सोना न खरीदने की अपील : तब और अब का भारत
पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध ने पूरी दुनिया के ऊर्जा बाज़ार को अस्थिर कर दिया है।

- गिरीश मिगलानी
यह भी साफ़ रहना चाहिए कि सोने पर संयम से हासिल क्या होता है। अगर सोने का आयात घटता है तो विदेशी मुद्रा पर दबाव कुछ कम पड़ता है, चालू खाता घाटा नियंत्रित होता है और रुपये को थोड़ी राहत मिलती है। यह सब वास्तविक आर्थिक लाभ हैं। लेकिन इससे रोज़गार पैदा नहीं होता, किसी की आय नहीं बढ़ती और न ही गरीबी सीधे कम होती है। इसलिए सोने पर संयम को उसी रूप में समझना चाहिए जिस रूप में वह है?
हाल ही में हैदराबाद से प्रधानमंत्री ने देशवासियों से अपील की कि जहां तक हो सके सोना मत खरीदिए, विदेश यात्राएं टालिए, तेल बचाइए और जितना संभव हो उतना घर से काम कीजिए। समय मुश्किल है, इसलिए सरकार की चिंता समझ में आती है। पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध ने पूरी दुनिया के ऊर्जा बाज़ार को अस्थिर कर दिया है। जून 2025 में शुरू हुए ईरान-इजरायल संघर्ष का असर स्वाभाविक तौर पर भारत ने भी महसूस किया, क्योंकि होर्मुज जलडमरूमध्य— जहां से भारत में आयात होने वाले कच्चे तेल के जहाज गुजरते हैं— वह ईरानी दबाव के कारण अनिश्चितता के घेरे में आ गया। ऐसे में तेल की कीमतें बढ़ीं, भारतीय रुपये पर दबाव बढ़ा, विदेशी निवेश वापस हुआ, और आयात बिल और भी भारी हो गया। ऐसे समय में सरकार नागरिकों से संयम की अपील करना बहुत स्वाभाविक सी बात है।
लेकिन इस अपील को समझने के लिए 1967 याद करना ज़रूरी है, क्योंकि तब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भी देश से लगभग ऐसी ही अपील की थी। फर्क यह है कि तब का भारत और आज के भारत की आर्थिक वास्तविकताएं बिल्कुल अलग हैं। 1967 में भारत की जीडीपी मुश्किल से 50 अरब डॉलर थी। विदेशी मुद्रा भंडार इतने सीमित थे कि अक्सर कुछ हफ्तों के आयात की भी चिंता खड़ी हो जाती थी। लगातार सूखा पड़ना, 1965 के युद्ध के बाद अमेरिकी खाद्य सहायता रुकना और विश्व बैंक तथा आईएमएफ का दबाव— इन सबने भारत को ऐसी स्थिति में पहुंचा दिया था जहां 1966 में रुपये का भारी अवमूल्यन लगभग मजबूरी बन गया। रुपया 4.76 से गिरकर 7.50 प्रति डॉलर पर पहुंच गया और अर्थव्यवस्था उस वर्ष सिकुड़ गई। वह केवल आर्थिक दबाव नहीं था; बल्कि भारत सचमुच अस्तित्व के संकट से गुजर रहा था।
आज का भारत उस दौर से बिल्कुल अलग है। अर्थव्यवस्था चार ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा है, विदेशी मुद्रा भंडार सैकड़ों अरब डॉलर के हैं और दुनिया भारत को एक उभरती हुई आर्थिक शक्ति के रूप में देखती है। इसलिए आज की सरकार के लिए स्थिति 1967 जैसी मजबूरी की नहीं, बल्कि देश को बाहरी झटके को संभालने की स्थिति है। लेकिन यहीं एक दिलचस्प सवाल भी खड़ा होता है। अगर भारत इतना सक्षम हो चुका है, तो फिर भी पश्चिम एशिया में हो रहा कोई युद्ध भारतीय रसोईयों तक बेचैनी क्यों पहुंचा देता है? जवाब सीधा है कि तेल और सोने के मामले में हम भी आयात पर निर्भर हैं।
सोने का मामला तो और भी दिलचस्प है। कुछ वर्ष पहले प्रधानमंत्री मोदी ने इस विषय पर एक व्यापक चर्चा छेड़ दी थी कि भारतीय घरों, मंदिरों और संस्थानों में लगभग 20,000 टन सोना पड़ा है। सरकार ने गोल्ड मॉनेटाइज़ेशन स्कीम इसी सोच के साथ शुरू की थी कि अगर इस निष्क्रिय सोने का एक हिस्सा भी वित्तीय व्यवस्था में आ जाए तो आयात का दबाव कम होगा और अर्थव्यवस्था को ताकत मिलेगी। तार्किक रूप से यह विचार गलत नहीं था, लेकिन इस पर आधारित योजना भारतीय समाज के सोने में भरोसे की एक गहरी सच्चाई से टकरा गई। भारत में सोना केवल निवेश नहीं है। वह कई पीढ़ियों की आर्थिक विरासत है, और आर्थिक समृद्धि की प्रतीक है। वह उस समाज की सुरक्षा है जिसने बैंकिंग व्यवस्था पर भरोसा करने से पहले सोने पर भरोसा करना सीखा। कई घरों में वह स्त्री की निजी आर्थिक ताकत है, और संकट के समय का सहारा भी है। इसलिए सोना न खरीदना केवल एक आर्थिक सलाह नहीं रह जाती; बल्कि वह लोगों की सबसे पुरानी आर्थिक मानसिकता को शंकित बनाती है। ऐसी आदतें सरकारी अपीलों से नहीं बदलतीं। लोग तब बदलते हैं जब उन्हें अपने पुराने भरोसे से अधिक विश्वसनीय विकल्प दिखाई दें।
हालांकि यह भी साफ़ रहना चाहिए कि सोने पर संयम से हासिल क्या होता है। अगर सोने का आयात घटता है तो विदेशी मुद्रा पर दबाव कुछ कम पड़ता है, चालू खाता घाटा नियंत्रित होता है और रुपये को थोड़ी राहत मिलती है। यह सब वास्तविक आर्थिक लाभ हैं। लेकिन इससे रोज़गार पैदा नहीं होता, किसी की आय नहीं बढ़ती और न ही गरीबी सीधे कम होती है। इसलिए सोने पर संयम को उसी रूप में समझना चाहिए जिस रूप में वह है— एक व्यापक आर्थिक उपाय, न कि सामाजिक समाधान।
और यहीं पर बात आती है अपील करने के तरीके की। 1967 में इंदिरा गांधी ने देश से त्याग की अपील की थी, लेकिन उससे पहले उन्होंने अपने सोने के गहने नेशनल रिलीफ़ फंड में दान कर दिए थे। उस कदम में एक नैतिक शक्ति थी क्योंकि उसमें यह संदेश छिपा था कि जो उम्मीद देश से की जा रही है, सत्ता स्वयं उससे बाहर नहीं है। प्रधानमंत्री मोदी ने विदेश यात्राएं टालने की बात कही, लेकिन उसी दौरान उन्होंने अपनी विदेश यात्राएं जारी रखीं और यह नहीं कहा जा सकता कि वे यात्राएं अनावश्यक थीं; कूटनीति, व्यापार वार्ताएं और रणनीतिक रिश्ते किसी भी बड़े देश के लिए महत्वपूर्ण होते हैं। लेकिन लोकतंत्र में केवल निर्णय नहीं, उनके प्रतीक भी मायने रखते हैं। जब नागरिकों से संयम की उम्मीद की जाए, तब सरकार से भी यह अपेक्षा स्वाभाविक ही है कि वह बताए कि वे यात्राएं क्यों अनिवार्य थीं, उसका क्या उद्देश्य था, क्या हासिल हुआ और यह बोझ वास्तव में कितना साझा है, सरकार का इसमें कितना योगदान है?
यह कोई अनुचित सवाल नहीं है। लोकतंत्र में सरकार से सवाल पूछना जन-सामान्य की ज़िम्मेदारी है। नागरिकों से केवल त्याग मांगना पर्याप्त नहीं होता, उन्हें विश्वास में भी लिया जाना होता है। शायद यही वह जगह है जहां 1967 और 2026 की अपीलों में बड़ा फर्क दिखाई देता है। 1967 में भारत के पास विकल्प कम थे, इसलिए अपील में मजबूरी साफ़ दिखाई देती थी। 2026 का भारत कहीं अधिक सक्षम है, इसलिए आज नागरिक अपील तो सुनते हैं, लेकिन वे यह भी देखते हैं कि सत्ता स्वयं उस पर किस रूप में अमल करती दिखाई देती है। लोकतंत्र में आखिरकार यही बात जनता से किसी भी अपेक्षा की नैतिक विश्वसनीयता तय करती है।
(लेखक राजनीतिक विचारक हैं।)


