Top
Begin typing your search above and press return to search.

आर्थिक संयम की अपील : राष्ट्रवाद या संकट प्रबंधन?

यह अपील सतही तौर पर 'आर्थिक राष्ट्रवाद' लगती है, पर संदर्भ में यह वैश्विक अस्थिरता और घरेलू दबावों की आपात प्रतिक्रिया प्रतीत होती है।

आर्थिक संयम की अपील : राष्ट्रवाद या संकट प्रबंधन?
X
  • अरुण डनायक

सबसे गंभीर प्रश्न संसदीय लोकतंत्र और संसद में जवाबदेही से जुड़ा है । इतने महत्वपूर्ण वैश्विक संकट पर संसद में व्यापक चर्चा और सर्वसम्मत नीति-निर्माण अपेक्षित था, लेकिन सरकार की सक्रिय पहल का अभाव दिखा। विपक्ष के सुझावों की अनदेखी और संवाद की कमी से संकट प्रबंधन संस्थागत विमर्श के बजाय सीमित दायरे में सिमटता प्रतीत होता है।

पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव से आपूर्ति शृंखलाएं और तेल कीमतें प्रभावित हैं; ऐसे में 10 मई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विदेशी मुद्रा बचाने के लिए विदेश यात्रा व सोने की खरीद टालने, पेट्रोल डीज़ल की खपत घटाने, सार्वजनिक परिवहन, कार पूलिंग और इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देने तथा जीवनशैली में बदलाव का आह्वान किया। उन्होंने पार्सल ढुलाई को रेल से और वर्क फ्रॉम होम को प्रोत्साहित करने की भी सलाह दी।

यह अपील सतही तौर पर 'आर्थिक राष्ट्रवाद' लगती है, पर संदर्भ में यह वैश्विक अस्थिरता और घरेलू दबावों की आपात प्रतिक्रिया प्रतीत होती है। कच्चे तेल की कीमतों में उछाल ने भारत जैसे आयात-निर्भर देश पर दबाव बढ़ाया है। इसी पृष्ठभूमि में रुपया 95 प्रति डॉलर के पार पहुंचा—जो बाह्य क्षेत्र पर बढ़ते दबाव का संकेत है, जहां हाल के महीनों में निर्यात-आयात असंतुलन से बढ़ता चालू खाता घाटा और उससे भी अधिक पूंजीगत खाते की कमजोरी—विशेषकर विदेशी निवेश, बाहरी उधारी और अन्य पूंजी प्रवाह में कमी—रुपये पर दबाव के प्रमुख कारण रहे हैं।

ऊर्जा और सोने पर भारी आयात निर्भरता भारत की संरचनात्मक कमजोरी रही है। तेल और सोने की ऊंची कीमतें डॉलर की मांग बढ़ाती हैं। खाड़ी देशों से प्रेषण पर अनिश्चितता ने स्थिति को और जटिल बना दिया है। इस दबाव के बीच तेल वितरण कंपनियों को लगभग रुपए 1000 करोड़ का घाटा प्रतिदिन हो रहा है और खरीफ सीजन से पहले उर्वरकों के कच्चे माल जैसे प्राकृतिक गैस, पोटाश, अमोनिया जैसे रसायनों का महंगा आयात भी अपरिहार्य है। रासायनिक उर्वरकों की कमी या महंगाई से कृषि उत्पादन प्रभावित होने और खाद्य कीमतों पर दबाव बढ़ने की आशंका है, जो समय रहते नियंत्रण न होने पर खाद्य सुरक्षा के लिए चुनौती बन जायेगी। ऐसे में प्रधानमंत्री की अपील मूलत: डॉलर की मांग घटाने का एक 'आसान विकल्प' भर है, जबकि परिस्थितियां कीमतों के यथार्थपरक समायोजन जैसे कठिन, पर अधिक प्रभावी, निर्णयों की मांग करती हैं।

व्यवहारिक स्तर पर भी इस अपील की सीमाएं स्पष्ट हैं। अधिकांश शहरों में सार्वजनिक परिवहन अव्यवस्थित, भीड़भाड़ वाला और समय-साध्य है। दूसरी ओर, राजनीतिक रैलियों, सरकारी काफिलों और आयोजनों में संसाधनों का व्यापक उपयोग 'कथनी और करनी' के अंतर को उजागर करता है। मध्यप्रदेश में निगम-मंडल अध्यक्षों का सैकड़ों वाहनों के साथ राजधानी भोपाल पदभार ग्रहण करने पहुंचना इस विरोधाभास को और गहरा करता है। यह विरोधाभास जनता से अपेक्षित संयम की नैतिक ताकत को कमजोर करता है।

बाज़ार की प्रतिक्रिया ने इस अपील के निहितार्थ को और स्पष्ट किया। एविएशन, पर्यटन और ज्वेलरी क्षेत्रों में तेज़ गिरावट आई और एक ही दिन में लगभग 4 लाख करोड़ की बाज़ार पूंजीकरण में कमी दर्ज की गई। पेट्रोल कीमत में हालिया बढ़ोतरी ने निवेशकों की आशंका को पुष्ट कर दिया है, जबकि बढ़ते आर्थिक दबाव के कारण समग्र आर्थिक संतुलन बिगड़ने की संभावना भी बनी हुई है।

सरकार ने 69 दिनों के कच्चे तेल, एलएनजी और 45 दिनों के एलपीजी भंडार का हवाला देकर स्थिति को नियंत्रित बताया है, लेकिन दीर्घकालिक संकट की स्थिति में यह पर्याप्त नहीं माना जा सकता। इससे ऊर्जा नीति की सीमाएं भी उजागर होती हैं। सौर, पवन और भंडारण जैसी वैकल्पिक ऊर्जा में निवेश की गति धीमी है और इलेक्ट्रिक वाहनों, इंडक्शन कुकिंग तथा बायोगैस जैसे विकल्पों का विस्तार सीमित है। पेट्रोलियम भंडारण क्षमता भी पिछले एक दशक से नहीं बढ़ी है। 2003 में शुरू हुई रणनीतिक भंडारण परियोजना का दूसरा चरण—जिसे 2021 में मंज़ूरी मिली—बजट और प्रक्रियागत देरी के कारण अब तक ज़मीन पर नहीं उतर सका है, परिणामस्वरूप पेट्रोलियम पर निर्भरता कम नहीं हो पाई है।

नोटबंदी और कोविड लॉकडाउन की तरह इस बार भी अपील के बाद स्थिति स्पष्ट करने के लिए मंत्रियों को सामने आना पड़ा, जो संकेत देता है कि निर्णय और उसके प्रभावों के आकलन के बीच संतुलन अक्सर कमजोर रहता है।

भारत की विदेश नीति के क्रियान्वयन पर भी प्रश्न उठते हैं। संकट की इस संवेदनशील घड़ी में शीर्ष स्तर की पश्चिम एशिया यात्राओं का समय और प्राथमिकता स्पष्ट रणनीतिक संदेश नहीं दे पातीं। बढ़ते तनाव के बीच ऐसी सक्रियता कूटनीतिक पहल तो दिखाती है, पर उसके ठोस परिणामों और रणनीतिक लाभों पर पारदर्शिता का अभाव बना रहता है।

सबसे गंभीर प्रश्न संसदीय लोकतंत्र और संसद में जवाबदेही से जुड़ा है । इतने महत्वपूर्ण वैश्विक संकट पर संसद में व्यापक चर्चा और सर्वसम्मत नीति-निर्माण अपेक्षित था, लेकिन सरकार की सक्रिय पहल का अभाव दिखा। विपक्ष के सुझावों की अनदेखी और संवाद की कमी से संकट प्रबंधन संस्थागत विमर्श के बजाय सीमित दायरे में सिमटता प्रतीत होता है।

सांस्कृतिक पहल के नाम पर मंदिरों में स्वर्णमंडन की भव्य परियोजनाओं के बीच सोना न खरीदने की अपील एक विरोधाभास पैदा करती है। एक ओर आर्थिक संयम का संदेश है, तो दूसरी ओर स्वर्ण उपयोग का विस्तार 'स्वर्ण संसाधन अवरोध' को बढ़ावा देता दिखता है।

भारतीय रिज़र्व बैंक भी हाल के वर्षों में अपने स्वर्ण भंडार में लगातार वृद्धि कर रहा है। मार्च 2026 तक बैंक के विदेशी मुद्रा भंडार में सोने की हिस्सेदारी बढ़कर 16.7प्रतिशत हो गई, जो छह महीने पहले 13.92प्रतिशत थी। वैश्विक स्तर पर कई केंद्रीय बैंक आर्थिक अनिश्चितता और बाजार अस्थिरता से बचाव के लिए सोना एक सुरक्षित संपत्ति के रूप में बढ़ा रहे हैं, जो संस्थागत स्तर पर इसके महत्व को दर्शाता है। हालांकि सोना खरीदना व्यक्तिगत रूप से गलत नहीं है, पर यह केवल निजी पसंद नहीं, बल्कि भारत की पारंपरिक बचत प्रवृत्ति और आधुनिक आर्थिक आवश्यकताओं के बीच एक संरचनात्मक द्वंद्व भी है। ऐसे में नीति-निर्माण के स्तर पर इन दोनों प्रवृत्तियों के बीच अधिक संतुलित दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता महसूस होती है।

यद्यपि भारत के पास लगभग 690 बिलियन डॉलर का पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार है और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के विशेष आहरण अधिकारों (एसडीआर) का आपात उपयोग भी नहीं करना पड़ा है, इसलिए 1990-91 जैसी गंभीर स्थिति की आशंका फिलहाल कम है; तथापि विलंब से उठाए गए कदमों के बीच ऐसी अपील आर्थिक रूप से उचित प्रतीत होती है, पर इसकी प्रभावशीलता सरकार की नीतिगत सुसंगति और विश्वसनीयता पर निर्भर करती है। यदि समय रहते ऊर्जा विविधीकरण, आयात निर्भरता में कमी और संस्थागत संवाद मजबूत किए गए होते—साथ ही अस्थिर विदेशी संस्थागत व पोर्टफोलियो निवेश को आकर्षित करने वाली नीतियां सुधारी जातीं, गोल्ड बॉन्ड अधिक आकर्षक बनाए जाते, संकट संचार पेशेवर होता और पेट्रोलियम भंडारण विस्तार समय पर होता—तो आज स्थिति इतनी दबावपूर्ण न होती। आर्थिक संकट से निपटने के लिए केवल जनता से संयम की अपेक्षा पर्याप्त नहीं—सरकार भी अपने निर्णयों, प्राथमिकताओं और आचरण में आवश्यक पारदर्शिता दिखाए , तभी 'आर्थिक राष्ट्रवाद' ठोस राष्ट्रीय प्रयास बन पाएगा।

(लेखक भारतीय स्टेट बैंक सेवानिवृत सहायक महाप्रबंधक हैं)


Next Story

Related Stories

All Rights Reserved. Copyright @2019
Share it