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अमेरिका का विश्व में आतंक, फायदा केवल पाकिस्तान को!

युद्ध में हत्याएं नहीं होती। हत्या होती है आतंकवाद में। जो अमेरिका सबसे ज्यादा आतंकवाद के खिलाफ बात करता है वही अब सबसे बड़ा आतंकवादी बन कर दिखा रहा है

अमेरिका का विश्व में आतंक, फायदा केवल पाकिस्तान को!
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  • शकील अख्तर

अमेरिका केवल आज्ञाकारी शासक चाहता है। जनता से उसे कोई मतलब नहीं होता। वह शासकों की पूरी मदद करता है कि वे अपनी जनता को अशिक्षित, अंधविश्वासी बना कर रखें। मुस्लिम देश यही कर रहे हैं। साइंस टेक्नालाजी अंग्रेजी की पढ़ाई कहीं नहीं है। पीढ़ियां पीछे की तरफ जा रही हैं। ऐशोआराम के नकली सामान जो अमेरिका पहुंचाता है उनका उपयोग शान के साथ करते हैं। खुद के यहां कुछ नहीं बनता।

युद्ध में हत्याएं नहीं होती। हत्या होती है आतंकवाद में। जो अमेरिका सबसे ज्यादा आतंकवाद के खिलाफ बात करता है वही अब सबसे बड़ा आतंकवादी बन कर दिखा रहा है। ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई कहीं युद्ध के मोर्चें पर नहीं थे। उनके दफ्तर में मुखबिरों की मदद से उनकी हत्या कर दी गई।

क्या मैसेज है? कि कोई नेता अपने देश में भी सुरक्षित नहीं है। उसके आसपास के लोग खरीदे जाएंगे और जब अमेरिका को वह फायदेमंद नहीं लगेगा उसे खतम कर दिया जाएगा। पहले अमेरिका उन्हें बदल देता था। हमारे पड़ोसी देश पाकिस्तान में यह उसने बहुत किया है और आज वहां उसका सबसे वफादार आदमी प्रधानमंत्री बनकर बैठा है। खैर पाकिस्तान पर हम लिखेंगे इसी लेख में आगे मगर पहले अमेरिका की दादागिरी और दुनिया के 55 से ज्यादा मुस्लिम देशों के आत्मसमर्पण पर।

ईरान में खामेनेई की हत्या से पहले वह इराक के राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन को मार चुका है। उस समय भी मुस्लिम देश खामोश रहे और आज तो उनमें से अधिकांश बेशर्मी के साथ अमेरिका के साथ खड़े हैं। इजराइल का नाम हम इसलिए नहीं लिख रहे कि उसका अपना अलग से कोई अस्तित्व नहीं है। वह जो है अमेरिका की सहायता से ही है। हां, लेकिन फिर भी सऊदी अरब, कुवैत, यूएई और भी कई मुस्लिम देश गजा के नरसंहार से आंखें मूंदकर उससे दोस्ती कर चुके हैं और अमेरिका के तो सब गुलाम हैं।

अमेरिका केवल आज्ञाकारी शासक चाहता है। जनता से उसे कोई मतलब नहीं होता। वह शासकों की पूरी मदद करता है कि वे अपनी जनता को अशिक्षित, अंधविश्वासी बना कर रखें। मुस्लिम देश यही कर रहे हैं। साइंस टेक्नालाजी अंग्रेजी की पढ़ाई कहीं नहीं है। पीढ़ियां पीछे की तरफ जा रही हैं। ऐशोआराम के नकली सामान जो अमेरिका पहुंचाता है उनका उपयोग शान के साथ करते हैं। खुद के यहां कुछ नहीं बनता। यहां तक कि जो सबसे बड़ी दौलत है तेल उसे भी अपने आप नहीं निकाल सकते। साफ करना तो दूर की बात है। तेल भी अमेरिका ही निकालता है और वही बताता है कि किसे बेचना है किसे नहीं।

पूरी तरह अमेरिका पर निर्भर होकर वे खुद को सुरक्षित समझते हैं। मगर यह भूल जाते हैं कि सुरक्षित तभी तक हैं जब तक अमेरिका के उद्देश्यों की पूर्ति कर रहे हैं। जैसे ही एक भी हां में हां सही स्वर में नहीं मिलाई वह अब केवल सत्ता परिवर्तन नहीं करता सीधे कत्ल ही कर देता है। दो उदाहरण बताए। दो सबसे ताकतवर मुस्लिम देशों के शासकों के। ईराक के सद्दाम हुसैन और ईरान के खामेनेई के। कत्ल।

आतंकवाद का एक पहलू और होता है डर ज्यादा से ज्यादा फैलाना। तो इसके लिए वह वेनेजुएला के राष्ट्रपति को उठाकर ले गया। सोचिए किसी देश में घुसकर उसके राष्ट्रपति और उस की पत्नी को भी उठाकर ले जाना! और विश्व चुप रहे!

गुंडागर्दी, आतंकवाद, डर और किसको कहते हैं? मुस्लिम देश अभी समझ नहीं रहे। वे तो अमेरिका के द्वारा दी गई सुविधाओं और सुरक्षा के झूठे आश्वासनों में झूम रहे हैं। लेकिन शासकों के एशोआराम अलग बात है लेकिन अगर ईरान की जनता लड़ गई तो यह मैसेज पूरे मुस्लिम देशों में जाएगा कि उनके भी अब खड़े होने का वक्त आ गया है। अरब देशों की जनता को वहां के शासक अमेरिका से मिलकर बाकी दुनिया से कई साल पीछे कर चुके हैं और उसी का नतीजा है कि आज जब लड़ाई ड्रोनों, मिसाइलों, कंप्यूटर से हो रही है तो वे उसके लड़ने की सोच भी नहीं सकते। कल उनके साथ कुछ होगा तो सिवा समर्पण के वे कुछ नहीं कर सकते।

ईरान पर अमेरिका इजराइल के हमले के बहुत पहलू हैं। अगर रुस और चीन खड़े नहीं हुए तो एक धु्रवीय व्यवस्था बन जाना। तेल के दाम बढ़ जाना। स्ट्रेट आफ होर्मुज ( जलडमरू मध्य ) बंद हो जाने से तेल का आना ही रुक जाना। मगर इस समय हम दो ही मुद्दों पर बात करना चाह रहे हैं। एक, जो लिखा कि 55 से ज्यादा देश होते हुए, एक शानदार विरासत रखते हुए, प्राकृतिक संसाधनों तेल से भरपूर होते हुए केवल समय के साथ न चल पाने के कारण आज किस तरह अमेरिका और इजराइल के भी पिछलग्गू बन गए।

दूसरा मुद्दा सीधा भारत से जुड़ा है। देश के सभी सीनियर डिप्लोमेट्स, टापब्यीरोक्रेट और रक्षा विशेषज्ञ जानते हैं कि आपरेशन सिंदूर के बाद से पाकिस्तान क्यों ट्रंप को ज्यादा से ज्यादा खुश करने में लगा हुआ है। अगर कोई नहीं जानता तो वह हमारे प्रधानमंत्री मोदी जी हैं। जो या तो जानते नहीं हैं। या जैसा कि नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी कह रहे हैं कि उनकी गर्दन दोनों हाथ से ट्रंप ने दाब रखी है। ट्रंप के एक हाथ में बदनाम एपस्टीन की फाइलें हैं। राहुल के अनुसार अभी 35 लाख और हैं। और राहुल का ही दावा है कि उसमें प्रधानमंत्री मोदी के बारे में है!

एक उस हाथ का दबाव। दूसरा हाथ अडानी के खिलाफ क्रिमिनल केस लिए हुए है और राहुल कहते हैं अडानी का केस मतलब भाजपा का पूरा आर्थिक साम्राज्य। अडानी पर अगर कार्रवाई होती है तो भाजपा का सारा पैसा जो उसके पास है डूब जाएगा। खत्म हो जाएगा। राहुल कहते हैं इन दोनों कारणों से मोदी जी ट्रंप के सामने बोल नहीं सकते।

फिलहाल राहुल इस दबाव की वजह से अमेरिका से हुई डील और उससे देश की खेती किसानी तबाह हो जाने, गारमेन्ट इंडस्ट्री खत्म हो जाने और देश के छोटे और लघु मध्यम उद्योग धंधे (एमएसएमई) की कमर टूट जाने की तरफ देश का ध्यान आकृष्ट करने की कोशिश कर रहे हैं। आर्थिक तूफान की चेतावनी दे रहे हैं।

लेकिन एक और जो इसका महत्वपूर्ण पार्ट है उस पर अभी किसी का ध्यान नहीं जा रहा है। हां जैसा कि ऊपर लिखा देश का डिप्लोमेट ब्यूरोक्रेट रक्षा अधिकारी इसको समझ रहे हैं। लेकिन या तो वे प्रधानमंत्री से बोल नहीं पा रहे या मोदी सुनकर भी राहुल के शब्दों में कुछ करने की स्थिति में नहीं हैं। वे पूरी तरह कम्प्रोमाइज्ड ( समझौते के अन्तर्गत, दबाव में) हैं।

पाकिस्तान ट्रंप को खुश करके कश्मीर मुद्दा उठाना चाहता है। याद कीजिए आपरेशन सिंदूर में जब हमारी सेना पाकिस्तान को निर्णायक सबक सिखाने जा रही थी तो ट्रंप ने न केवल सीज फायर करवाया बल्कि कश्मीर मामला हल करने की भी बात कही थी। पाकिस्तान यही चाहता है। जबकि हमारा स्टैंड बिल्कुल स्पष्ट है कि कश्मीर अन्तरराष्ट्रीय मुद्दा नहीं है। इस पर कोई मध्यस्थता स्वीकार नहीं की जाएगी। आज तक भारत अपने इसी स्टैंड पर मजबूती से कायम रहा है। और पाकिस्तान तो इसे अन्तरराष्ट्रीय विषय बनाकर मध्यस्थता चाहता ही है मगर कभी किसी दूसरे विदेशी ताकत की हिम्मत नहीं पड़ी कि वह कश्मीर के मामले में दखल दे। इन्दिरा जैसी लौह महिला की बात तो छोड़ दीजिए देश में कोई भी प्रधानमंत्री रहा हो किसी ने भी अमेरिका या किसी और को कश्मीर का क या के बोलने की भी इजाजत नहीं दी।

यह भारत की सबसे बड़ी चिंता होना चाहिए। अमेरिका के मनमाने फैसलों के खिलाफ हमें खड़ा होना पड़ेगा। ईरान पर हमले के बाद अगर अमेरिका ज्यादा ताकतवर हो गया तो सीधा नुकसान हमारा होगा और पाकिस्तान इसका फायदा उठाने की कोशिश करेगा। ये जो इजराइल से दोस्ती वगैरह की बातें है यह कोई काम नहीं आएंगी।

अमेरिका के सामने इजराइल एक शब्द नहीं बोल पाएगा। उसका पाकिस्तान से झगड़ा नहीं है। भारत में कोई इन्टे्रस्ट नहीं है। उसका सीधा संबंध अमेरिका से है। अमेरिका उसके हित में खाड़ी देशों में काम कर रहा है। बाकी जगह वह अमेरिका के हिसाब से काम करेगा।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार है)


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