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देसी बीजों के साथ शब्द बचाने की पहल

पिछले कुछ वर्षों से बाबूलाल दाहिया ने देसी बीजों को बचाने का अभियान शुरू किया है।

देसी बीजों के साथ शब्द बचाने की पहल
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— बाबा मायाराम

पिछले कुछ वर्षों से बाबूलाल दाहिया ने देसी बीजों को बचाने का अभियान शुरू किया है। पुरानी परंपरागत चीजों का संग्रह किया है। वे स्कूली बच्चों के साथ जैव विविधता जागरूकता अभियान चलाते हैं। देश-भर में घूम-घूम कर किसानी कार्यशालाओं में जाते हैं और देशी बीजों का संरक्षण का संदेश देते हैं। इसके लिए उन्हें कई मंचों पर सम्मानित भी किया जा चुका है। उन्हें भारत सरकार ने पद्मश्री से भी सम्मानित किया है।

हमारी स्थानीय भाषाओं और बोलियों में परंपरागत ज्ञान का भंडार है। पेड़-पौधे, जीव-जंतुओं, मौसम, खेती-बाड़ी, भू दृश्यों की पहचान के लिए शब्द बहुत महत्वपूर्ण हैं। न केवल पहचान व सम्बन्ध विकसित करने के लिए शब्द जरूरी हैं, बल्कि मौखिक कौशल व जैव विविधता को बचाने के लिए भी बहुत जरूरी है साथ ही हमें आसपास की दुनिया से जोड़ने के लिए भी यह महत्वपूर्ण हैं। लेकिन कई कारणों से हम ऐसे शब्दों को भी भूलते जा रहे हैं, जो दैनंदिन जीवन का हिस्सा थे। आज इस कॉलम में इस पर ही बात करना चाहूंगा, जिससे हम भूलते जा रहे शब्दों के महत्व को समझ सकें।

हम बचपन से देखते आ रहे हैं कि शब्दों के माध्यम से ही हम एक-दूसरे से और आसपास की दुनिया से जुड़ते हैं। भाषा और शब्द ही वह तरीका है, जिससे हम न केवल आपस में जुड़ते हैं, बल्कि जीव-जगत से भी जुड़ जाते हैं। पौधों, जानवरों, पशु-पक्षियों, मौसम, जलवायु, खेती-बाड़ी, और भू दृश्यों से सहजता से सम्बन्ध जोड़ लेते हैं। बिना शब्दों के इनसे सम्बन्ध जोड़ना संभव नहीं है।

बाबूलाल दाहिया, जो मूल रूप से बघेली के कवि हैं, और आजकल देसी बीज बचाने में लगे हैं। उन्होंने ऐसे ही लुप्त हो रहे शब्दों, मौखिक ज्ञान और अच्छी परंपराओं पर जोर दिया है। उनसे मैं कई बार मिल चुका हूं, उनके गांव गया हूं, और हमने साथ-साथ लम्बी यात्राएं की हैं। उनसे मेरी इस बारे में विस्तार से बातें होती रही हैं।

मध्यप्रदेश के सतना जिले के उचहेरा ब्लाक में उनका गांव पिथौराबाद है। यह मैहर से करीब 30 किलोमीटर दूर है। बाबूलाल दाहिया की खेती-किसानी के साथ-साथ साहित्य में रूचि रही है। वे बघेली के प्रसिद्ध साहित्यकार हैं। लेकिन जबसे उन्हें यह एहसास हुआ कि जैसे लोकगीत व लोक संस्कृति लुप्त हो रही है, वैसे ही लोक अन्न भी लुप्त हो रहे हैं, तब से उन्होंने इन्हें सहेजने और बचाने का काम शुरू कर दिया।

वे बताते हैं कि जैसे हमारे देसी बीज खत्म हो रहे हैं, वैसे ही उससे जुड़े व परंपरागत खेती से जुड़े कई शब्द भी खत्म हो रहे हैं। पूरी कृषि संस्कृति और जीवन पद्धति खत्म हो रही है। अब हमारा काम गेहूं, चावल और दाल जैसे शब्द से चल जाता है। लेकिन पहले बहुत सारे अनाज होते थे। उनके नाम थे जैसे समा, कोदो, कुटकी, मूंग, उड़द, ज्वार, तिल्ली आदि। फिर उन्हें बोने से लेकर काटने तक कई काम करने पड़ते थे।

वे बताते हैं कि पहले हमारे क्षेत्र में पचासों तरह की धानें हुआ करती थी। इनमें बहुत विविधता है। जैसे गलरी पक्षी की आंख की तरह होता है गलरी धान। इसी तरह किसी धान का दाना सफेद होता है तो किसी का लाल। किसी का काला तो किसी का बैंगनी, किसी का मटमैला। कुछ का दाना पतला तो किसी का मोटा और कोई गोल तो किसी का दाना लंबा। कुछ धान की किस्मों के पौधे हरे होते हैं तो किसी के बैंगनी। इनमें न केवल विविधता है बल्कि अलग-अलग रूप रंग का अपना विशिष्ट स्वाद व अपूर्व सौंदर्य है। परंपरागत देशी धान की विविधता के कई किस्से-कहानियां जनश्रुतियों में मौजूद हैं।

परंपरागत खेती के साथ कई शब्द जुड़े थे। जैसे बोवनी, बखरनी, निंदाई-गुड़ाई, दाबन, उड़ावनी और बीज भंडारण आदि। खेती की हर प्रक्रिया के अलग-अलग नाम थे। यह जरूर है कि ये शब्द किसी शब्दकोष में नहीं है, लेकिन लोक मानस में थे। बुजुर्ग अब भी इन शब्दों को आत्मीय ढंग से याद करते हैं। लेकिन खेती का फसलचक्र बदलने से, एकल खेती होने से ये शब्द भी लोप हो रहे हैं।

वे बताते हैं कि कृषि पद्धति बदल जाने के कारण हमारी परम्परागत खेती के भी सैकड़ों उपकरण चलन से बाहर हो गए। अगर गांव में ट्रैक्टर आने से घर से एक बैलों से चलने वाला हल भी निकल जाता है तो उसके साथ, जुआं, ढोलिया, ओइरा, बांसा, हरइली, डेंगर खरिया, मुस्का, गड़ाइन आदि अनेक छोटे -बड़े उपकरण भी चलन से बाहर हो जाते हैं। इन शब्दों का इस्तेमाल भी धीरे-धीरे बंद हो जाता है। यही हाल बाजार में प्लास्टिक और स्टील के बर्तन आ जाने से मिट्टी, कांसे एवं पीतल के बर्तनों की भी है।

इसी प्रकार, उदाहरण देते हुए वे बताते हैं कि यदि किसी मिट्टी शिल्पी कुम्हार ने अपना चाक बनाया तो मनुष्य के लिए उपयोगी बर्तन बनाए। मटकी, मटका, नाद, दोहनी, डबुला को आकार दिया। जरूरत के अनुसार चुकड़ी आदि 30-35 प्रकार के बर्तनों की परिकल्पना भी की। उनमें एक और लोक है (पत्थर शिल्पी) जो स्वतन्त्र रूप से अपने बर्तन व वस्तुएं बनाकर बेचता था। अगर हम इतिहास की बात करें तो मिट्टी के बर्तन पुराने इतिहास को जानने के स्रोत रहे हैं। पुरातत्व विज्ञान में इनका काफी महत्व है। पकी मिट्टी लम्बे समय तक रहती है। इससे पुराने जीवन का अनुमान लगाने में मदद मिलती रही है।

बाबूलाल दाहिया ने ऐसी 300 से अधिक वस्तुओं को चिन्हित किया है और एक बहुत ही अच्छा संग्रहालय बनाया है। जिसमें पत्थर की बनी चीजें, मिट्टी, बांस, लकड़ी, लोहे और खेती-किसानी के पुराने उपकरणों का संग्रह किया है। यह सभी चीजें दैनंदिन जीवन का हिस्सा थीं। और इनसे जुड़े शब्द भी उपयोग होते थे।

मैं कुछ वर्षों से पैदल व साइकिल से सैर करता हूं, पक्षी दर्शन करता हूं। कई बार स्कूली बच्चे भी जुड़ जाते हैं। हम साथ-साथ पक्षियों को देखते हैं, उनके नाम जानने की कोशिश करते हैं। कोयल, कौआ, गौरेया,बुलबुल, किलकिला, सूर्यपक्षी इत्यादि को देखते हैं, उनके नाम जानते हैं। बच्चे खुशी से चहकते हैं, और आकर बताते हैं कि उन्होंने आज एक चिड़िया देखी, उसका रंग, पैर, पंख, चोंच ऐसी थी, फिर वे नाम जानने की कोशिश करते हैं। इससे उनका पक्षियों से एक सम्बन्ध बनता है। वे जीव-जगत से जुड़ते हैं। मेरा भी जुड़ाव होता है। हमारी दुनिया बड़ी होती है।

कुल मिलाकर, पिछले कुछ वर्षों से बाबूलाल दाहिया ने देसी बीजों को बचाने का अभियान शुरू किया है। पुरानी परंपरागत चीजों का संग्रह किया है। वे स्कूली बच्चों के साथ जैव विविधता जागरूकता अभियान चलाते हैं। देश-भर में घूम-घूम कर किसानी कार्यशालाओं में जाते हैं और देशी बीजों का संरक्षण का संदेश देते हैं। इसके लिए उन्हें कई मंचों पर सम्मानित भी किया जा चुका है। उन्हें भारत सरकार ने पद्मश्री से भी सम्मानित किया है।

यानी अगर हम स्थानीय फसलों के, पेड़-पौधों,जानवर, पशु-पक्षियों, मौसम इत्यादि के नाम सीखें, अच्छी परंपराओं से जुड़े, उनसे जुड़े तो जैव विविधता के प्रति जागरूकता बढ़ेगी,हमारा जैव विविधता और पर्यावरण से अच्छा रिश्ता बनेगा, भाषा, शब्द व संस्कृति बचेगी और हम प्रकृति से भी जुड़ पाएंगे।


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