अरुणाचल प्रदेश के दिबांग वैली जिले के एक रिज़ॉर्ट में बाहर का खाना और शराब लाकर खाने-पीने की मनाही के बावजूद गुजरात से आये एक पर्यटक परिवार ने मनमानी की। रिज़ॉर्ट के नियम याद दिलाने पर वह परिवार गाली-गलौज पर उतर आया और अपने रसूख की धमकी देने लगा।
बीते महीने इंदौर के एक रिहाइशी परिसर के पेंटहाउस में अवैध व्यावसायिक गतिविधियों और पार्किंग का विवाद इस कदर बढ़ा कि पेंटहाउस के मालिक ने ऐतराज़ जता रहे रहवासियों को सबक सिखाने के लिये अपने नाबालिग बेटे को बुलवा लिया। उसने परिसर के भीतर ही तेजी से कार दौड़ाते हुए एक महिला सॉफ्टवेयर इंजीनियर को कुचलकर मार डाला, जबकि इस विवाद में वह एक दर्शक मात्र थी और कुछ ही दिन पहले उसका परिवार उस परिसर में रहने आया था। किसे पता था कि विवाद की वजह जानने की उत्सुकता जानलेवा हो सकती है। लेकिन किसी को सबक सिखाने और बदला लेने का फितूर तथाकथित भद्र लोगों पर भी ऐसे चढ़ता है कि उन्हें अक्ल से अंधे होते देर नहीं लगती। मसलन, पिछले साल बेंगलुरू में एक कार सवार आकर चाय की दुकान पर रुका और वहां खड़े युवक से सिगरेट लाकर देने को कहा। युवक ने इनकार किया तो कार सवार ने उसे गाड़ी से कुचलकर मार डाला।
एक खौफ़नाक मामला हापुड़ जिले के शेखपुरा गांव का है जहां एक दुकानदार ने सात साल के बच्चे पर दुकान से खाने का सामान चोरी करने का आरोप लगाया और फिर उसे डीप फ्रीज़र में बंद कर दिया। वीडियो में आरोपी दुकानदार बच्चे को गाली देते हुए उसकी गर्दन काटने की धमकी देता भी सुनाई दे रहा है। इससे पहले वाराणसी में कुछ लोगों ने मोबाइल चोरी के शक में लाठियों से पीट-पीटकर एक नाबालिग को मार डाला। दूसरी तरफ मुंबई के उपनगर वसई की एक सोसायटी में एक ऑटो रिक्शा चालक ने चार साल के बच्चे के साथ वो सलूक किया जिसे देखकर रूह कांप जाए। बच्चे के पिता साथ हुए मामूली विवाद का बदला उसने मासूम की जान से लेने की कोशिश की। दूसरे बच्चों के साथ खेलते-खेलते वह बच्चा एक ऑटो रिक्शा में जाकर बैठ गया था। आरोपी ने पहले उसका सिर रिक्शे में लगे लोहे के एंगल पर दे मारा। फिर उसे पैरों से पकड़कर बेरहमी से खींचा और फिर हवा में उछाल कर उसे सिर के बल जमीन पर पटक दिया। बच्चे के साथ दरिंदगी कुछ और देर चलती रही। आरोपी ने उसे छुड़ाने के लिए आईं दादी को भी नहीं बख्शा।
कहा जा सकता है कि दंगे-फसाद, बलवा, मारपीट, हत्या और बलात्कार जैसी चीज़ें पहले भी होती थीं, लेकिन सोचने वाली बात है कि क्या समाज में पहले ये चीज़ें उस तरह से सहज स्वीकार्य थीं जैसी अब हैं। आखिर क्यों हम इस तरह की घटनाओं को सामान्य मानकर अनदेखा करने लगे हैं और हमारी आँखें और ज़बान तभी क्यों खुलती हैं जब कोई घटना दो अलग-अलग संप्रदाय या जाति के लोगों के बीच होती है। सवाल ये भी है बल्कि असल सवाल यही है कि हम इतने संकीर्ण, असंवेदनशील और आक्रामक क्यों हो गये हैं। क्या बीते बरसों में अलग-अलग बहानों से भड़काई गई भावनाओं ने हमारे भीतर सोये हुए राक्षस को जगा दिया है। कहीं ऐसा तो नहीं कि जो आग दूसरों के लिये लगाई गई, वह हमें ही झुलसाने लगी हो और हमें उसका अहसास भी न हो।


